घेरकिन निर्यात पर अमेरिका की मेहरबानी, शुल्क घटने से दोबारा पटरी पर लौटेगा कारोबार, हजारों किसानों को मिलेगा लाभ

50 प्रतिशत शुल्क बढ़ने का असर 90,000 से अधिक छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ा, जो अनुबंध खेती के तहत घेरकिन उगाते हैं. घेरकिन दरअसल छोटे खीरे होते हैं, जिन्हें 4 से 8 सेंटीमीटर की लंबाई में ही तोड़ लिया जाता है और सिरके या नमक के घोल में डालकर जार या डिब्बों में पैक किया जाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 16 Feb, 2026 | 11:43 AM

Indian gherkin exports: भारत का घेरकिन उद्योग पिछले एक साल से मुश्किल दौर से गुजर रहा था, लेकिन अब हालात में सुधार की उम्मीद दिखने लगी है. फरवरी 2026 की शुरुआत में अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लगाया गया अतिरिक्त शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है. उद्योग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस फैसले से घेरकिन निर्यात दोबारा संभल सकता है. हालांकि यूरोप से फायदा धीरे-धीरे मिलेगा, लेकिन फिलहाल अमेरिकी बाजार से राहत मिलना बड़ी बात मानी जा रही है.

2025 में गिरावट, 2026 में संभलने की उम्मीद

क्रिसिल इंटेलिजेंस की ताजा मासिक रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में निर्यात घटकर 160.5 हजार टन रहने का अनुमान है, जबकि 2024 में यह 163.8 हजार टन था. यानी करीब 3.3 हजार टन की कमी आई. इस गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका द्वारा लगाया गया 50 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क था.

अमेरिका क्यों है इतना अहम?

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, तैयार घेरकिन (प्रोसेस्ड गेरकिन) के निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है. यानी भारत से भेजे जाने वाले हर तीन कंटेनर में से लगभग एक कंटेनर अमेरिका जाता है. 50 प्रतिशत शुल्क बढ़ने का असर 90,000 से अधिक छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ा, जो अनुबंध खेती के तहत घेरकिन उगाते हैं. घेरकिन दरअसल छोटे खीरे होते हैं, जिन्हें 4 से 8 सेंटीमीटर की लंबाई में ही तोड़ लिया जाता है और सिरके या नमक के घोल में डालकर जार या डिब्बों में पैक किया जाता है.

50 प्रतिशत शुल्क ने तोड़ दी कमर

अगस्त 2025 में अमेरिका ने पहले भारतीय आयात पर 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क लगाया. इसके बाद 6 अगस्त 2025 को रूस से भारत की ऊर्जा खरीद के मुद्दे पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क की घोषणा की गई, जो 27 अगस्त से लागू हो गया. इस तरह कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो किसी भी व्यापारिक साझेदार पर लगाए गए सबसे ऊंचे शुल्कों में से एक था. निर्यातकों के अनुसार, इस फैसले से व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ.

कुल निर्यात के आंकड़े

एपीडा (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने 2,89,594.37 टन तैयार और संरक्षित खीरे व घेरकिन का निर्यात किया. इसकी कुल कीमत 306.72 मिलियन डॉलर रही. ये आंकड़े वाणिज्यिक खुफिया एवं सांख्यिकी महानिदेशालय के डेटा पर आधारित हैं.

निर्यातकों ने क्या कहा?

इंडियन घेरकिन्स एसोसिएशन के वाइस-प्रेसिडेंट प्रदीप पूवय्या ने बताया कि 50 प्रतिशत शुल्क के कारण अमेरिका को जाने वाले निर्यात में लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई. उन्होंने कहा कि अब शुल्क घटकर 18 प्रतिशत हो गया है, इसलिए अगले दो महीनों में निर्यात की मात्रा फिर से पहले जैसी हो सकती है.

इंटरनेशनल एग्रीकल्चरल प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (IAP) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी और निदेशक सोमनना मुक्कटीरा कावेरीप्पा ने बताया कि पारस्परिक शुल्क से पहले भी भारतीय घेरकिन पर 7.7 से 9.6 प्रतिशत तक शुल्क लगता था. 50 प्रतिशत शुल्क इसी के ऊपर लगाया गया था. उन्होंने कहा कि 18 प्रतिशत अब भी अतिरिक्त बोझ है और हम पहले वाली स्थिति में पूरी तरह नहीं लौटे हैं. लेकिन यदि यह दर स्थिर रहती है तो कारोबार भी स्थिर रहेगा.

कोएलमैन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्लांट मैनेजर संदीप राठौर ने बताया कि असर बहुत गंभीर था. “पहले जहां 100 कंटेनर भेजे जाते थे, वहां पिछले साल मुश्किल से 20 कंटेनर ही भेजे जा सके. अमेरिका का बाजार लगभग बंद जैसा हो गया था.,”

यूरोप से लाभ धीरे-धीरे

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता 27 जनवरी को अंतिम रूप से तय हुआ है. इसका मकसद वस्तुओं और सेवाओं पर शुल्क घटाना या खत्म करना है. प्रदीप पूवय्या के अनुसार, शुल्क में कटौती चरणबद्ध तरीके से होगी, इसलिए अगले एक साल में बड़ा बदलाव नहीं दिखेगा. संदीप राठौर का कहना है कि यूरोप मात्रा तो देता है, लेकिन मुनाफा अमेरिका जितना नहीं मिलता. अगर भविष्य में यूरोप में शुल्क शून्य हो जाता है, तो भारत तुर्की जैसे देशों से मुकाबले में मजबूत स्थिति में आ सकता है.

कर्नाटक सबसे आगे

भारत के कुल घेरकिन निर्यात में कर्नाटक का योगदान 60 से 70 प्रतिशत तक है. इसके बाद तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का स्थान है. इन राज्यों के हजारों किसान इस फसल से जुड़े हैं.

नए बाजारों की तलाश

निर्यातक अब मेक्सिको और चिली जैसे उभरते बाजारों पर भी नजर रख रहे हैं. उद्योग को उम्मीद है कि अमेरिका में 18 प्रतिशत शुल्क के साथ निर्यात दोबारा पटरी पर आएगा, जबकि यूरोप से मिलने वाला लाभ धीरे-धीरे बढ़ेगा.

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