महंगे शिपिंग खर्च ने बिगाड़ा भारतीय अंडा कारोबार, किसानों को रोज हो रहा करोड़ों का नुकसान
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय अंडों की मांग अभी भी मजबूत है. यूएई, ओमान, कतर और पश्चिम अफ्रीका जैसे देशों में भारत के अंडों की अच्छी मांग है, क्योंकि ईरान और तुर्किये से सप्लाई कम हो गई है. लेकिन जहाजों की कमी और शिपिंग में बाधाओं के कारण भारतीय निर्यातक इस मांग को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.
Egg export crisis: देश में अंडा उद्योग इस समय एक बड़े संकट से गुजर रहा है. एक तरफ विदेशों में भारतीय अंडों की मांग बनी हुई है, तो दूसरी तरफ युद्ध और बढ़ते शिपिंग खर्च ने निर्यातकों की कमर तोड़ दी है. हालात ऐसे बन गए हैं कि अंडों का निर्यात धीमा पड़ गया है और इसका सीधा असर घरेलू बाजार पर देखने को मिल रहा है. कीमतें गिर रही हैं और किसान घाटे में जा रहे हैं.
युद्ध और महंगे फ्रेट का असर
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव और युद्ध का असर अब व्यापार पर भी साफ दिखने लगा है. खासकर शिपिंग सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है. पहले जहां एक कंटेनर भेजने का खर्च करीब 1800 डॉलर होता था, अब वही बढ़कर 9500 से 10,500 डॉलर तक पहुंच गया है. इतनी बड़ी बढ़ोतरी ने निर्यातकों के मुनाफे को लगभग खत्म कर दिया है. कई मामलों में तो लागत भी निकल पाना मुश्किल हो गया है. ऐसे में निर्यात करना अब फायदे का सौदा नहीं रह गया है.
फंसे हुए कंटेनर बने बड़ी समस्या
शिपिंग में देरी के कारण कई कंटेनर बीच रास्ते में फंस गए हैं. कुल 125 कंटेनरों में से लगभग 90-95 अब अपने गंतव्य तक पहुंच चुके हैं, लेकिन अभी भी कुछ कंटेनर बंदरगाहों और समुद्र में फंसे हुए हैं. करीब 5 से 10 कंटेनर मुंबई के जेएनपीटी पोर्ट पर अटके हैं, जबकि लगभग 30 कंटेनर दम्माम के पास जहाज में फंसे हुए हैं. उम्मीद है कि ये कुछ दिनों में क्लियर हो जाएंगे, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका होगा.
सीमित समय में बढ़ी चिंता
अंडों की शेल्फ लाइफ लगभग 90 दिन होती है, लेकिन कई कंटेनरों में आधा समय पहले ही बीत चुका है. ऐसे में अगर समय पर डिलीवरी नहीं हुई, तो अंडे खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है. यही वजह है कि निर्यातकों के लिए हर दिन बेहद अहम बन गया है.
मांग है, लेकिन सप्लाई नहीं
दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय अंडों की मांग अभी भी मजबूत है. यूएई, ओमान, कतर और पश्चिम अफ्रीका जैसे देशों में भारत के अंडों की अच्छी मांग है, क्योंकि ईरान और तुर्किये से सप्लाई कम हो गई है. लेकिन जहाजों की कमी और शिपिंग में बाधाओं के कारण भारतीय निर्यातक इस मांग को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.
घरेलू बाजार में गिरते दाम
निर्यात में कमी का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है. जो अंडे विदेश जाने थे, वे अब देश में ही बिक रहे हैं, जिससे बाजार में सप्लाई बढ़ गई है. पहले जहां 100 अंडों की कीमत करीब 540 रुपये थी, अब यह गिरकर 430 रुपये के आसपास पहुंच गई है. जबकि उत्पादन लागत लगभग 450 रुपये है. यानी किसान हर दिन नुकसान उठा रहे हैं. अनुमान है कि दक्षिण भारत के किसानों को रोजाना करीब 5 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.
सीजन का भी पड़ा असर
इस समय मांग में कमी का एक कारण मौसमी बदलाव भी है. रमजान और ईस्टर के बाद खपत थोड़ी कम हो गई है. इसके अलावा मिड-डे मील में अंडों की मांग भी घटी है. गर्मी के मौसम में भी आमतौर पर अंडों की खपत कम हो जाती है, जिससे बाजार पर और दबाव बढ़ गया है.
सरकार से मदद की मांग
निर्यातकों का कहना है कि उन्हें सरकार से ज्यादा सहयोग की जरूरत है. फिलहाल एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (ECGC) से कुछ मदद मिल रही है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है. वे चाहते हैं कि शिपिंग की संख्या बढ़ाई जाए, खासकर कोच्चि जैसे बंदरगाहों से, और फ्रेट लागत को कम करने के लिए सब्सिडी दी जाए.
हालांकि स्थिति चुनौतीपूर्ण है, लेकिन उद्योग को उम्मीद है कि जैसे-जैसे शिपिंग व्यवस्था सुधरेगी और हालात सामान्य होंगे, निर्यात फिर से पटरी पर आ सकता है.