भारत ने रद्द किए 75 हजार टन सोयाबीन तेल के सौदे, व्यापारियों ने कमाया मोटा मुनाफा, जानिए क्यों लिया गया फैसला

Soybean oil imports: कीमतों में अचानक आई तेजी ने व्यापारियों को पहले किए गए सौदों से बाहर निकलने और मुनाफा कमाने का मौका दे दिया. ऐसे में कई आयातकों ने अप्रैल से जुलाई के बीच आने वाली खेपों को रद्द कर दिया और ऊंचे दाम पर सौदे वापस बेच दिए.

नई दिल्ली | Published: 26 Feb, 2026 | 09:51 AM

Soybean oil imports: दुनिया के सबसे बड़े सोयाबीन तेल आयातक भारत ने हाल के दिनों में एक बड़ा फैसला लिया है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोयाबीन तेल की कीमतों में तेजी आने के बाद भारतीय आयातकों ने दक्षिण अमेरिका से मंगाई जा रही 65 हजार से 75 हजार टन तक की खेप रद्द कर दी है. बताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह मात्रा बढ़कर एक लाख टन से भी अधिक हो सकती है.

कीमतों में अचानक आई तेजी ने व्यापारियों को पहले किए गए सौदों से बाहर निकलने और मुनाफा कमाने का मौका दे दिया. ऐसे में कई आयातकों ने अप्रैल से जुलाई के बीच आने वाली खेपों को रद्द कर दिया और ऊंचे दाम पर सौदे वापस बेच दिए.

क्यों रद्द हुए सौदे?

बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनिसार, कुछ महीने पहले भारतीय कंपनियों ने सोयाबीन तेल के आयात के लिए 1,080 से 1,100 डॉलर प्रति टन के भाव पर अनुबंध किए थे. लेकिन हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़कर लगभग 1,140 से 1,147 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गईं.

इस बढ़ोतरी का फायदा उठाते हुए कई खरीदारों ने पुराने अनुबंधों से बाहर निकलने का फैसला किया. इस प्रक्रिया को व्यापार की भाषा में “वॉश आउट” कहा जाता है, जिसमें खरीदार वास्तविक माल लेने के बजाय सौदा ऊंची कीमत पर वापस बेच देता है. इससे प्रति टन 40 से 60 डॉलर तक का फायदा मिल रहा है.

वैश्विक बाजार में क्यों आई तेजी?

शिकागो में सोयाबीन तेल के बेंचमार्क वायदा भाव दो साल के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं. इसकी कई वजहें हैं. कच्चे तेल की कीमतों में मजबूती से बायोफ्यूल की मांग बढ़ी है. अमेरिका में जैव ईंधन मिश्रण को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं, जिससे सोयाबीन तेल की खपत बढ़ने की उम्मीद है.

इसके अलावा अमेरिका और भारत के बीच हालिया व्यापार समझौतों को लेकर बाजार में सकारात्मक माहौल बना है. वैश्विक स्तर पर बेहतर व्यापार भावना और ऊर्जा कीमतों में मजबूती ने भी सोयाबीन तेल को सहारा दिया है.

दक्षिण अमेरिका की रिकॉर्ड फसल का असर

भारत के आयातकों को उम्मीद है कि अप्रैल से जुलाई के बीच दक्षिण अमेरिका में सोयाबीन की रिकॉर्ड फसल बाजार में आएगी. ब्राजील और अर्जेंटीना से बड़ी मात्रा में सप्लाई आने की संभावना है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. यही कारण है कि कई भारतीय व्यापारी फिलहाल ऊंचे दाम पर मुनाफा लेकर सौदे रद्द कर रहे हैं, ताकि भविष्य में सस्ते भाव पर फिर से खरीदारी कर सकें.

पहले भी हो चुकी है रद्दीकरण की घटना

यह पहली बार नहीं है जब भारत ने सोयाबीन तेल की खेप रद्द की हो. इससे पहले भी रुपये में कमजोरी और ऊंची कीमतों के कारण भारत ने ब्राजील और अर्जेंटीना से 35 से 40 हजार टन तक के सौदे रद्द किए थे. दिसंबर में भी अर्जेंटीना से 1 लाख टन से ज्यादा की खेप या तो रद्द की गई थी या टाल दी गई थी. रुपये की गिरावट ने आयात महंगा कर दिया था, जिससे कई सौदे घाटे का कारण बन रहे थे.

घरेलू बाजार पर क्या होगा असर?

फिलहाल भारत में सोयाबीन तेल की उपलब्धता पर्याप्त बताई जा रही है. घरेलू स्टॉक संतोषजनक है और आने वाले महीनों में नई अंतरराष्ट्रीय सप्लाई की उम्मीद भी है. ऐसे में आयातकों को तत्काल दबाव नहीं है. हालांकि, अगर वैश्विक कीमतों में तेजी लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर घरेलू खाद्य तेल बाजार पर भी पड़ सकता है. फिलहाल व्यापारी सावधानी बरतते हुए “इन एंड आउट” ट्रेडिंग रणनीति अपना रहे हैं.

वहीं बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में सोयाबीन तेल की कीमतें दक्षिण अमेरिका की फसल पर निर्भर करेंगी. यदि फसल अनुमान के मुताबिक बेहतर रहती है तो कीमतों में नरमी आ सकती है.

भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह समय रणनीतिक फैसलों का है. ऊंची कीमतों पर मुनाफा लेकर सौदे रद्द करना एक कारोबारी रणनीति है, लेकिन लंबे समय में स्थिर सप्लाई और संतुलित कीमतें ही घरेलू उपभोक्ताओं के हित में होंगी. फिलहाल इतना तय है कि वैश्विक बाजार की हलचल का असर भारत के खाद्य तेल व्यापार पर साफ दिखाई दे रहा है, और आने वाले महीनों में यह उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है.

 

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