Onion Farming: अभी रबी प्याज का सीजन चल रहा है. महाराष्ट्र में किसान बड़े स्तर पर रबी प्याज की रोपाई कर रहे हैं. लेकिन उत्तर प्रदेश में भी किसान इस बार रबी प्याज की रोपाई करने की प्लानिंग बना रहे हैं. पर कई ऐसे किसान हैं, जिन्हें प्याज की उन्नत किस्मों को लेकर कोई जानकारी नहीं है. ऐसे में वे किसान फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि प्याज की कौन सी किस्मों की बुवाई करें, जिससे कम लागत में अधिक पैदावार मिले. हालांकि, किसानों को चिंता करने की जरूरत नहीं है. उनकी पास प्याज की बुवाई करने के लिए अभी एक महीने से अधिक का समय बचा हुआ है. क्योंकि रबी प्याज की बुवाई का सही समय जनवरी से फरवरी महीना होता है.
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए हिसार-2, अर्ली ग्रेनो, पूसा व्हाईट फ्लैट, पूसा रतनार और अर्का निकेतन प्याज की उन्नत किस्में हैं. इन उन्नत प्याज किस्मों की खेती से किसान कम समय में अधिक पैदावार और बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं. दरअसल, प्याज केवल सब्जी के रूप में ही नहीं, बल्कि कई अन्य डिशेज में इस्तेमाल होती है. इसलिए इसकी मांग सालभर बनी रहती है. एक्सपर्ट का कहना है कि यूपी के किसान प्याज, लहसुन और धनिया की खेती में काफी सक्रिय हैं. लेकिन किसान जनवरी-फरवरी में उन्नत किस्मों की प्याज की खेती करें तो कम समय में उच्च पैदावार के साथ अच्छा मुनाफा हासिल कर सकते हैं.
प्याज की किस्में और खासियत
- हिसार: यह किस्म गहरी लाल और भूरे रंग की होती है. रोपाई के 175 दिन बाद पकती है. इसका स्वाद तीखा नहीं होता है. प्रति हेक्टेयर 300 क्विंटल तक पैदावार देती है.
- अर्ली ग्रेनो: यह हल्के पीले रंग की किस्म है. रोपाई के 115-120 दिन में पकती है, अन्य किस्मों से ज्यादा उपज देती है. इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 500 क्विंटल तक है.
- पूसा व्हाईट फ्लैट: यह सफेद प्याज की किस्म है. रोपाई के 125-130 दिन में तैयार होती है. भंडारण क्षमता अच्छी है. इसकी उपज प्रति हेक्टेयर 325-350 क्विंटल है.
- पूसा रतनार: यह किस्म गहरे लाल, गोल और थोड़ा चपटी होती है. 125 दिनों में फसल तैयार हो जाती है. प्रति हेक्टेयर 400-500 क्विंटल उपज देती है.
- एक्सपर्ट के मुताबिक, जनवरी-फरवरी में इन उन्नत किस्मों की खेती कर किसान कम समय में ज्यादा पैदावार और मुनाफा कमा सकते हैं.
- प्याज की अर्का निकेतन किस्म खरीफ-रबी उगाई जाने वाली उन्नत किस्म है. इस किस्म की फसल 145 दिन में तैयार होती है और प्रति हेक्टेयर 325-350 क्विंटल तक पैदावार देती है. इसके कंदों को 3 महीने तक भंडारित किया जा सकता है. किसान इन किस्मों को अपनाकर कम समय में अच्छी पैदावार और बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं.
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