हिमालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र में वैज्ञानिकों को सूरजमुखी परिवार से जुड़ी पौधे की एक नई प्रजाति मिली है. यह खोज हिमाचल प्रदेश के पालमपुर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (IHBT) के शोधकर्ताओं ने की है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह नई प्रजाति अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में समुद्र तल से करीब 4,000 मीटर की ऊंचाई पर मिली है. इसे ‘Doronicum Sanctum’ नाम दिया गया है. यह ‘Leopard’s Bane’ परिवार से संबंधित है.
IHBT ने कहा है कि हिमालयी जैव विविधता वाले क्षेत्रों में किए गए व्यापक वनस्पति सर्वे के दौरान इस नई प्रजाति की पहचान हुई. संस्थान के मुताबिक, पूर्वोत्तर भारत में इस तरह की यह पहली प्रजाति दर्ज की गई है. IHBT, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की एक प्रयोगशाला है. संस्थान हिमालयी पौधों और उनके औषधीय व व्यावसायिक महत्व पर शोध करता है. इसका उद्देश्य हिमालयी जैव संसाधनों के टिकाऊ इस्तेमाल के जरिए जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है.
पूर्वोत्तर भारत में पहली बार दर्ज हुई डोरोनिकम प्रजाति
शोधकर्ताओं के मुताबिक, यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Doronicum प्रजाति का कोई सदस्य पहली बार पूर्वोत्तर भारत में दर्ज किया गया है. इससे पहले भारत में इस पौधे के सभी रिकॉर्ड पश्चिमी हिमालय क्षेत्र तक सीमित थे. IHBT के पर्यावरण प्रौद्योगिकी विभाग के शोधकर्ता राहुल कुमार और विकास कुमार ने इस पर अध्ययन किया है. उनके शोध के नतीजे Springer Nature Link के एक अंतरराष्ट्रीय पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.
तिब्बत-चीन की प्रजातियों से कुछ समानताएं
शोधकर्ताओं ने मौके से पौधे के नमूने एकत्र किए और प्रयोगशाला में उनकी शारीरिक बनावट का विस्तृत अध्ययन किया. इसके बाद इन नमूनों की तुलना पुराने हर्बेरियम रिकॉर्ड और दुनिया भर में उपलब्ध वनस्पति संबंधी शोध से की गई. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस पौधे में तिब्बत और चीन में पाई जाने वाली कुछ प्रजातियों से समानताएं हैं, लेकिन इसकी कई शारीरिक विशेषताएं अलग हैं. इन्हीं खास विशेषताओं के आधार पर इसे एक अलग और नई प्रजाति के रूप में पहचाना गया.
पूर्वी हिमालय की समृद्ध जैव विविधता उजागर
शोधकर्ताओं के मुताबिक, नई प्रजाति ‘D. conaense’ और ‘D. stenoglossum’ से कुछ हद तक मिलती-जुलती है, लेकिन इसकी कई विशेषताएं इसे इन दोनों से अलग बनाती हैं. इसके फूलों के बाहरी हिस्से में पाए जाने वाले बीज जैसे फल पर बारीक बाल होते हैं और फूल के कुछ हिस्सों में मौजूद पप्पस जल्दी झड़ जाता है. वैज्ञानिकों ने कहा कि नई प्रजाति की पत्तीनुमा संरचनाओं यानी फिलरीज और फूलों की बाहरी पंखुड़ीनुमा संरचना रे फ्लोरेट्स का आकार भी दूसरी प्रजातियों से अलग है. इन विशेषताओं के आधार पर इसे अलग प्रजाति के रूप में पहचाना गया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज पूर्वी हिमालय में मौजूद जैव विविधता की विशालता को दिखाती है. साथ ही, दुनिया के संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में शामिल इस इलाके में नई प्रजातियों की खोज और उनके संरक्षण की जरूरत भी बढ़ गई है.