आलू किसानों को नुकसान, 11 रुपये किलो है लागत पर मार्केट में मिल रहा 7 रुपये तक का रेट

असम के आलू किसान लागत से कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं. कोल्ड स्टोरेज की कमी और बाहरी सप्लाई से दाम और गिर रहे हैं. किसानों ने सरकारी हस्तक्षेप, न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाहरी आलू की आवक पर रोक की मांग की है, अन्यथा उनकी खेती संकट में है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 9 Jan, 2026 | 01:53 PM

Potato Mandi Rate: असम के अलग-अलग इलाकों में आलू किसानों का कहना है कि इस समय उन्हें लागत से भी कम दाम पर आलू बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे वे गंभीर संकट में हैं. प्रमुख आलू उत्पादक क्षेत्रों के किसानों का आरोप है कि जिला प्रशासन की कमजोर निगरानी, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कमी और बाजार व्यवस्था की खराब स्थिति इसकी बड़ी वजह है. साथ ही कोल्ड स्टोरेज की पर्याप्त सुविधा न होने से किसान मजबूरी में सस्ते दाम पर आलू बेचते हैं और पूरी तरह व्यापारियों के नियंत्रण में आ जाते हैं. तिनसुकिया जिले के सादिया इलाके में किसानों का कहना है कि एक किलो आलू की लागत करीब 10-11 रुपये आती है, लेकिन उन्हें थोक व्यापारियों को 7-8 रुपये प्रति किलो में बेचने के लिए मजबूर किया जा रहा है. सरकार की ओर से बाजार को नियंत्रित न किए जाने से नाराज किसानों ने हाल ही में सड़क जाम कर आलू फेंके और नष्ट किए. किसान बेहतर दाम के साथ-साथ ज्यादा कोल्ड स्टोरेज और ‘सिंडिकेट’ मुक्त बाजार की मांग कर रहे हैं.

द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, उधर बिस्वनाथ जिले का जिंगिया क्षेत्र, जिसे असम का सबसे बड़ा आलू उत्पादक  इलाका माना जाता है, संकट से जूझ रहा है.  यहां 10,000 बीघा से ज्यादा जमीन पर आलू की खेती होती है. बावजूद इसके किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है. राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित आलू किसान देवी प्रसाद शर्मा ने कहा कि जहां उत्पादन लागत करीब 11 रुपये प्रति किलो है, वहीं व्यापारी सिर्फ 7 रुपये प्रति किलो तक ही भुगतान कर रहे हैं.

इस वजह से किसानों को नुकसान

उन्होंने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश और पंजाब से आने वाला आलू, जो करीब 6 रुपये प्रति किलो की दर से असम पहुंच रहा है, स्थानीय आलू के दाम  और नीचे गिरा रहा है. देवी प्रसाद शर्मा के मुताबिक, इस साल किसानों को प्रति बीघा 10 से 13 हजार रुपये तक का नुकसान हो रहा है.  सादिया के किसान रंजीत बरगोहेन ने आरोप लगाया कि तिनसुकिया और डिब्रूगढ़ में कुछ चुनिंदा व्यापारियों द्वारा अवैध सिंडिकेट चलाए जा रहे हैं.

तुरंत आलू बेचने के लिए मजबूर हैं किसान

बरगोहेन का कहना है कि थोक व्यापारी बाहर से लाए गए आलू को अपने कोल्ड स्टोरेज  में जमा कर लेते हैं, जबकि स्थानीय किसानों को बिना भंडारण के तुरंत आलू बेचने के लिए मजबूर किया जाता है. इससे व्यापारी मनमाने दाम तय कर लेते हैं और किसान जो भी भाव मिलता है, वही स्वीकार करने को मजबूर हो जाते हैं. कोल्ड स्टोरेज की कमी का सबसे ज्यादा असर सादिया, मांडिया (बारपेटा जिला) और जिंगिया में देखने को मिल रहा है, जहां असम के कई बड़े आलू किसान हैं.

मांडिया में एक भी कोल्ड स्टोरेज नहीं

किसानों का कहना है कि सादिया और मांडिया में एक भी कोल्ड स्टोरेज नहीं है, जबकि जिंगिया में सिर्फ एक इकाई है, जिसकी क्षमता उत्पादन के मुकाबले बेहद कम है. बार-बार मांग के बावजूद नई भंडारण सुविधाएं नहीं बनाई गईं. किसानों के मुताबिक सिर्फ सादिया में 2,000 से ज्यादा आलू किसान सैकड़ों बीघा में खेती करते हैं. कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण कटाई के 15 दिन के भीतर आलू खराब होने लगते हैं, जिससे किसानों को मजबूरी में कम दाम पर फसल बेचनी पड़ती है.

किसानों ने तिनसुकिया के जिलाधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन में मांग की है कि स्थानीय आलू का स्टॉक खत्म होने तक बाहर से आलू की आवक पर रोक लगाई जाए. उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश और पंजाब से रेल के जरिए बड़ी खेप में आलू असम पहुंच रहा है, जिससे स्थानीय बाजार में दाम गिर रहे हैं और किसानों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है.

15 रुपये किलो रेट की मांग

मांडिया, जो एक और बड़ा आलू उत्पादक इलाका है, वहां के किसानों का कहना है कि सरकारी दखल के बिना खेती चलाना मुश्किल हो गया है. करीब 300 बीघा में आलू उगाने वाले किसान लाल चान अली ने कहा कि इस हफ्ते बाहर से आने वाली सप्लाई थोड़ी कम होने पर किसानों को प्रति किलो करीब 1.5 रुपये ज्यादा दाम मिला और व्यापारी अब 8 से 9 रुपये प्रति किलो देने लगे हैं. हालांकि उनका कहना है कि किसानों की सही आमदनी  के लिए 15 से 18 रुपये प्रति किलो का भाव जरूरी है. उन्होंने बाहर से आलू की आवक सीमित करने और असम सरकार से आलू के लिए धान की तरह न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने की मांग की है.

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Published: 9 Jan, 2026 | 01:51 PM

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