IMD की चेतावनी: इस साल सामान्य से कम बारिश, खेती और महंगाई पर पड़ सकता है बड़ा असर

पूर्वानुमान के मुताबिक देश के कई हिस्सों में कम बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश भी संभव है. पूर्वोत्तर भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य या थोड़ी बेहतर बारिश की संभावना जताई गई है. लेकिन बाकी बड़े हिस्सों में बारिश कम रहने का खतरा है.

नई दिल्ली | Published: 14 Apr, 2026 | 10:12 AM

Monsoon forecast: भारत में मानसून को खेती और अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा माना जाता है. लेकिन इस बार मानसून को लेकर मौसम विभाग (IMD) ने चेतावनी दी है, साल 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम यानी “बिलो नॉर्मल” रह सकता है. यह अनुमान ऐसे समय आया है जब पहले से ही महंगाई, उत्पादन और वैश्विक हालात को लेकर चिंता बनी हुई है.

क्या कहता है मौसम विभाग का पूर्वानुमान

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, इस साल मानसून बारिश देश में औसत के मुकाबले करीब 92 प्रतिशत रहने की संभावना है. इसे “बिलो नॉर्मल” श्रेणी में रखा जाता है. लंबी अवधि का औसत (LPA) 87 सेंटीमीटर माना जाता है, और सामान्य मानसून 96 से 104 प्रतिशत के बीच होता है. ऐसे में 92 प्रतिशत का अनुमान सामान्य से कम बारिश की ओर इशारा करता है.

मौसम विभाग ने यह भी बताया कि इस अनुमान में ±5 प्रतिशत तक का अंतर हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना ज्यादा है.

किन इलाकों में कैसा रहेगा असर

पूर्वानुमान के मुताबिक देश के कई हिस्सों में कम बारिश हो सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में सामान्य या उससे ज्यादा बारिश भी संभव है. पूर्वोत्तर भारत, उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में सामान्य या थोड़ी बेहतर बारिश की संभावना जताई गई है. लेकिन बाकी बड़े हिस्सों में बारिश कम रहने का खतरा है, जिससे खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ सकता है.

अल नीनो बना मुख्य कारण

इस बार कमजोर मानसून का सबसे बड़ा कारण “अल नीनो” बताया जा रहा है. अल नीनो एक जलवायु प्रणाली है, जिसमें प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ जाता है और इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है. जब अल नीनो सक्रिय होता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है.

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस साल जुलाई, अगस्त और सितंबर के दौरान अल नीनो का असर ज्यादा देखने को मिल सकता है, यानी मानसून के दूसरे हिस्से में बारिश पर ज्यादा असर पड़ेगा.

बारिश के अनुमान की संभावना कितनी

मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस साल “डिफिशिएंट” यानी बहुत कम बारिश होने की संभावना 35 प्रतिशत है. वहीं “बिलो नॉर्मल” रहने की संभावना 31 प्रतिशत है. सामान्य बारिश की संभावना 27 प्रतिशत है, जबकि सामान्य से ज्यादा बारिश होने की संभावना काफी कम यानी सिर्फ 6 प्रतिशत बताई गई है. इससे साफ है कि इस बार मानसून कमजोर रहने की आशंका ज्यादा है.

किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर

भारत में करीब 51 प्रतिशत खेती का क्षेत्र बारिश पर निर्भर है और कुल कृषि उत्पादन का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा मानसून पर टिका होता है. इसके अलावा देश की लगभग 47 प्रतिशत आबादी की आजीविका सीधे तौर पर खेती से जुड़ी है. ऐसे में कमजोर मानसून का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

कम बारिश होने से फसलों की पैदावार घट सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में खर्च करने की क्षमता भी कम हो सकती है.

वैश्विक हालात से भी बढ़ी चिंता

इस समय पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और वैश्विक अस्थिरता के कारण पहले ही ऊर्जा और उर्वरक की सप्लाई प्रभावित हो सकती है. अगर मानसून भी कमजोर रहा, तो किसानों के लिए लागत बढ़ेगी और उत्पादन घटेगा, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है.

किसानों को क्या करना चाहिए

विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को इस साल ज्यादा पानी वाली फसलों से बचना चाहिए और कम पानी में उगने वाली फसलों पर ध्यान देना चाहिए. साथ ही, पानी के बेहतर प्रबंधन और वैकल्पिक खेती के तरीकों को अपनाने की जरूरत होगी, ताकि नुकसान को कम किया जा सके.

इसी के साथ मौसम विभाग मई के अंत में मानसून का दूसरा और अधिक विस्तृत पूर्वानुमान जारी करेगा, जिसमें अलग-अलग क्षेत्रों के लिए ज्यादा स्पष्ट जानकारी दी जाएगी. फिलहाल यह पहला संकेत है कि इस साल मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है, इसलिए सरकार और किसानों दोनों को पहले से तैयारी करनी होगी.

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