गेहूं फसल: पूरी खेती गाइड, बुवाई से कटाई तक का प्रोसेस.. जानें हरेक राज्यों के लिए उन्नत किस्में

देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं अभी अच्छा कारोबार कर रहा है. बबेरू मंडी में 8 जनवरी को गेहूं का भाव 2,500 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जहां न्यूनतम, अधिकतम और मॉडल रेट समान रहे.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 9 Jan, 2026 | 07:05 PM

Wheat Farming: अभी रबी सीजन चल रहा है. गेहूं रबी सीजन का प्रमुख फसल है. इसकी बुवाई अक्टूबर में शुरू होती है और कटाई मार्च से होती है. फिलहाल गेहूं सहित प्रमुख रबी फसलों की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है. मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान सहित और लगभग पूरे देश में गेहूं की बुवाई पूरी हो गई है. किसान अब गेहूं की पहली और दूसरी सिंचाई की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन कई किसान ऐसे भी हैं, जिनका कहना है कि गेहूं की खेती में उन्हें अच्छी पैदावार नहीं मिलती है. लागत के मुकाबले कम फायदा होता है. ऐसे में किसानों को अब चिंता करने की जरूरत नहीं है. आज गेहूं खेती की पूरी गाइड की जानकारी देने जा रहे हैं, जिसमें हम राज्यों और मौसम के अनुसार बीजों के किस्स, मिट्टी परीक्षण, सिंचाई विधि, धान की मात्रा और मंडी के बारे में पूरी जानकारी देंगे. इन जानकारियों के अनुसार खेती करने पर गेहूं की पैदावार बढ़ जाएगी और किसानों की कमाई में वृद्धि होगी.

गेहूं रबी सीजन की प्रमुख फसल है. मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में इसकी बुवाई अक्तूबर महीने से शुरू हो जाती है. इन राज्यों के किसान गेहूं की अगेती किस्मों की बुआई 20 अक्टूबर से 10 नवंबर के बीच करते हैं. वहीं, गेहूं की पछेती किस्मों  की बुआई 10 नवंबर से 25 नवंबर तक की जाती है. वहीं, बिहार-झारखंड में किसान नवंबर के आखिरी हफ्ते से पूरे दिसंबर महीने तक गेहूं की बुवाई करते हैं. कुछ किसान जनवरी की पहले हफ्ते में गेहूं की पछेती किस्मों की बुवाई करते हैं. ऐसे इस बार देश में गेहूं की बुवाई पिछले साल के मुकाबले बढ़ गई है. चालू रबी सत्र 2025-26 में अब तक 3.34 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की बुवाई हो चुकी है, जो पिछले रबी सत्र 2024-25 के 3.28 करोड़ हेक्टेयर से अधिक है.

करीब 117.5 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होने का अनुमान

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश है. वर्ष 2025 में देश में करीब 110 से 117.5 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होने का अनुमान है, जिसमें पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश का प्रमुख योगदान रहता है. वहीं, रूस गेहूं के वैश्विक उत्पादन में तीसरे स्थान पर है, जहां लगभग 81.5 से 85 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया जाता है. फ्रांस यूरोप में गेहूं का सबसे बड़ा उत्पादक है. यहां लगभग 30 से 34 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होता है, जिसका बड़ा हिस्सा यूरोप और अफ्रीका के देशों में निर्यात किया जाता है.

कैसे करें मिट्टी परीक्षण और इसके फायदे

कृषि एक्सपर्ट का कहना है कि गेहूं बुवाई करने से पहले किसानों को मिट्टी का परीक्षण  जरूर करना चाहिए. इससे मिट्टी में किस पोषक तत्वों की कमी है, उसकी पूरी जानकारी मिल जाती है. गेहूं की बुवाई से पहले किसान अगर मिट्टी की जांच करा लें तो फसल के लिए यह बहुत फायदेमंद होता है. मिट्टी परीक्षण से यह पता चलता है कि खेत में किन पोषक तत्वों की कमी है और उन्हें कैसे पूरा किया जाए. अगर किसी कारण से मिट्टी की जांच नहीं हो पाती है, तो सही मात्रा में बेसल डोज डालकर भी पोषक तत्वों की कमी को काफी हद तक पूरा किया जा सकता है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, धान की कटाई के बाद और गेहूं की बुवाई से पहले मृदा परीक्षण जरूर कराना चाहिए. एक सामान्य खेत (करीब एक एकड़ या 6 बीघा) से लगभग 9 इंच गहराई तक मिट्टी ली जाती है. खेत के बीच और चारों कोनों से मिट्टी इकट्ठा कर उसे अच्छी तरह मिलाया जाता है और एक नमूना तैयार किया जाता है. इसी रिपोर्ट के आधार पर सही बेसल डोज का उपयोग किया जा सकता है.

