3 महीने में भारत ने मंगाया पूरे साल से ज्यादा तिलहन, 96 फीसदी आयात अकेले सोयाबीन का
Oilseed Import India: वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में भारत ने 5.80 लाख टन तिलहन आयात किया, जो पिछले पूरे वित्त वर्ष के आयात से भी ज्यादा है. आयात में सोयाबीन की हिस्सेदारी सबसे बड़ी रही. वहीं मूंगफली और तिल भारत के प्रमुख निर्यात उत्पाद बने हुए हैं.
Oilseed Export India 2026: वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत भारत के तिलहन कारोबार के लिए चिंता बढ़ाने वाली रही है. अप्रैल से जून 2026 के बीच देश ने जितना तिलहन विदेशों से खरीदा, उसके मुकाबले निर्यात कम रहा. सबसे बड़ी बात यह है कि सिर्फ पहली तिमाही में ही भारत का तिलहन आयात पिछले पूरे वित्त वर्ष के आयात से ज्यादा हो गया. वाणिज्य मंत्रालय के विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के आंकड़ों के आधार पर द सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) ने यह जानकारी जारी की है. आंकड़े बताते हैं कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत की विदेशी तिलहन पर निर्भरता बढ़ रही है.
तीन महीने में 5.80 लाख टन तिलहन का आयात
अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत ने कुल 5,80,119 टन तिलहन का आयात किया. इस पर करीब 3,146.98 करोड़ रुपये खर्च हुए. दूसरी ओर इसी दौरान देश से 2,09,197 टन तिलहन का निर्यात हुआ, जिससे 2,618.68 करोड़ रुपये की कमाई हुई. यानी मात्रा के साथ-साथ व्यापार के मूल्य को देखें तो भी पहली तिमाही में आयात का दबाव साफ नजर आता है. यह स्थिति तिलहन उत्पादन बढ़ाने और घरेलू जरूरतों को पूरा करने की चुनौती की ओर इशारा करती है.
सोयाबीन ने बढ़ाया आयात का बोझ
भारत के कुल तिलहन आयात में सोयाबीन का सबसे बड़ा हिस्सा रहा. पहली तिमाही में करीब 5.50 लाख टन सोयाबीन भारत आया, जिसकी कीमत लगभग 2,931 करोड़ रुपये रही. कुल आयात मात्रा में सोयाबीन की हिस्सेदारी करीब 96 फीसदी और आयात मूल्य में 93 फीसदी रही. यानी भारत के तिलहन आयात की पूरी तस्वीर काफी हद तक सोयाबीन पर टिकी हुई है. सोयाबीन का कुछ आयात अल्प विकसित देशों से भारत-अफ्रीका व्यापार समझौते के तहत हुआ. इस व्यवस्था में घरेलू बाजार के लिए सोयाबीन पर शून्य आयात शुल्क लागू है. इससे विदेशी सोयाबीन का भारत में आना आसान हो जाता है.
पूरे साल से ज्यादा आयात सिर्फ एक तिमाही में
आंकड़ों की सबसे अहम बात यह है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने पूरे साल में 4.81 लाख टन तिलहन का आयात किया था. इसकी कुल कीमत करीब 3,130 करोड़ रुपये थी. इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2026-27 के सिर्फ अप्रैल-जून में ही 5.80 लाख टन से ज्यादा तिलहन भारत पहुंच चुका है. यानी तीन महीने का आयात पिछले पूरे साल की मात्रा को पार कर गया है.
तिल के आयात में भी बढ़ोतरी
सोयाबीन के बाद तिल भारत का दूसरा सबसे ज्यादा आयात किया जाने वाला तिलहन रहा. पहली तिमाही में 20,728 टन तिल आयात किया गया, जिसकी कीमत करीब 189 करोड़ रुपये थी. तिल के अलावा 3,225.73 टन सूरजमुखी बीज और 828.70 टन सरसों का भी आयात हुआ. तिल के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में दक्षिण कोरिया, नाइजीरिया, सूडान, ब्राजील, सोमालिया, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम और जापान शामिल रहे.
मूंगफली और तिल से निर्यात को सहारा
निर्यात की बात करें तो मूंगफली और तिल भारत के लिए सबसे अहम तिलहन उत्पाद बने हुए हैं. अप्रैल-जून में छिलके वाली मूंगफली का 1,33,861 टन निर्यात हुआ, जिससे करीब 1,550 करोड़ रुपये की कमाई हुई. वहीं, तिल का 61,248 टन निर्यात हुआ और इससे करीब 945 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा मिली. सरसों का 9,067 टन, अलसी का 2,647.83 टन और कुसुम बीज का 1,004.91 टन निर्यात किया गया.
प्रोसेस्ड उत्पादों से बढ़ सकती है कमाई
उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि भारत को सिर्फ कच्ची मूंगफली और दूसरे तिलहन बेचने के बजाय प्रोसेस्ड और बेहतर तरीके से तैयार उत्पादों के निर्यात पर जोर देना चाहिए. ग्रेडेड, ब्लांच्ड और रोस्टेड मूंगफली जैसे उत्पादों से एक ही मात्रा में ज्यादा कमाई हो सकती है. SEA के मुताबिक, मूंगफली और तिल फिलहाल निर्यात आय का मजबूत आधार हैं, लेकिन आगे सरसों और अलसी जैसे दूसरे तिलहनों के लिए भी विदेशों में स्थायी बाजार तैयार करने की जरूरत है. इससे भारत के तिलहन निर्यात को बढ़ावा मिलने के साथ किसानों और कारोबारियों को भी बेहतर बाजार मिल सकता है.