देश में सोयाबीन का संतुलन बिगड़ा: उत्पादन घटते ही बढ़ा आयात, किसानों और बाजार पर क्या पड़ेगा असर?
आयात बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है घरेलू बाजार में मांग और सप्लाई के बीच बढ़ता अंतर. यानी देश में जितनी जरूरत है, उतना उत्पादन नहीं हो पा रहा. इसके अलावा एक और वजह यह है कि अब विदेश से सोयाबीन मंगाना व्यापारियों के लिए फायदेमंद भी हो गया है. जब बाहर से सस्ता या बेहतर सौदा मिलता है, तो व्यापारी आयात की ओर झुकते हैं.
Soyabean imports: भारत में इस साल सोयाबीन को लेकर एक बड़ा बदलाव साफ तौर पर देखने को मिल रहा है. पहले देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खुद ही पैदा कर लेता था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं. अब धीरे-धीरे आयात पर निर्भरता बढ़ती जा रही है. इसका सीधा मतलब है कि देश में जितनी मांग है, उतनी सप्लाई नहीं हो पा रही.
अगर आंकड़ों की बात करें तो अक्टूबर 2025 से शुरू हुए ऑयल ईयर 2025-26 के पहले छह महीनों, यानी अक्टूबर से मार्च के बीच भारत ने 3.09 लाख टन से ज्यादा सोयाबीन आयात किया है. यह आंकड़ा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि पिछले साल इसी समय यह सिर्फ 0.02 लाख टन था. यानी इस बार आयात कई गुना बढ़ गया है.
बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, यह बढ़ोतरी साल 2026 के शुरुआती महीनों में ज्यादा तेज हुई है. इससे साफ संकेत मिलता है कि देश में मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बिगड़ रहा है और इसे संभालने के लिए आयात का सहारा लिया जा रहा है.
क्यों बढ़ रहा है सोयाबीन का आयात
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डीएन पाठक के अनुसार, आयात बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है घरेलू बाजार में मांग और सप्लाई के बीच बढ़ता अंतर. यानी देश में जितनी जरूरत है, उतना उत्पादन नहीं हो पा रहा. इसके अलावा एक और वजह यह है कि अब विदेश से सोयाबीन मंगाना व्यापारियों के लिए फायदेमंद भी हो गया है. जब बाहर से सस्ता या बेहतर सौदा मिलता है, तो व्यापारी आयात की ओर झुकते हैं.
SOPA का अनुमान है कि पूरे ऑयल ईयर 2025-26 में भारत करीब 6 लाख टन सोयाबीन आयात कर सकता है, जो पिछले साल के मुकाबले काफी ज्यादा है.
किन देशों से आ रहा है सोयाबीन
भारत में सिर्फ नॉन-जीएमओ (Non-GMO) सोयाबीन आयात की अनुमति है. यह सोयाबीन मुख्य रूप से पश्चिम अफ्रीका के देशों जैसे टोगो, नाइजर और बेनिन से आता है.
इन देशों को भारत ‘अल्प विकसित देश’ की श्रेणी में रखता है, इसलिए वहां से आने वाले सोयाबीन पर कोई आयात शुल्क नहीं लगता. यही कारण है कि इन देशों से सोयाबीन आयात करना सस्ता पड़ता है और व्यापारी इन्हें ज्यादा पसंद करते हैं.
उत्पादन घटा, बढ़ी चिंता
आयात बढ़ने के पीछे एक बड़ी वजह देश में सोयाबीन उत्पादन में गिरावट भी है. SOPA के अनुसार इस साल उत्पादन घटकर 110.26 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह 128.82 लाख टन था.
इतना ही नहीं, मंडियों में फसल की आवक भी कम हुई है. अक्टूबर से मार्च के बीच करीब 63 लाख टन सोयाबीन बाजार में आया, जबकि पिछले साल इसी समय यह 72 लाख टन था. इससे साफ है कि सप्लाई में कमी आ रही है.
प्रोसेसिंग पर भी पड़ा असर
जब बाजार में सोयाबीन कम पहुंचता है, तो इसका असर फैक्ट्रियों पर भी पड़ता है. इस साल सोयाबीन की क्रशिंग घटकर 57 लाख टन रह गई, जो पिछले साल 60.50 लाख टन थी. क्रशिंग कम होने का असर सोयाबीन खल (मील) के उत्पादन पर भी पड़ा है. हालांकि उत्पादन में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आई, लेकिन तेजी भी नहीं दिख रही.
खपत और निर्यात की स्थिति
सोयाबीन मील का इस्तेमाल ज्यादातर पशु चारे में होता है. इस सेक्टर में खपत करीब 32.50 लाख टन पर स्थिर बनी हुई है. वहीं फूड सेक्टर में थोड़ी गिरावट आई है, जहां खपत 4.20 लाख टन रही है.
निर्यात के मामले में भारत को नुकसान हुआ है. इस साल अक्टूबर से मार्च के बीच सोयाबीन मील का निर्यात 30 प्रतिशत घटकर 7.72 लाख टन रह गया, जबकि पिछले साल यह 11.12 लाख टन था. डीएन पाठक का कहना है कि घरेलू बाजार में ऊंची कीमतों के कारण निर्यात कम हुआ है.
कीमतों में क्या बदलाव आया
देश की मंडियों में 12 अप्रैल तक सोयाबीन की औसत कीमत 4943.6 रुपये प्रति क्विंटल रही, जो एक महीने पहले 5327.21 रुपये थी. यानी हाल के समय में कीमतों में थोड़ी गिरावट आई है. लेकिन अगर पिछले साल से तुलना करें, तो कीमतें अभी भी ज्यादा हैं. पिछले साल इसी समय यह करीब 4212.23 रुपये प्रति क्विंटल थी. सरकार ने खरीफ 2025-26 के लिए सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 5328 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है.
वहीं देश में सोयाबीन की मांग अभी भी मजबूत है, लेकिन उत्पादन कम हो गया है. इसी वजह से आयात बढ़ाना पड़ रहा है. अगर आने वाले समय में उत्पादन नहीं बढ़ता, तो भारत को और ज्यादा आयात करना पड़ सकता है. हालांकि किसानों के लिए यह एक अवसर भी हो सकता है, क्योंकि बाजार में सोयाबीन की मांग बनी हुई है.