कब करें गेहूं की पहली और दूसरी सिंचाई

गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए फसल की समय पर सिंचाई करनी चाहिए. लेकिन कई किसानों को समय की सटीक जानकारी नहीं होती है. ऐसे में किसानों को गेहूं की पहली, दूसरी और तीसरी सिंचाई कब करें इसकी पूरी जानकारी होनी चाहिए. दरअसल, गेहूं ठंड के मौसम की फसल है, लेकिन इसके लिए समय पर और संतुलित सिंचाई बहुत जरूरी होती है. अगर सही समय पर पानी न मिले तो पौधे कमजोर हो जाते हैं, कल्ले कम निकलते हैं और दाने छोटे रह जाते हैं. वहीं जरूरत से ज्यादा पानी देने पर जड़ें सड़ सकती हैं और रोग लगने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए गेहूं में संतुलित सिंचाई सबसे अहम होती है. बुवाई के करीब 20- 21 दिन बाद पहली सिंचाई करनी चाहिए, क्योंकि इसी समय जड़ें मजबूत होती हैं और कल्ले निकलने की शुरुआत होती है. इस चरण पर नमी की कमी होने से पूरी फसल प्रभावित हो सकती है. पहली सिंचाई हमेशा हल्की रखें, ताकि मिट्टी में नमी बनी रहे और खेत में पानी जमा न हो.

गेहूं की सिंचाई से जुड़ी जरूरी बातें

  • गेहूं की फसल में सामान्य तौर पर 4 से 5 बार सिंचाई की सलाह दी जाती है.
  • दूसरी सिंचाई 45-50 दिन बाद करें. इस समय पौधों में फूल आने की शुरुआत होती है.
  • पर्याप्त नमी मिलने से दाने बनने और भरने की प्रक्रिया बेहतर होती है.
  • तीसरी सिंचाई 55-60 दिन बाद करें. यह सिंचाई पौधों की आगे की बढ़वार के लिए जरूरी होती है और फसल को ऊर्जा देती है.
  • चौथी सिंचाई 75- 80 दिन बाद करें. इस चरण में पौधा दाने भरने की अवस्था में होता है, इसलिए पानी की जरूरत अधिक होती है.
  • अंतिम (पांचवीं) सिंचाई लगभग 110 दिन बाद करें. यह सिंचाई गर्मी से फसल को बचाने के लिए सबसे अहम होती है.
  • पांचवीं सिंचाई के दौरान टर्मिनल हीट का खतरा रहता है, जिससे दाने सिकुड़ या चटक सकते हैं.
  • अंतिम सिंचाई से पौधों को ठंडक मिलती है, दाने अच्छे से भरते हैं और पैदावार बढ़ती है.

गेहूं बुवाई से पहले ऐसे तैयार करें खेत

गेहूं बुवाई से पहले किसानों को दो से तीन बार खेत की अच्छी तरह से जुताई करनी चाहिए. इसके बाद पाटा चलाकर खेत को अच्छी तरह से समतल कर लें और जल निकासी की व्यवस्था भी अच्छी तरह कर लें. वरना जलभराव के कारण फसल को नुकसान पहुंच सकता है. हालांकि, किसानों को 100 किलो बीज की मात्रा समय पर बुवाई करने पर लगाना चाहिए. वहीं जो किसान देर से बुवाई करते है, वो 25 प्रतिशत बीज की मात्रा जरूर बढ़ा लें. कृषि वैज्ञानिक के मुताबिक, किसानों को बुआई से 4 घंटे पहले बीज उपचार करना बेहद जरूरी है. ताकि फसल में लगने वाले कीड़ों और व्याधियों से बचाया जा सके.

