भारत में सोयामील की खपत 7 प्रतिशत तक घटने का अनुमान, महंगे दामों के चलते पशुपालक सस्ते चारे की ओर कर रहे रुख

सोयामील लंबे समय से मुर्गीपालन और पशुपालन में इस्तेमाल होने वाला एक अहम चारा रहा है. लेकिन अब इसकी कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे यह पहले जितना किफायती नहीं रह गया है. ऐसे में पशुपालक सस्ते और आसानी से मिलने वाले विकल्पों की तरफ बढ़ रहे हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Updated On: 3 Apr, 2026 | 07:35 AM

soymeal consumption: भारत में खेती और पशुपालन का तरीका धीरे-धीरे बदल रहा है. जो चीजें पहले जरूरी मानी जाती थीं, अब उनकी जगह नए और सस्ते विकल्प ले रहे हैं. ऐसा ही कुछ सोयामील के साथ हो रहा है. आने वाले साल 2026-27 में सोयामील की खपत करीब 7 प्रतिशत तक कम होने का अनुमान है. इसका मतलब है कि अब किसान और पशुपालक पहले की तरह इस पर निर्भर नहीं रहेंगे.

महंगा पड़ रहा है सोयामील

बिजनेस लाइन की खबर के अनुसार, सोयामील लंबे समय से मुर्गीपालन और पशुपालन में इस्तेमाल होने वाला एक अहम चारा रहा है. लेकिन अब इसकी कीमतें बढ़ गई हैं, जिससे यह पहले जितना किफायती नहीं रह गया है. ऐसे में पशुपालक सस्ते और आसानी से मिलने वाले विकल्पों की तरफ बढ़ रहे हैं.

अब डीडीजीएस (DDGS) और डी-ऑयल्ड राइस ब्रान जैसे विकल्प ज्यादा इस्तेमाल हो रहे हैं. खास बात यह है कि इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से डीडीजीएस की उपलब्धता भी बढ़ गई है, जिससे इसकी कीमत कम हो गई और इसका उपयोग तेजी से बढ़ा है.

विदेशों में बढ़ रही भारतीय सोयामील की मांग

घरेलू बाजार में भले ही मांग कम हो रही हो, लेकिन विदेशों में भारतीय सोयामील की मांग मजबूत बनी हुई है. खासकर यूरोप के देश भारतीय नॉन-जीएमओ सोयामील को पसंद कर रहे हैं.

अनुमान है कि 2026-27 में सोयामील का निर्यात करीब 13 प्रतिशत तक बढ़ सकता है. वहीं सरसों की खली (रेपसीड मील) का निर्यात भी 10 प्रतिशत तक बढ़ने की उम्मीद है. चीन भी इस मामले में एक बड़ा खरीदार बन सकता है, जिसने हाल ही में बड़ी मात्रा में खरीदारी की है.

किसान बदल रहे हैं अपनी खेती

अब किसान भी समझदारी से फैसले ले रहे हैं. वे ऐसी फसलें उगा रहे हैं, जिनसे उन्हें ज्यादा फायदा हो. यही वजह है कि सोयाबीन की खेती का रकबा करीब 3 प्रतिशत तक घट सकता है.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में किसान अब मक्का और गेहूं की खेती को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. मक्का की मांग खासकर एथेनॉल उत्पादन के कारण बढ़ी है, जिससे किसानों को अच्छा दाम मिल रहा है.

उत्पादन भी होगा कम

जब खेती कम होगी, तो उत्पादन भी कम होना तय है. 2026-27 में सोयाबीन का उत्पादन करीब 10.35 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल के 10.7 मिलियन टन से कम है. उपज भी थोड़ी घटकर करीब 0.92 टन प्रति हेक्टेयर रहने की संभावना है. इसका असर आगे चलकर प्रोसेसिंग और क्रशिंग पर भी पड़ेगा.

सरसों ने छोड़ा सोयाबीन को पीछे

अब एक बड़ा बदलाव यह भी देखने को मिल रहा है कि सोयाबीन अब देश की सबसे बड़ी तिलहन फसल नहीं रही. सरसों ने इसे पीछे छोड़ दिया है और लगातार दूसरे साल नंबर-1 बनी हुई है. यह दिखाता है कि खेती में विविधता बढ़ रही है और किसान एक ही फसल पर निर्भर नहीं रहना चाहते.

इन सभी बदलावों से साफ है कि खेती और पशुपालन दोनों ही सेक्टर में बड़ा बदलाव आ रहा है. जहां पहले सोयामील का दबदबा था, अब उसकी जगह नए विकल्प ले रहे हैं.

किसानों के लिए यह बदलाव नए मौके भी लेकर आया है, क्योंकि वे अब ज्यादा मुनाफा देने वाली फसलों की तरफ जा रहे हैं. वहीं पशुपालकों को भी सस्ता चारा मिल रहा है.

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Published: 3 Apr, 2026 | 07:34 AM
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