दिल्ली में प्रदूषण के लिए किसान जिम्मेदार नहीं, पराली जलाने और प्रबंधन पर कृषि मंत्रालय का आया जवाब
Stubble Managemnet Scheme: केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि शीतकाल में भी पराली का योगदान 5 फीसदी से अधिक नहीं, जबकि बड़ा हिस्सा औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाले धुएं का है.
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने केंद्र सरकार को बताया है कि दिल्ली एनसीआर के प्रदूषण में पराली जलाने से होने वाले धुएं का अधिकतम योगदान 5 फीसदी रहा है. इसलिए प्रदूषण के लिए किसान जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि दिल्ली के लोग, यहां का ट्रांसपोर्टेशन और निर्माण और अन्य गतिविधियां जिम्मेदार हैं. मंत्रालय की ओर से शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि पराली प्रबंधन के लिए किसानों को कृषि उपकरणों पर 40 से 80 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है. इससे पराली जलाने के मामलों में रिकॉर्ड स्तर पर कम हो चुके हैं.
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कहा कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का कारण केवल पराली और किसान नहीं हैं, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुका है कि शीतकाल में भी पराली का योगदान 5 फीसदी से अधिक नहीं, जबकि बड़ा हिस्सा औद्योगिक इकाइयों और वाहनों से निकलने वाले धुएं का है. ऐसे में हर बार केवल किसान को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं है.
पराली प्रबंधन मशीनों के लिए 50 और 80 फीसदी सब्सिडी योजना
उन्होंने माना कि पराली जलाने से मित्र कीट, न्यूट्रिएंट्स, ऑर्गेनिक कार्बन नष्ट होते हैं, मिट्टी की उर्वरता घटती है और प्रदूषण भी बढ़ता है. इसलिए सरकार ने Crop Residue Management (CRM) योजना के तहत किसानों को पराली प्रबंधन मशीनों पर 50 फीसदी सब्सिडी और FPO/संस्थाओं को कस्टम हायरिंग सेंटर खोलने पर 80 फीसदी सब्सिडी दे रही है. इससे पराली जलाने की बजाय चारा और दूसरे उत्पाद बनाने में तेजी आई है.
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पंजाब हरियाणा और यूपी में 3.5 लाख मशीनों को किसानों को दी गईं
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में अब तक 3.5 लाख से अधिक मशीनें वितरित की गई हैं. पंजाब में 1,60,296, हरियाणा में 1,10,550 और उत्तर प्रदेश में 76,135 मशीनों का वितरण किया जा चुका है. इसके चलते पराली जलाने की घटनाएं लगातार घटी हैं. मेरठ, शामली, हापुड़, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत और गौतमबुद्ध नगर में 11 पैलेटिंग मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट स्थापित किए गए हैं और 32.63 हजार टन भंडारण क्षमता विकसित कर पराली को चारा समेत अन्य संसाधनों में बदला जा रहा है.
पराली प्रबंधन के लिए नकद राशि देती है सरकार
हरियाणा मॉडल की सराहना करते हुए उन्होंने बताया कि राज्य सरकार In-situ और Ex-situ प्रबंधन के लिए प्रति एकड़ 1,000 रुपये दिए जा रहे हैं. वहीं, मेरा पानी-मेरी विरासत के तहत धान के स्थान पर अन्य फसलों के लिए प्रति एकड़ 7,000 रुपये दिए जा रहे हैं. डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) के लिए प्रति एकड़ 4,000 रुपये किसानों को दिए जा रहे हैं. पराली न जलाने पर रेड जोन पंचायतों को 1,00,000 रुपये और येलो जोन पंचायतों को 50,000 रुपये की मदद दी जा रही है. गौशालाओं तक पराली पहुंचाने के लिए प्रति ट्रांसपोर्ट 500 रुपये और अधिकतम 15,000 रुपये तक सहायता दी जा रही है.
पराली से चारा बनाकर कमाई कर रहे किसान
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने धान की पराली को कीमती संसाधन बताते हुए कहा कि Ex-situ मैनेजमेंट के तहत क्लस्टर आधारित सप्लाई चेन, बंडलिंग और ट्रांसपोर्ट से इसे पैलेटिंग, थर्मल पावर प्लांट, बायोमास इंडस्ट्री, बायो-CNG और फ्यूल जैसी इंडस्ट्री के लिए फीडस्टॉक बनाया जा रहा है. इससे पशुओं को पोषक चारा तो मिल ही रहा है, किसानों की कमाई भी बढ़ी है.