बीज उपचार के फायदे और जानें करने का पूरा प्रोसेस

साथ ही बीज उपचार  करने से फसल की गुणवत्ता और पैदावार दोनों बेहतर होती हैं. बीज उपचार से बीज फफूंद, बैक्टीरिया और अन्य बीमारियों से सुरक्षित रहते हैं और उनका अंकुरण अच्छा होता है. उपचारित बीज से उगने वाले पौधे ज्यादा स्वस्थ और मजबूत होते हैं, जिससे फसल तेजी से बढ़ती है और कीट-रोगों का असर कम होता है. किसान बीज का उपचार रासायनिक या जैविक, दोनों तरीकों से कर सकते हैं. रासायनिक विधि से उपचार करने के लिए 1 किलो गेहूं के बीज के लिए 2 से 2.5 ग्राम कैप्टान, थीरम या बावस्टीन दवा पर्याप्त होती है. वहीं 40 किलो बीज के उपचार के लिए करीब 100 ग्राम कैप्टान या बावस्टीन की जरूरत पड़ती है. बीज उपचार के लिए बीजों को छायादार जगह पर फर्श पर फैलाएं, हल्का पानी छिड़कें और दवा को बीजों पर समान रूप से डालें. इसके बाद हाथ से अच्छी तरह मिलाएं ताकि दवा सभी बीजों पर लग जाए. उपचार पूरा होने के बाद बीजों की बुवाई की जा सकती है.

सीड ड्रिल से करें गेहूं की बुवाई और खाद का इस्तेमाल

गेहूं की बुवाई करते समय सीड ड्रिल का उपयोग करें, ताकि बीज एक समान गहराई पर बोए जा सकें. बुवाई के साथ-साथ बेसल डोज के रूप में डीएपी, पोटाश, सल्फर और ऑर्गेनिक कार्बन की संतुलित मात्रा जरूर डालें, इससे पौधों की शुरुआती बढ़वार मजबूत होती है. खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद सही वीडिसाइड का छिड़काव करना भी जरूरी है, ताकि फसल को पोषक तत्वों का पूरा लाभ मिल सके. हालांकि, कृषि एक्सपर्ट का कहना है कि गेंहू की फसल में अच्छे उत्पादन के लिए किसान NPK का इस्तेमाल करें. ते आइए जानते हैं गेहूं की खेती के लिए खाद के इस्तेमाल की पूरी गणित.

गेहूं की फसल में पहला पानी और पहली खाद सही समय पर देने से पैदावार काफी बढ़ जाती है. पहले पानी के बाद यूरिया देना बहुत जरूरी है. सिंचित खेत में 45-50 किलो और असिंचित खेत में 25- 30 किलो प्रति एकड़ डालें. यूरिया पौधों को नाइट्रोजन देती है, जिससे पत्तियां हरी रहती हैं, तने मजबूत बनते हैं और बढ़वार तेज होती है. अगर बुवाई के समय पूरी DAP नहीं डाली गई थी, तो पहले पानी पर 15- 20 किलो प्रति एकड़ DAP डालें. DAP जड़ों को मजबूत करती है और पौधों की शुरुआती वृद्धि में मदद करती है. इसके साथ ही 10–15 किलो प्रति एकड़ पोटाश डालना फायदेमंद है, क्योंकि यह पौधों को रोगों से बचाता है, दाने अच्छे से भरते हैं और ठंड या सूखे में पौधों को मजबूती देता है.जिंक सल्फेट (21 फीसदी वाला) 10- 12 किलो प्रति एकड़ पहले या दूसरे पानी पर डालें.जिंक की कमी से पौधे पीले पड़ जाते हैं और पैदावार कम हो जाती है. अगर मिट्टी में सल्फर की कमी है तो 8- 10 किलो सल्फर प्रति एकड़ डालें. सल्फर दानों में प्रोटीन बढ़ाता है और फसल को मजबूत बनाता है. सिंचाई से पहले खेत में सभी खाद अच्छी तरह फैलाएं, फिर पानी दें ताकि खाद मिट्टी में घुलकर जड़ों तक पोषक तत्व जल्दी और आसानी से पहुंच जाएं.

