Tamil Nadu News: तमिलनाडु के थूथूकुड़ी जिले के बारिश-आश्रित क्षेत्रों में भारी वर्षा और बढ़ती खेती लागत के कारण कई किसान धीरे-धीरे दलहन से मक्के की खेती की ओर रुख कर रहे हैं. 2025-26 में मक्के की खेती का क्षेत्र 2 लाख एकड़ से ऊपर पहुंच गया, जबकि तीन साल पहले यह 1.16 लाख एकड़ था.थूथूकुड़ी जिले में काले और हरे उड़द जैसी दलहन की खेती होती है. यहां मक्का, ज्वार और बाजरा भी उगाए जाते हैं. इसके अलावा मिर्च, धनिया और खीरा जैसी सब्जियों की भी खेती की जाती है. लेकिन अचानक हुई बारिश, बाढ़, लंबा नॉर्थ ईस्ट मॉनसून और सर्दियों की अनियमितता के कारण दलहन की फसलें खराब होने लगी हैं, क्योंकि ये फसलें भारी बारिश और पानी जमने को सहन नहीं कर पाती.
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुतापबिक, कृषक एस. नवनीधन (गोपालपुरम) ने कहा कि काले और हरे उड़द की फसल बारिश के बदलाव के कारण नुकसान झेलती है. कुछ दिनों तक पानी जमा होने पर फसल सड़ जाती है और उत्पादन घट जाता है. आर. नारायणासामी (अचानकुलम) ने कहा कि जनवरी तक बढ़ा मॉनसून पूर्ण विकसित फसल को खराब कर देता है और किसानों की आमदनी प्रभावित होती है. उन्होंने कहा कि मकई पांच महीने में तैयार होने वाली फसल है और जनवरी में अचानक बारिश भी इसे बर्बाद नहीं कर पाती. इस बदलाव से किसान जोखिम कम कर रहे हैं और स्थिर उत्पादन वाली फसल मक्के की तरफ बढ़ रहे हैं.
किस फसल की कितने एकड़ में हुई बुवाई
थूथूकुड़ी के किसानों ने कहा कि मक्के की खेती में लागत कम है और पैदावार ज्यादा होती है. काले और हरे उड़द की फसल 3-6 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जबकि मक्का 15-30 क्विंटल होती है. मक्का की कटाई का खर्च भी कम है. आंकड़ों के मुताबिक, 2023-24 में मक्का 1,16,673 एकड़ में उगी थी, जो 2024-25 में 1,52,269 और 2025-26 में 2,00,506 एकड़ हो गई. इसी दौरान काले उड़द, हरे उड़द, ज्वार और बाजरा की खेती लगातार घट रही है. काले उड़द 1,48,458 एकड़ से घटकर 97,765 एकड़, हरे उड़द 34,399 से 14,952 एकड़, ज्वार 17,389 से 10,601 और बाजरा 24,785 से 17,668 एकड़ रह गया.
तीन साल में मक्का की खेती लगभग दोगुनी हो गई
एक वरिष्ठ कृषि अधिकारी ने कहा कि पिछले तीन साल में मक्के की खेती लगभग दोगुनी हो गई है. मक्के दो कारणों से फायदेमंद है: यह भारी बारिश सह सकती है और इसकी मांग अधिक है. इसके अलावा, मवेशी चारे और पोल्ट्री फीड के लिए भी मक्के की भारी मांग है, और 50 से अधिक निजी कंपनियां किसानों से मक्का खरीद रही हैं.