लोगों को महंगाई से मिलेगी राहत…कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के दामों में आ सकती है भारी गिरावट

भारत में तिलहन उत्पादन मांग के मुकाबले कम है. यही कारण है कि देश अपनी लगभग 70 प्रतिशत खाद्य तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है. जब आयात महंगा होता है तो बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, और जब शुल्क कम किया जाता है तो कीमतों में गिरावट की संभावना बनती है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 24 Feb, 2026 | 03:32 PM

Cooking oil price reduction: पिछले कुछ समय से रसोई का बजट लगातार बढ़ रहा था. दाल, सब्जी और गैस के साथ-साथ खाने के तेल की कीमतों ने भी आम परिवारों की जेब पर असर डाला. आधुनिक रसोई में तड़का लगाने से लेकर फ्राइंग और बेकिंग तक, तेल का उपयोग पहले से कहीं ज्यादा हो गया है. ऐसे में केंद्र सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए कच्चे खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटा दिया है. यह नई व्यवस्था 31 मई से पूरे देश में लागू होगी. माना जा रहा है कि इस कदम से आने वाले दिनों में बाजार में तेल के दाम नरम पड़ सकते हैं और उपभोक्ताओं को सीधी राहत मिलेगी.

किन तेलों पर घटा आयात शुल्क

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब तक कच्चे पाम तेल, कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे सूरजमुखी तेल पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाता था. सरकार ने इसे घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया है. इसका सीधा असर इन तेलों से बनने वाले रिफाइंड उत्पादों की लागत पर पड़ेगा. चूंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए आयात शुल्क में बदलाव का प्रभाव घरेलू बाजार में जल्दी दिखाई देता है.

भारत में तिलहन उत्पादन मांग के मुकाबले कम है. यही कारण है कि देश अपनी लगभग 70 प्रतिशत खाद्य तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है. जब आयात महंगा होता है तो बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, और जब शुल्क कम किया जाता है तो कीमतों में गिरावट की संभावना बनती है.

किन देशों से आता है तेल

भारत पाम तेल मुख्य रूप से इंडोनेशिया, मलेशिया और थाईलैंड से मंगाता है. वहीं सूरजमुखी तेल अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन से आयात होता है. आयात शुल्क में कमी के बाद इन तीन प्रमुख तेलों पर कुल कर भार घटकर पहले के मुकाबले काफी कम हो जाएगा. सितंबर 2024 में जब शुल्क बढ़ाया गया था, तब खुदरा कीमतों में तेजी देखी गई थी. अब माना जा रहा है कि हालिया कटौती से वही दबाव कम होगा.

बाजार पर नजर और सख्त निगरानी

सरकार केवल शुल्क घटाकर नहीं रुकी है, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रही है कि इसका फायदा सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचे. उपभोक्ता मामलों से जुड़े विभाग द्वारा कई राज्यों में निरीक्षण किए जा रहे हैं. जिन राज्यों में खाद्य तेल की रिफाइनरी अधिक संख्या में हैं, वहां प्रोसेसिंग यूनिट और बंदरगाहों के पास स्थित भंडारण केंद्रों की जांच की जा रही है.

इस प्रक्रिया का मकसद यह देखना है कि थोक और खुदरा कीमतों में वास्तव में कितनी कमी आई है. पैक्ड रिफाइंड सूरजमुखी और सोयाबीन तेल की अधिकतम खुदरा कीमत में गिरावट का आकलन किया जा रहा है. कई कंपनियों ने पहले ही कीमतों में आंशिक कमी कर दी है और संकेत दिए हैं कि कम शुल्क पर आयातित नई खेप आने के बाद दाम और घट सकते हैं.

महंगाई पर काबू पाने की कोशिश

खाद्य तेल की बढ़ती कीमतें पिछले महीनों में महंगाई का एक प्रमुख कारण बनी थीं. ऐसे में आयात शुल्क में कटौती को महंगाई नियंत्रण के बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है. जब आवश्यक वस्तुओं की कीमतें घटती हैं तो आम परिवार की खरीद क्षमता बढ़ती है. इससे बाजार में मांग भी बढ़ सकती है और आर्थिक गतिविधियों को गति मिल सकती है.

उपभोक्ताओं के लिए क्या मायने

यदि तेल के दाम स्थिर या कम होते हैं, तो इसका सीधा लाभ घर-घर तक पहुंचेगा. होटल, रेस्टोरेंट और खाद्य उद्योग को भी लागत में राहत मिलेगी. हालांकि अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि आयातित सस्ता तेल कितनी तेजी से बाजार में पहुंचता है और कंपनियां कितनी जल्दी नई दरों का लाभ आगे बढ़ाती हैं.

कुल मिलाकर, आयात शुल्क में यह कटौती रसोई बजट को संतुलित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है. आने वाले हफ्तों में बाजार की चाल यह तय करेगी कि यह राहत कितनी गहरी और टिकाऊ साबित होती है.

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