खेतों में यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल बना खतरा, कृषि विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

हाल में अलग-अलग जिलों से जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण में यह सामने आया है कि कई किसान तय मात्रा से 50 से 100 प्रतिशत तक ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. किसानों में यह गलतफहमी बनी हुई है कि ज्यादा यूरिया डालने से फसल की पैदावार अपने आप बढ़ जाएगी, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह बात सही नहीं है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 5 Jan, 2026 | 11:17 AM

Excessive urea use: खेती में अच्छी पैदावार पाने की चाह हर किसान की होती है. इसी उम्मीद में कई बार किसान यह मान लेते हैं कि जितना ज्यादा खाद डालेंगे, उतनी ही फसल बेहतर होगी. खासकर यूरिया को लेकर यह धारणा काफी आम है. लेकिन कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना फसल के लिए वरदान नहीं, बल्कि धीरे-धीरे एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है. तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एल्डस जनैय्या और प्रोफेसर जयशंकर ने इस पर साफ शब्दों में किसानों को सावधान किया है.

यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल क्यों बन रहा है खतरा

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, हाल में अलग-अलग जिलों से जुटाए गए आंकड़ों के विश्लेषण में यह सामने आया है कि कई किसान तय मात्रा से 50 से 100 प्रतिशत तक ज्यादा यूरिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. किसानों में यह गलतफहमी बनी हुई है कि ज्यादा यूरिया डालने से फसल की पैदावार अपने आप बढ़ जाएगी, जबकि वैज्ञानिक रूप से यह बात सही नहीं है.

उन्होंने बताया कि जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने पर फसल बाहर से तो हरी-भरी दिखती है, लेकिन दाने, फल और सब्जियों की गुणवत्ता पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है. कई बार इससे उत्पादन बढ़ने की बजाय घट भी जाता है, जिससे किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है.

मिट्टी की सेहत पर पड़ता है सीधा असर

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार अधिक मात्रा में यूरिया डालने से सबसे पहले मिट्टी की सेहत खराब होती है. मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है और जमीन धीरे-धीरे अपनी प्राकृतिक उर्वरता खोने लगती है. प्रो. जनैय्या बताते हैं कि ज्यादा नाइट्रोजन से मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट होने लगते हैं, जो फसलों के लिए बेहद जरूरी होते हैं. इसका असर लंबे समय में दिखाई देता है, जब खेत में हर साल ज्यादा खाद डालने के बाद भी पैदावार संतोषजनक नहीं मिलती.

फसल की रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है कमजोर

प्रोफेसर एल्डस जनैय्या ने यह भी बताया कि यूरिया के अत्यधिक इस्तेमाल से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है. ऐसे खेतों में कीट और बीमारियों का प्रकोप ज्यादा देखने को मिलता है. इसके बाद किसान मजबूरी में ज्यादा कीटनाशक छिड़कते हैं, जिससे लागत बढ़ती है और फसल में रसायनों की मात्रा भी ज्यादा हो जाती है.

उपभोक्ताओं की सेहत पर भी असर

जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने का असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता. विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे फसल में रासायनिक अवशेष रह सकते हैं. जब ऐसी सब्जियां और अनाज लोगों के खाने में जाते हैं, तो इससे स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है. प्रो. जनैय्या ने कहा कि यह स्थिति उपभोक्ताओं के लिए भी चिंता का विषय है.

सस्ता होने की वजह से बढ़ा चलन

उन्होंने यह भी बताया कि यूरिया अन्य उर्वरकों की तुलना में सस्ता है, इसी वजह से किसान इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कर लेते हैं. जबकि फसलों को केवल नाइट्रोजन ही नहीं, बल्कि फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है. संतुलित खाद प्रबंधन के बिना खेती लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती.

संतुलित उपयोग से ही मिलेगा सही लाभ

प्रोफेसर जयशंकर का साफ कहना है कि यूरिया पौधों के लिए जरूरी है, लेकिन इसका उपयोग समझदारी और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए. मिट्टी जांच के आधार पर खाद डालने से न सिर्फ पैदावार बेहतर होगी, बल्कि जमीन की सेहत भी बनी रहेगी.

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