अमेरिकी मौसम एजेंसी का अलर्ट: जून-अगस्त में अल नीनो बनने का अनुमान, मानसून पर पड़ सकता है असर

अमेरिकी एजेंसी के ताजा अपडेट के अनुसार जून से अगस्त के बीच एल नीनो बनने की संभावना 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यही समय भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का मुख्य दौर होता है. एजेंसी का कहना है कि अगर यह स्थिति आगे बढ़ती है तो आने वाले महीनों में एल नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक हो सकती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 14 Mar, 2026 | 11:33 AM

El Nino 2026 forecast: भारत में इस साल मानसून को लेकर नई चिंता सामने आई है. अमेरिका की मौसम एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने अपने ताजा पूर्वानुमान में कहा है कि अल नीनो (El Niño) इस साल मानसून के शुरुआती महीनों में ही सक्रिय हो सकता है. यदि ऐसा होता है तो भारत में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ सकती है.

मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि अल नीनो की स्थिति बनने पर अक्सर भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है. ऐसे में सरकार और कृषि क्षेत्र को पहले से तैयारी करने की जरूरत हो सकती है.

जून-अगस्त के बीच बन सकता है अल नीनो

अमेरिकी एजेंसी के ताजा अपडेट के अनुसार जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना 62 प्रतिशत तक पहुंच गई है. यही समय भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का मुख्य दौर होता है. एजेंसी का कहना है कि अगर यह स्थिति आगे बढ़ती है तो आने वाले महीनों में अल नीनो बनने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक हो सकती है.

इससे पहले 12 फरवरी को जारी रिपोर्ट में जुलाई से सितंबर के बीच अल नीनो बनने की संभावना करीब 52 प्रतिशत बताई गई थी, जो बाद के महीनों में लगभग 60 प्रतिशत तक जाने की संभावना थी. नए अपडेट में यह संभावना पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है.

 

क्या होता है अल नीनो

अल नीनो दरअसल प्रशां

त महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के असामान्य रूप से बढ़ने से बनने वाली स्थिति है. इससे समुद्री हवाओं के पैटर्न बदल जाते हैं और दुनिया के कई हिस्सों में मौसम पर इसका असर पड़ता है.

भारत में अल नीनो का सीधा संबंध अक्सर कमजोर मानसून से जोड़ा जाता है. जब अल नीनो मजबूत होता है तो देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जाती है.

मानसून पर असर की संभावना

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, पूर्व केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव और वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक एम. राजीवन (M Rajeevan) ने कहा कि अगले दो महीनों में स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी, लेकिन अभी जो संकेत मिल रहे हैं उनसे यह माना जा सकता है कि इस साल अल नीनो बनने की संभावना काफी मजबूत है. उन्होंने कहा कि अल नीनो का भारत में मानसून की बारिश पर अक्सर नकारात्मक असर पड़ता है, इसलिए सरकार को संभावित स्थिति को ध्यान में रखते हुए तैयारी करनी चाहिए.

पिछले वर्षों का अनुभव

1980 के बाद से अब तक 14 बार अल नीनो की स्थिति देखी गई है. इनमें से 9 वर्षों में भारत में सामान्य से कम मानसून दर्ज किया गया था. इन वर्षों में बारिश लंबे समय के औसत से कम से कम 10 प्रतिशत तक कम रही थी. हालांकि कुछ साल ऐसे भी रहे हैं जब अल नीनो के बावजूद मानसून सामान्य रहा. उदाहरण के तौर पर 1997 में बहुत मजबूत अल नीनो के बावजूद भारत में मानसून सामान्य रहा था.

इंडियन ओशन डिपोल भी निभा सकता है भूमिका

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ परिस्थितियों में इंडियन ओशन डिपोल (IOD) अल नीनो के प्रभाव को कम कर सकता है. 1997 में भी सकारात्मक IOD ने अल नीनो के असर को काफी हद तक संतुलित कर दिया था. IOD समुद्र के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच तापमान के अंतर को मापता है. यदि यह सकारात्मक रहता है तो भारत में मानसून को कुछ राहत मिल सकती है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि IOD का पूर्वानुमान उतना भरोसेमंद नहीं होता जितना अल नीनो का होता है.

यूरोप की एजेंसी ने भी जताई चिंता

इस बीच यूरोपीय सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट (ECMWF) ने भी प्रशांत महासागर के तेजी से गर्म होने का संकेत दिया है. यूरोपीय एजेंसी का अनुमान है कि इस साल के अंत तक बहुत मजबूत या ‘सुपर अल नीनो’ बनने की स्थिति भी बन सकती है. यदि ऐसा होता है तो दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और हीटवेव की संभावना बढ़ सकती है.

कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण संकेत

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून का सीधा असर खेती, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. ऐसे में अल नीनो की संभावना बढ़ने से कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो सरकार को पहले से जल प्रबंधन, फसल योजना और खाद्य सुरक्षा से जुड़े कदम उठाने होंगे.

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