castor production FY26: भारत में अरंडी (कैस्टर) की खेती इस साल किसानों के लिए खुशखबरी लेकर आई है. 2025-26 के कृषि वर्ष में देश का कुल अरंडी उत्पादन लगभग 11 प्रतिशत बढ़कर 17.6 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है. बेहतर मानसून, समय पर बुवाई, उन्नत बीजों का इस्तेमाल और वैज्ञानिक खेती के तरीकों ने इस बढ़ोतरी में अहम भूमिका निभाई है. खास तौर पर गुजरात और राजस्थान ने उत्पादन बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई है, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी स्थिति संतोषजनक रही है.
रकबा बढ़ा, पैदावार में भी सुधार
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में इस साल अरंडी की बुवाई का रकबा लगभग 8.90 लाख हेक्टेयर आंका गया है, जो पिछले साल के 8.68 लाख हेक्टेयर से करीब 3 प्रतिशत ज्यादा है. कुछ उपग्रह आधारित आकलनों के अनुसार यह रकबा 9 लाख हेक्टेयर से भी अधिक हो सकता है. रकबे के साथ-साथ प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन भी बढ़ा है. जहां पिछले साल औसत उपज 1,833 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, वहीं इस साल यह बढ़कर लगभग 1,977 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पहुंचने का अनुमान है. यानी करीब 8 प्रतिशत की वृद्धि.
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून की समय पर और संतुलित बारिश ने फसल की शुरुआती वृद्धि से लेकर फूल और फलियों के विकास तक सकारात्मक असर डाला. साथ ही किसानों ने उच्च उत्पादक किस्मों को अपनाया और कीट-रोग प्रबंधन पर भी ध्यान दिया, जिससे फसल की सेहत बेहतर बनी रही.
गुजरात: देश का सबसे बड़ा योगदान
गुजरात हमेशा से अरंडी उत्पादन में देश का अग्रणी राज्य रहा है और इस साल भी उसने अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी है. राज्य में अरंडी का रकबा लगभग 6.33 से 6.38 लाख हेक्टेयर के बीच आंका गया है. हालांकि कुछ क्षेत्रों में देर से बोई गई फसल और अन्य फसलों की ओर रुझान के कारण रकबे में हल्की गिरावट देखी गई, लेकिन बेहतर पैदावार ने इस कमी की भरपाई कर दी.
गुजरात में औसत उपज करीब 11 प्रतिशत बढ़कर 2,153 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है. इससे कुल उत्पादन 13.65 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 12.55 लाख टन से काफी अधिक है. कच्छ, बनासकांठा और मेहसाणा जैसे जिलों ने उत्पादन में प्रमुख योगदान दिया है. यहां मानसून की अच्छी बारिश, कम कीट प्रकोप और बेहतर फसल प्रबंधन ने उत्पादन को मजबूती दी. हालांकि कुछ स्थानों पर अधिक बारिश और कहीं-कहीं नमी की कमी जैसी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन कुल मिलाकर फसल की स्थिति संतोषजनक रही.
राजस्थान में भी बढ़ी खेती और उत्पादन
राजस्थान में इस साल अरंडी की खेती का रकबा लगभग 10 प्रतिशत बढ़कर 1.88 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है. औसत उपज भी 7 प्रतिशत बढ़कर 1,714 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर आंकी गई है. इसके चलते कुल उत्पादन 3.22 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल के 2.74 लाख टन से काफी ज्यादा है.
बाड़मेर, जालोर, सिरोही और जोधपुर जिलों में सबसे अधिक उत्पादन दर्ज किया गया है. यहां समय पर बुवाई, पर्याप्त सिंचाई और अनुकूल मानसून ने फसल को मजबूत आधार दिया. हालांकि कुछ वर्षा आधारित क्षेत्रों में नवंबर से फरवरी के बीच सूखे जैसे हालात रहे, लेकिन सिंचित क्षेत्रों में फसल की बढ़वार पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा.
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में स्थिर प्रदर्शन
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अरंडी का कुल रकबा लगभग 37,995 हेक्टेयर आंका गया है, जो पिछले वर्ष से थोड़ा अधिक है. यहां औसत उपज 1,538 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रहने की संभावना है. कुल उत्पादन 0.58 लाख टन तक पहुंच सकता है, जो पिछले साल के 0.54 लाख टन से थोड़ा ज्यादा है. अनंतपुर, कुरनूल और अन्य क्षेत्रों में फसल की स्थिति सामान्य से अच्छी रही. यहां भी कीट और रोग का कोई बड़ा प्रकोप सामने नहीं आया, जिससे उत्पादन में स्थिरता बनी रही.
किसानों और बाजार के लिए सकारात्मक संकेत
अरंडी भारत की एक महत्वपूर्ण तिलहन फसल है, जिसका उपयोग औद्योगिक उत्पादों, औषधियों, लुब्रिकेंट्स और कॉस्मेटिक उत्पादों में व्यापक रूप से होता है. उत्पादन में यह बढ़ोतरी घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात के लिए भी सकारात्मक संकेत देती है.
कुल मिलाकर 2025-26 का सीजन अरंडी उत्पादकों के लिए उम्मीदों से भरा नजर आ रहा है. यदि मौसम की स्थिति आगे भी अनुकूल बनी रहती है और बाजार में कीमतें स्थिर रहती हैं, तो किसानों की आय में भी अच्छा इजाफा देखने को मिल सकता है. यह साल भारतीय अरंडी उद्योग के लिए नई मजबूती और संभावनाओं का संकेत दे रहा है.