लाल मिर्च ने लगाई कीमतों में आग, अदरक पर चीन का दबाव… जानिए मसाला बाजार में क्यों है हलचल

भारत दुनिया का सबसे बड़ा मिर्च उत्पादक देश माना जाता है. हर साल करीब 20 लाख टन मिर्च का उत्पादन होता है. लेकिन इस सीजन में हालात अलग हैं. अनुमान है कि मिर्च उत्पादन में 35 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. इसकी मुख्य वजह बुवाई क्षेत्र में कमी और मौसम का असामान्य व्यवहार है.

नई दिल्ली | Published: 27 Feb, 2026 | 07:38 AM

India spice market: देश का मसाला कारोबार इस समय बदलाव के दौर से गुजर रहा है. खेत से लेकर मंडी और फिर निर्यात बाजार तक, हर स्तर पर उतार-चढ़ाव दिखाई दे रहा है. हाल ही में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय मसाला सम्मेलन में पेश ताजा आंकड़ों से साफ है कि इस साल मिर्च की पैदावार में भारी कमी का अंदेशा है, जबकि हल्दी की फसल बेहतर रहने की उम्मीद जताई जा रही है. दूसरी ओर अदरक के वैश्विक बाजार में चीन की मजबूत मौजूदगी भारत के लिए चुनौती बनती जा रही है.

मिर्च: कम बुवाई और मौसम की मार

भारत को दुनिया में सबसे ज्यादा मिर्च उगाने वाला देश माना जाता है. आमतौर पर यहां करीब 20 लाख टन मिर्च का उत्पादन होता है, लेकिन इस बार हालात सामान्य नहीं हैं. अनुमान है कि उत्पादन में 35 से 40 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है. इसकी वजह मुख्य रूप से कम बुवाई और मौसम की अनिश्चितता है.

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे प्रमुख राज्यों में किसानों ने इस बार मिर्च का रकबा घटाया. बुवाई का समय भी आगे खिसक गया, जिससे फसल की स्थिति प्रभावित हुई. अब मंडियों में आवक कम दिखाई दे रही है. हालांकि पिछले साल का स्टॉक 8 से 10 प्रतिशत अधिक बताया जा रहा है, लेकिन नई फसल की कमी से कुल सप्लाई पर दबाव बना हुआ है.

जनवरी के बाद से बाजार में कीमतों ने रफ्तार पकड़ ली है. निर्यात मांग स्थिर बनी हुई है और चीन अब एक बड़ा खरीदार बनकर उभरा है. अगर आने वाले हफ्तों में आवक नहीं बढ़ी तो कीमतों में और तेजी देखी जा सकती है.

हल्दी: ज्यादा रकबा, लेकिन मौसम की चिंता

पिछले साल हल्दी की कम पैदावार के कारण दाम तेजी से चढ़े थे. लेकिन इस बार हालात कुछ बेहतर नजर आ रहे हैं. 2026 में उत्पादन करीब 15 प्रतिशत बढ़ने की संभावना जताई जा रही है. इसका मुख्य कारण बुवाई क्षेत्र में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी है, खासकर महाराष्ट्र में किसानों ने हल्दी की खेती बढ़ाई है.

हालांकि भारी बारिश ने कुछ इलाकों में फसल को नुकसान पहुंचाया, जिससे कुल उत्पादन में करीब 5 प्रतिशत की कमी का असर देखा जा सकता है. फिर भी बाजार में नई फसल की उम्मीद से कीमतों में नरमी आई है. पिछले साल के मध्य से अब तक हल्दी के दाम लगभग 16 प्रतिशत तक नीचे आ चुके हैं.

निर्यात में भी हल्दी को अच्छा समर्थन मिला है. पिछले वर्ष निर्यात में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि आयात घटा है. बावजूद इसके, व्यापारियों का कहना है कि स्थिरता के लिए संतुलित स्टॉक जरूरी होगा.

अदरक: घरेलू खपत ज्यादा, चीन से कड़ी टक्कर

अदरक के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है और सालाना करीब 20 लाख टन उत्पादन करता है. लेकिन इस सीजन में बुवाई कम होने से उत्पादन में लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट आई है. देश में पैदा होने वाला 90 प्रतिशत अदरक घरेलू बाजार में ही खप जाता है, जिससे निर्यात के लिए सीमित मात्रा बचती है.

भारत का ज्यादातर अदरक बांग्लादेश जाता है, जो कुल निर्यात का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खरीदता है. पिछले साल सोंठ के निर्यात में तेजी आई, जिससे घरेलू स्टॉक घट गया.

इस बीच चीन ने वैश्विक अदरक बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है. वहां करीब 60 लाख टन उत्पादन होता है और वह ताजे अदरक के निर्यात में आगे है. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन के कारण चीन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को प्रभावित कर रहा है. जब चीन से ज्यादा सप्लाई आती है तो भारतीय अदरक की कीमतों पर दबाव बढ़ जाता है.

गुणवत्ता मानकों के कारण भी भारत की पहुंच यूरोप और अमेरिका जैसे प्रीमियम बाजारों तक सीमित है. यदि पैकेजिंग और गुणवत्ता सुधार पर ध्यान दिया जाए तो निर्यात के नए अवसर खुल सकते हैं.

बाजार की दिशा क्या होगी

मौजूदा हालात बताते हैं कि मसाला बाजार पूरी तरह उत्पादन, मौसम और अंतरराष्ट्रीय मांग पर निर्भर है. मिर्च में कमी से तेजी, हल्दी में बढ़ती फसल से राहत और अदरक में चीन की चुनौती इन सबके बीच किसानों और व्यापारियों को संतुलन साधना होगा. आने वाले महीनों में मौसम और निर्यात की स्थिति तय करेगी कि मसाला बाजार किस दिशा में जाएगा. फिलहाल बाजार में सतर्कता जरूरी है, ताकि किसानों को सही दाम मिल सके और उपभोक्ताओं पर ज्यादा बोझ न पड़े.

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