गेहूं की फसल के लिए खतरनाक रतुआ रोग से फसल को भारी नुकसान होता है. अब इस रोग से बचाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने गेहूं की वैरायटी वीएल-3040 को इससे प्रतिरोधी के रूप में पहचान की है. आईसीएआर का कहना है कि इस किस्म को उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के लिए रतुआ प्रतिरोधी गेहूं के रूप में सफल माना गया है. राजस्थान में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान कार्यकर्ता बैठक में प्रजाति पहचान समिति ने इसे मान्यता दी गई.
उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों के लिए रतुआ प्रतिरोधी गेहूं की उन्नत किस्म वीएल-3040 की पहचान महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है. राजस्थान में आयोजित 65वीं अखिल भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान कार्यकर्ता बैठक में प्रजाति पहचान समिति ने इसे मान्यता दी गई. इस किस्म को खास तौर पर उन क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है, जहां गेहूं की फसल को रतुआ रोग से नुकसान का खतरा रहता है. रतुआ के प्रति बेहतर प्रतिरोध होने से फसल की सुरक्षा मजबूत हो सकती है और रोग के कारण होने वाली उपज हानि को कम करने में मदद मिल सकती है.
नई किस्म में रतुआ रोधी जीन शामिल करने में सफलता
उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने संस्थान के निदेशक और प्रधान गेहूं प्रजनक डॉ. लक्ष्मी कान्त के नेतृत्व में इस किस्म का विकास किया है. वीएल-3040 किस्म में पीला और भूरा रतुआ रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता वाले जीन शामिल किए गए हैं. दो वर्षों के परीक्षण में इसकी औसत उपज 28.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर रही, जो वीएल गेहूं 892 से करीब छह फीसदी अधिक है.
प्रोटीन समेत कई पोषक तत्वों की मात्रा भरपूर
इस किस्म को खास तौर पर उन क्षेत्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है, जहां गेहूं की फसल को रतुआ रोग से नुकसान का खतरा रहता है. यह किस्म विशेष रूप से पर्वतीय क्षेत्रों में देर से बुवाई और सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों के लिए उपयोगी है. इसकी विशेषता से किसानों को आलू, मटर जैसी अतिरिक्त फसलें लेने और फसल विविधीकरण के माध्यम से आय बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं. किस्म में औसतन 11.7 फीसदी प्रोटीन, 43.2 पीपीएम लौह और 32.2 पीपीएम जस्ता पाया गया है.
किसानों का फसल सुरक्षा में होने वाला खर्च घटेगा
वीएल-3040 में रतुआ प्रतिरोधी जीनों का समावेश इसकी प्रमुख खासियत है. इससे उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों में गेहूं की खेती को अधिक स्थिर और भरोसेमंद बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है. रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी किस्में किसानों के लिए इसलिए भी उपयोगी हैं क्योंकि फसल की सेहत बेहतर रहने पर उत्पादन क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है और रोग प्रबंधन पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है.
गेहूं के लिए बेहद घातक होता है रतुआ रोग
रतुआ रोग गेहूं में लगने वाला एक गंभीर फफूंदजनित रोग है, जिसकी प्रमुख किस्में पीला रतुआ, भूरा रतुआ और काला रतुआ हैं. इसमें गेहूं की पत्तियों और तने पर पीले, नारंगी-भूरे या गहरे रंग के धब्बे और फफोले जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. रोग बढ़ने पर पत्तियों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता घट जाती है, जिससे पौधे का विकास, दाने भरना और हजार दानों का वजन प्रभावित होता है. खासकर पीला रतुआ ठंडे और नम मौसम में तेजी से फैल सकता है और गंभीर संक्रमण की स्थिति में गेहूं की उपज में भारी कमी आ सकती है.