अमेरिका की चेतावनी: भारत में जुलाई से पहले एक्टिव हो सकता है अल नीनो, खेती पर मंडरा रहा बड़ा खतरा
साल 2023 में भी जब अल नीनो आया था, तब देश में केवल 94 प्रतिशत बारिश हुई थी. उस समय कई राज्यों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रही थी और फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ था. सबसे ज्यादा असर धान, दाल और तिलहन की खेती पर पड़ा था. अगर इस बार भी वैसी स्थिति बनती है, तो किसानों की परेशानी बढ़ सकती है.
EL NINO news: दुनिया भर की मौसम एजेंसियां इस समय एक बार फिर “अल नीनो” को लेकर चिंता जता रही हैं. अमेरिका की जलवायु एजेंसी NOAA (नेशनल ओशियैनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC) ने कहा है कि मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो बनने की संभावना 61 प्रतिशत तक पहुंच गई है.
हालांकि फिलहाल ENSO यानी अल नीनो-सदर्न ऑस्सिलेशन की स्थिति न्यूट्रल बनी हुई है, लेकिन प्रशांत महासागर में तेजी से बदलते समुद्री तापमान ने मौसम वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों, खासकर भारत के मानसून पर पड़ सकता है. अगर अल नीनो मजबूत होता है, तो इसका असर खेती, जल संकट, बिजली उत्पादन और खाद्य महंगाई तक देखने को मिल सकता है.
आखिर क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक मौसमी स्थिति है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है. जब ऐसा होता है, तो दुनिया के कई हिस्सों का मौसम प्रभावित होता है. भारत में इसका सीधा असर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है. आमतौर पर अल नीनो के दौरान बारिश कम होती है और सूखे जैसी स्थिति बनने लगती है.
समुद्र का बढ़ता तापमान बना चिंता
अमेरिकी एजेंसी CPC के मुताबिक फरवरी 2026 से पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा रहने लगा है. अप्रैल के मध्य तक यह गर्म पानी लगभग पूरे भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में फैल गया. इसके साथ ही समुद्र के नीचे का तापमान भी लगातार बढ़ रहा है. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव अल नीनो बनने का शुरुआती संकेत माना जाता है.
भारत के मानसून पर क्या असर पड़ेगा?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) पहले ही इस साल सामान्य से कम मानसून की संभावना जता चुका है. IMD के अनुसार 2026 में मानसून बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA) का लगभग 92 प्रतिशत रह सकती है. अगर अल नीनो मजबूत हुआ, तो मानसून और कमजोर पड़ सकता है. इससे खेती पर बड़ा असर पड़ सकता है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी अब भी खेती और बारिश पर निर्भर है.
किसानों के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
भारत में खरीफ फसल की बुवाई मानसून पर काफी हद तक निर्भर करती है. धान, दालें, तिलहन और कई दूसरी फसलें बारिश कम होने से प्रभावित हो सकती हैं. साल 2023 में भी जब अल नीनो आया था, तब देश में केवल 94 प्रतिशत बारिश हुई थी. उस समय कई राज्यों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रही थी और फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ था. सबसे ज्यादा असर धान, दाल और तिलहन की खेती पर पड़ा था. अगर इस बार भी वैसी स्थिति बनती है, तो किसानों की परेशानी बढ़ सकती है.
जल संकट और बिजली उत्पादन पर भी असर
कम बारिश का असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहता. इससे बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर भी घट जाता है. रिपोर्ट के मुताबिक इस समय देश के बड़े जलाशयों में पानी का भंडारण क्षमता के 40 प्रतिशत से भी कम है. अगर मानसून कमजोर रहा, तो आने वाले महीनों में कई राज्यों में पानी की कमी बढ़ सकती है. हाइड्रो पावर यानी जल विद्युत उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है.
जनवरी 2027 तक रह सकता है असर
IMD ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि अल नीनो का असर जनवरी 2027 तक बना रह सकता है. इसका मतलब यह है कि केवल खरीफ ही नहीं, बल्कि अक्टूबर से शुरू होने वाली रबी फसलों की बुवाई भी प्रभावित हो सकती है. अगर लंबे समय तक बारिश कम रहती है, तो गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों पर भी असर पड़ सकता है.
क्या आ सकता है सुपर अल नीनो?
दुनिया की कई मौसम एजेंसियां इस बार “सुपर अल नीनो” की आशंका भी जता रही हैं. जापान की समुद्री और पृथ्वी विज्ञान एजेंसी के वैज्ञानिक स्वाधीन बेहरा के मुताबिक, 2026 का अल नीनो 2023 से ज्यादा मजबूत हो सकता है और 2015 जैसे खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है. 2015 का अल नीनो दुनिया के सबसे ताकतवर अल नीनो घटनाओं में गिना जाता है, जिसने कई देशों में सूखा, गर्मी और फसल संकट पैदा कर दिया था.
भारतीय महासागर से मिल सकती है राहत
हालांकि मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत के लिए एक राहत की उम्मीद भी बनी हुई है. अगर इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) सक्रिय होता है, तो यह अल नीनो के असर को कुछ हद तक कम कर सकता है. IOD एक ऐसी समुद्री मौसमी स्थिति है, जो भारतीय महासागर के तापमान को प्रभावित करती है. सकारात्मक IOD की स्थिति भारत में बारिश बढ़ाने में मदद कर सकती है.
अभी मौसम वैज्ञानिक लगातार प्रशांत महासागर की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं. अगले दो से तीन महीने काफी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं. अगर समुद्र का तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो जुलाई तक अल नीनो पूरी तरह सक्रिय हो सकता है. इसका असर भारत समेत कई एशियाई देशों के मौसम और अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है.