Natural Farming: उत्तर भारत में किसानों ने रबी फसल की कटाई शुरू कर दी है. इसके बाद खरीफ फसल की तैयारी में किसान लग जाएंगे. इसके साथ ही खाद की मांग भी मार्केट में बढ़ जाएगी. इसलिए खरीफ सीजन शुरू होने से पहले उर्वरक की उपलब्धता बहुत जरूरी है. हालांकि, देश में खाद का उत्पादन बढ़ा है और आयात के स्रोत भी विविध हुए हैं. लेकिन पश्चिम एशिया से जुड़े वैश्विक हालात और सप्लाई चेन पर दबाव के कारण प्राकृतिक खेती जैसे विकल्पों पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि मिट्टी की सेहत और पोषक तत्वों की दक्षता बेहतर हो सके.
भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद उपभोक्ताओं में से एक है. देश में हर साल करीब 300- 310 लाख टन यूरिया का उत्पादन होता है, फिर भी ज्यादा मांग के समय आयात करना पड़ता है. हाल के आंकड़ों के मुताबिक, चीन और रूस से यूरिया आयात बढ़ा है. वहीं, फॉस्फेट (DAP) और पोटाश (MOP) जैसे खादों के लिए भारत अब भी आयात पर काफी निर्भर है. ये खाद ज्यादातर समुद्री रास्तों, जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज से आते हैं, जिससे आपूर्ति पर वैश्विक हालात का असर पड़ता है.
खाद सब्सिडी केंद्र सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा है
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में भारत का खाद आयात बिल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जिसका कारण बढ़ती मांग और वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतें हैं. इसी वजह से सरकार के लिए सब्सिडी प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. खाद सब्सिडी केंद्र सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा है, खासकर यूरिया पर, जिसे किसानों को सस्ती दर पर उपलब्ध कराया जाता है ताकि खेती की लागत कम रहे और उत्पादन बना रहे.
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सरकार ने PM-PRANAM योजना शुरू की
रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने और संतुलित पोषण उपयोग को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने PM-PRANAM योजना शुरू की है. इस योजना के तहत राज्यों को प्रोत्साहन दिया जाता है, ताकि वे रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करें. अगर राज्य इसमें बचत करते हैं, तो उस बचत का 50 फीसदी हिस्सा उन्हें मिट्टी की सेहत सुधारने, जैविक इनपुट विकसित करने और अन्य कृषि सुधार कार्यों पर खर्च करने के लिए दिया जाता है.
मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है
इसी दिशा में प्राकृतिक खेती एक बेहतर विकल्प के रूप में उभर रही है. यह खेती खेत में ही पोषक तत्वों के पुनः उपयोग, जैविक खाद, प्राकृतिक प्रक्रियाओं, मल्चिंग और दलहनी फसलों की मिश्रित खेती पर आधारित होती है. देश के कई राज्यों के अनुभव बताते हैं कि सही तरीके से अपनाने पर, खासकर वर्षा आधारित और कम लागत वाली खेती में, प्राकृतिक खेती से उत्पादन लगभग पारंपरिक खेती जितना ही रह सकता है. साथ ही, इससे लागत कम होती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
प्राकृतिक खेती पूरी तरह से रासायनिक खाद, खासकर सिंचित और अधिक उत्पादन वाले क्षेत्रों में, का विकल्प नहीं बन सकती. लेकिन अगर इसे सही जगहों पर अपनाया जाए, तो यूरिया की मांग को काफी हद तक कम किया जा सकता है और सरकार का खर्च भी घट सकता है. उदाहरण के तौर पर, अगर महाराष्ट्र में 10- 30 फीसदी खेती प्राकृतिक तरीके से होने लगे, तो यूरिया की मांग में बड़ी कमी आ सकती है और सब्सिडी में बचत होगी. इस बचत को कृषि प्रशिक्षण, जैविक खाद की उपलब्धता बढ़ाने और किसानों की क्षमता विकसित करने में लगाया जा सकता है.
मिट्टी जांच व सलाह सेवाओं को मजबूत करना चाहिए
खरीफ 2026 से पहले इस बदलाव को लागू करने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं. अप्रैल से जून के बीच कृषि विभागों को कृषि विज्ञान केंद्रों और फील्ड स्कूलों के जरिए किसानों को प्रशिक्षण देना चाहिए, जैविक और बायो-फर्टिलाइजर की आपूर्ति बढ़ानी चाहिए और मिट्टी जांच व सलाह सेवाओं को मजबूत करना चाहिए. साथ ही, PM-PRANAM जैसी योजनाओं के तहत प्रोत्साहन और फसल बीमा जैसी सुविधाएं देकर किसानों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
टिकाऊ खेती के तरीके अपनाएं किसान
भारत की खाद व्यवस्था आगे भी घरेलू उत्पादन और आयात दोनों पर निर्भर रहेगी, लेकिन अगर इसके साथ टिकाऊ खेती के तरीके अपनाए जाएं, तो बाहरी संकटों का असर कम किया जा सकता है. सरकार की नीतियों और सही मार्गदर्शन के साथ प्राकृतिक खेती खेती को ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और किफायती बना सकती है, जो खरीफ 2026 के लिए एक समझदारी भरा कदम होगा.