गेहूं उर्वरक तालिका (पहला पानी)

उर्वरक का नाम सिंचित खेत (किलो/एकड़) असिंचित खेत (किलो/एकड़) डालने का समय लाभ
यूरिया 45–50 25–30 पहले पानी के बाद नाइट्रोजन देता है, पत्तियां हरी, तना मजबूत, तेज बढ़वार
डीएपी (DAP)* 15–20 15–20 पहले पानी पर जड़ें मजबूत, शुरुआती वृद्धि बेहतर
पोटाश 10–15 10–15 पहले पानी पर रोग प्रतिरोध, दाने भराव, ठंड/सूखे से सुरक्षा
जिंक सल्फेट (21%) 10–12 10–12 पहले या दूसरे पानी पर जिंक की कमी दूर, पीलेपन से बचाव
सल्फर** 8–10 8–10 पहले पानी पर दानों में प्रोटीन बढ़ाता, फसल मजबूत

नोट (DAP): यदि बुवाई के समय पूरी DAP नहीं डाली गई हो तभी पहले पानी पर दें.

पंजाब, हरियाणा के किसान इन किस्मों की करें बुवाई

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के आईआईडब्ल्यूबीआर के अनुसार, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को गेहूं की पछेती किस्मों जैसे PBW 752, PBW 771, DBW 173, JKW 261, HD 3059 और WH 1021 की बुआई करनी चाहिए. वहीं, पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के किसानों के लिए DBW 316, PBW 833, DBW 107 और HD 3118 जैसी किस्में उपयुक्त मानी गई हैं. ये किस्में इलाके के मौसम और मिट्टी के अनुसार अच्छी पैदावार देती हैं. IIWBR के अनुसार, किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार गेहूं की किस्में चुननी चाहिए. इसके मुताबिक, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान के किसानों को HD 3407, HI 1634, CG 1029 और MP 3336 जैसी किस्में बोनी चाहिए. वहीं, HD 3271, HI 1621 और WR 544 जैसी किस्में किसी भी राज्य में बोई जा सकती हैं. ये किस्में अच्छे उत्पादन और फसल की मजबूती के लिए उपयुक्त मानी गई हैं.

किस राज्य में कितना होता है गेहूं का उत्पादन

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य  हैं. उत्तर प्रदेश गेहूं उत्पादन में सबसे आगे है. इसका हिस्सेदारी 31.7 प्रतिशत है. इसके बाद मध्य प्रदेश 21.3 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर है. तीसरे नंबर पर पंजाब 14.7 फीसदी, चौथे पर हरियाणा 10 फीसदी, पांचवें पर राजस्थान 9.6 फीसदी, छठवें पर बिहार 5.9 फीसदी, सातवें पर गुजरात 3.3 फीसदी, आठवें पर महाराष्ट्र 1.9 फीसदी, नौवें पर पश्चिम बंगाल 0.6 फीसदी, दसवें पर हिमाचल प्रदेश 0.5 फीसदी, ग्यारहवें पर झारखंड 0.4 फीसदी और अंतिम बारहवें पायदान पर छत्तीसगढ़ 0.2 फीसदी योगदान के साथ है. रबी सत्र 2024-25 देश में 115 लाख टन गेहूं उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था.

व्हीट ब्लास्ट, करपा और पीला रतुआ से फसल को नुकसान

गेहूं की फसल को व्हीट ब्लास्ट, करपा और पीला रतुआ  से बहुत नुकसान पहुंचता है. इससे पैदावार को नुकसान पहुंचता है. पहले हम चर्चा करते हैं व्हीट ब्लास्ट के बारे में. यह एक फंगल रोग है जो पहले चावल में पाया जाता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह गेहूं में भी फैल गया है. यह बहुत खतरनाक रोग है और गेहूं की लगभग 75 फीसदी फसल को नष्ट कर सकता है. इसे फैलने से रोकने के लिए प्रभावित गेहूं की फसल को जला दिया जाता है. साथ ही इस रोग से बचने के लिए किसान गेहूं की बुवाई के लिए हमेशा प्रमाणित स्रोत से ही बीज का इस्तेमाल करें और यह सुनिश्चित करें कि बीज में फफूंद न हो. प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चुनाव करें, जो बाजार में आसानी से मिल जाती हैं. खेत से पौधों के अवशेष और अन्य मेजबान पौधों को हटा दें और नाइट्रोजन की अधिक मात्रा का उपयोग न करें.

