Prayagraj organic farming: प्रयागराज जिले में खेती की दिशा तेजी से बदल रही है. अब किसान धीरे-धीरे रासायनिक खेती से दूरी बनाकर जैविक और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक जिले में 11,136 किसान जैविक खेती अपना चुके हैं. यह बदलाव सिर्फ खेती के तरीके का नहीं, बल्कि सोच में आए बड़े परिवर्तन को भी दिखाता है, जहां किसान अब जमीन की सेहत और कम लागत वाली खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं.
गंगा किनारे जैविक खेती का विस्तार
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, प्रयागराज में जैविक खेती का सबसे बड़ा केंद्र गंगा नदी के आसपास के इलाके बन रहे हैं. करीब 5 किलोमीटर के दायरे में 411 क्लस्टर तैयार किए गए हैं, जहां लगभग 8,220 एकड़ जमीन पर जैविक खेती की जा रही है. इन क्लस्टरों के माध्यम से किसानों को समूह में जोड़कर उन्हें प्राकृतिक खेती के तरीके सिखाए जा रहे हैं. इससे न सिर्फ उत्पादन की गुणवत्ता सुधर रही है, बल्कि खेती का खर्च भी कम हो रहा है.
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ता कदम
जिले में जैविक खेती के साथ-साथ प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके तहत 12 विशेष क्लस्टर बनाए गए हैं, जिनमें हर क्लस्टर में लगभग 125 किसान शामिल हैं. पहले चरण में करीब 1,500 किसानों को ट्रेनिंग दी जा रही है, जो लगभग 600 हेक्टेयर जमीन पर खेती कर रहे हैं. इस प्रशिक्षण में उन्हें बिना रासायनिक खाद और कीटनाशकों के, पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों से खेती करना सिखाया जा रहा है. इसमें गोबर और गोमूत्र जैसे पारंपरिक तरीकों का उपयोग शामिल है.
सरकार दे रही आर्थिक मदद
किसानों को इस बदलाव के लिए सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जा रही है. पहले साल किसानों को प्रति एकड़ 4,800 रुपये दिए जाते हैं, जबकि अगले दो साल तक हर साल 3,600 रुपये प्रति एकड़ की मदद मिलती है. इसके अलावा जैविक बीज और अन्य जरूरी संसाधनों के लिए भी सरकार सहयोग कर रही है, ताकि किसान आसानी से इस नई खेती पद्धति को अपना सकें.
महंगी हो रही रासायनिक खेती, बढ़ा बोझ
किसानों के इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण रासायनिक खेती की बढ़ती लागत भी है. खाद और कीटनाशकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, जिससे खेती करना महंगा हो गया है. कई किसान मानते हैं कि रासायनिक खेती में खर्च ज्यादा और मुनाफा कम होता जा रहा है, इसलिए वे जैविक खेती को बेहतर विकल्प के रूप में देख रहे हैं.
मिट्टी की खराब होती सेहत ने बढ़ाई चिंता
प्रयागराज की मिट्टी की सेहत को लेकर भी चिंता बढ़ रही है. क्षेत्रीय मृदा परीक्षण प्रयोगशाला के सहायक निदेशक पियूष राय के अनुसार, रबी और खरीफ सीजन में लिए गए मिट्टी के नमूनों में जैविक कार्बन, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा में तेज गिरावट देखी गई है.
उन्होंने बताया कि कई क्षेत्रों में जैविक कार्बन की मात्रा तय मानक 0.5 फीसदी से 0.75 फीसदी से भी नीचे चली गई है. यह स्थिति खेती के लिए खतरे का संकेत है.
फसल उत्पादन पर भी असर
मिट्टी की घटती गुणवत्ता का असर फसल उत्पादन पर भी साफ दिखाई दे रहा है. कृषि उपनिदेशक पवन कुमार विश्वकर्मा के अनुसार, गेहूं की पैदावार 2020-21 में जहां 28.15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर थी, वह 2023-24 में घटकर 24.04 क्विंटल रह गई है. इसी तरह मक्का, जौ, बाजरा और धान जैसी फसलों में भी उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है. इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ा है.
एक साल में 1500 किसानों ने छोड़ी रासायनिक खेती
पिछले एक साल में ही जिले के 1,500 से ज्यादा किसानों ने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक खेती को अपनाया है. यह आंकड़ा दिखाता है कि किसान अब धीरे-धीरे टिकाऊ खेती की ओर बढ़ रहे हैं.
कम लागत, ज्यादा मुनाफा
सरकार अब ऐसे खेती मॉडल को बढ़ावा दे रही है, जिसमें लागत कम हो और मुनाफा ज्यादा मिले. जैविक और प्राकृतिक खेती इसी दिशा में एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही है. इससे किसानों की रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होगी, मिट्टी की उर्वरता सुधरेगी और पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा.