Seed Sitaphal: महाराष्ट्र की जब भी बात होती है, तो लोगों के जहन में सबसे पहले अंगूर और संतरे की तस्वीर उभरकर सामने आती है. लोगों को लगता है कि महाराष्ट्र में केवल इन्हीं दो फलों की खेती हुई है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. महाराष्ट्र के बीड जिले में कस्टर्ड एप्पल यानी सीताफल की भी बड़े स्तर पर खेती होती है. इसकी सप्लाई भारत नहीं, बल्कि कई विदेशों में भी होती है. खास बात यह है कि महाराष्ट्र के बीड सीताफल को जीआई टैग भी मिला हुआ है. ऐसे में अगर किसान सीताफल की खेती करते हैं, तो बंपर कमाई होगी. तो आइए जानते हैं बीड सीताफल की खासियत के बारे में.
महाराष्ट्र का बीड जिला दक्कन पठार पर स्थित है. यहां की बालाघाट पहाड़ियां सीताफल की खेती के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती हैं. बीड के बालाघाट जंगलों में सीताफल के पेड़ प्राकृतिक रूप से पनपते हैं, जहां कम पानी और साधारण मिट्टी में भी ये अच्छी तरह बढ़ते हैं. बालाघाट क्षेत्र का सीताफल अपने स्वाद और गुणवत्ता के कारण पिछले 400 वर्षों से खास पहचान बनाए हुए है. वर्ष 2012-13 में बीड जिले में करीब 689.27 हेक्टेयर क्षेत्र में सीताफल की खेती की गई थी. जिले के किज, धारूर, मंजर्सुंबा, अंबाजोगाई और बालाघाट क्षेत्र इसके प्रमुख उत्पादन क्षेत्र हैं. बीड का सीताफल गोल आकार, चमकदार हरे रंग, मुलायम बनावट, सुगंधित स्वाद और पकने पर अंदर से क्रीमी सफेद या हल्के पीले रंग के कारण आसानी से पहचाना जाता है.
इस तरह की मिट्टी में होती है सीताफल की खेती
सीताफल पथरीली, बंजर या कम उपजाऊ जमीन पर भी उग सकता है, लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए अच्छी जल-निकास वाली उपजाऊ और सामान्य pH वाली मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है. इसके पौधों की जड़ें ज्यादा गहरी नहीं होतीं, इसलिए बहुत गहरी मिट्टी जरूरी नहीं होती. बीड जिले के आसपास का क्षेत्र पथरीली और कंकरीली है. उसमें मौजूद पोटैशियम और सूक्ष्म पोषक तत्व सीताफल को खास और अनोखा स्वाद देते हैं.
रिड्यूसिंग शुगर लगभग 17.97 फीसदी अधिक होती है
बीड के सीताफल में कुल शर्करा करीब 20.12 फीसदी और रिड्यूसिंग शुगर लगभग 17.97 फीसदी अधिक होती है, जिससे यह अन्य किस्मों जैसे मैमथ 16.6 फीसदी और वॉशिंगटन 15.7 फीसदी की तुलना में ज्यादा मीठा होता है. यह फल वजन में भारी होता है और इसमें गूदा भी अधिक मात्रा में निकलता है. इसका गूदा रसदार, क्रीमी सफेद और मुलायम होता है, जो इसकी खास पहचान है. बीड के सीताफल में गूदे की मात्रा ज्यादा लगभग 47 फीसदी से अधिक होती है और इसमें बीज अपेक्षाकृत कम, करीब 24 से 50 तक होते हैं.
कब करते हैं बीड सीताफल की बुवाई
सीताफल की खेती के लिए सबसे अच्छा समय जुलाई- अगस्त या फरवरी-मार्च है. मिट्टी हल्की रेतीली, पथरीली या दोमट (pH 5.5-7.0) होनी चाहिए. रोपण के लिए पौधे 5×5 मीटर (या 12×8 फीट) की दूरी पर लगाएं. गड्ढा 2x2x2 फीट खोदकर 15 दिन धूप में छोड़ें, फिर उसमें गोबर, सिंगल सुपर फॉस्फेट और पोटाश का मिश्रण भरें. सीताफल सूखा सहिष्णु है, लेकिन फूल आने के समय ड्रिप सिंचाई करने से उपज बढ़ती है. पौधे रोपने के 3-4 साल बाद फल देने लगते हैं, जो अगस्त से अक्टूबर तक पकते हैं. ऐसे वजन के मामले में भी बीड का सीताफल आगे है. इसका औसत वजन 240 से 380 ग्राम (लगभग 378 ग्राम तक) होता है. वहीं अन्य किस्मों में मैमथ का वजन करीब 183 ग्राम, रेड सीताफल 231 ग्राम, वॉशिंगटन 165 ग्राम और ब्रिटिश गयाना 181 ग्राम होता है.
बीड सीताफल की खासियत
- औसत उत्पादन: लगभग 10.89 किलोग्राम प्रति पौधा
- फल का वजन: 378.38 ग्राम
- छिलके का वजन: 165.5 ग्राम
- गूदे का रंग: क्रीमी सफेद और मात्रा में अधिक
- गूदे का वजन: 177.99 ग्राम
- गूदे का प्रतिशत: 47.44 फीसदी
- बीज की संख्या: लगभग 24 से 50 (औसत 47.44)
- बीज का वजन: 30.65 ग्राम
महाराष्ट्र का बीड जिला देश में सीताफल उत्पादन में सबसे आगे है और यहां 92,320 टन उत्पादन होता है. इसके बाद गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ हैं. सीताफल असम, बिहार, ओडिशा और राजस्थान में भी उगाया जाता है. भारत सीताफल का प्रमुख उत्पादक देश है और इसे अमेरिका, सऊदी अरब, कनाडा, UAE और कई यूरोपीय देशों में निर्यात किया जाता है. निर्यात के लिए इसे ताजा, जमे हुए या मूल्य संवर्धित उत्पाद के रूप में भेजा जा सकता है. खास बात यह है कि बीड सीताफल को 2016 में भौगोलिक संकेत (GI Tag) का दर्जा मिला है.
सीताफल का इन देशों में होता है निर्यात
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
- ओमान
- सऊदी अरब
- कुवैत
- बांग्लादेश
- बहरीन
- कतर
- यूनाइटेड किंगडम (UK)
- सिंगापुर
- संयुक्त राज्य अमेरिका (USA)