करपा से गेहूं को बचाने के लिए करें ये उपाय

वहीं, करपा रोग गेहूं के साथ- साथ धान, केला और बागवानी फसलों में फैलता है. इससे पैदावार में गिरावट आती है. करापा रोग में पत्तियों पर छोटे-छोटे गहरे नारंगी या भूरी धब्बे दिखाई देते हैं. इन धब्बों के आसपास पत्तियां हल्की पीली पड़ जाती हैं. यदि संक्रमण गंभीर हो जाए, तो पत्तियां जल्दी सूख जाती हैं और दाने ठीक से नहीं भर पाते. इसके कारण फसल की पैदावार काफी कम हो सकती है. करापा रोग फैलने पर उपयुक्त फफूंदनाशक दवा का छिड़काव करना चाहिए, जैसे ट्राइफ्लोक्सिस्ट्रॉबिन, कार्बेन्डाजिम या मैनकोजेब. साथ ही, उर्वरक संतुलित मात्रा में ही दें और नाइट्रोजन का अधिक उपयोग न करें, क्योंकि इससे रोग जल्दी फैल सकता है. जबकि, पीला रतुआ के लक्षण दिखाई देते ही तुरंत प्रोपकोनाजोल 200 मिलीलीटर को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें. यदि बीमारी अधिक फैल रही हो तो जरूरत पड़ने पर इसे दोबारा स्प्रे कर सकते हैं. यह रोग खासकर एचडी 2967, एचडी 2851 और डब्ल्यू एच 711 जैसी किस्मों में ज्यादा देखने को मिल सकता है.

ड्रिप सिंचाई प्रणाली को अपनाने के फायदे

किसानों को पारंपरिक सिंचाई विधि की जगह वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल करना चाहिए. अगर ड्रिप सिंचाई प्रणाली को अपनाते हैं, तो किसानों को सीधा फायदा होगा. पानी सीधे पौधे की जड़ों तक पहुंचता है, जिससे 40 फीसदी से 70 फीसदी तक पानी की बचत होती है. पारंपरिक बाढ़ सिंचाई की तुलना में यह बहुत ज्यादा प्रभावी है. इस तकनीक में पाइप और ड्रिपर का इस्तेमाल होता है, जिससे पानी का अपव्यय नहीं होता और पौधों को सही मात्रा में पानी मिलता है. वहीं, स्प्रिंकलर सिंचाई में लगभग 90 फीसदी उर्वरक फसल द्वारा आसानी से अवशोषित हो जाते हैं. पानी का समान वितरण होने के कारण फसल की पैदावार भी बढ़ जाती है. इस प्रणाली को लगाना आसान और सस्ता है. साथ ही, स्प्रिंकलर सिंचाई में समय, मेहनत और रखरखाव की लागत भी कम होती है.

खरपतवार नियंत्रण के लिए इस दवा का करें छिड़काव

फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए दवा का इस्तेमाल अलग-अलग समय पर किया जा सकता है. गेहूं की बुवाई के 2-3 दिन के भीतर प्री-इमर्जेंस दवा का छिड़काव करना चाहिए. यह दवा बीज अंकुरित होने से पहले मिट्टी में रहकर उगने वाले खरपतवारों को नष्ट कर देती है. हमेशा बाजार में उपलब्ध प्रमाणित दवाओं का ही इस्तेमाल करें और पैकेज पर लिखी डोज और पानी की मात्रा का पालन करें. इसके अलावा, खेत को समतल और अच्छी तरह जुताई के बाद ही बुवाई करें और दवा देने से पहले मिट्टी हल्की नम होनी चाहिए, ताकि दवा अच्छी तरह काम कर सके.

पोस्ट-इमर्जेंस खरपतवार नियंत्रण के लिए क्या करें

वहीं, गेहूं की फसल में पोस्ट-इमर्जेंस खरपतवार नियंत्रण  के लिए फसल के खड़ी होने और खरपतवार उगने के बाद दवा का छिड़काव करें. आमतौर पर यह बुवाई के 20-25 दिन बाद या तीसरे पत्ते की अवस्था में किया जाता है. हमेशा बाजार में उपलब्ध प्रमाणित पोस्ट-इमर्जेंस हार्बिसाइड का ही इस्तेमाल करें और पैकेज पर लिखी डोज और पानी की मात्रा का पालन करें. दवा को पूरे खेत में समान रूप से छिड़कें और अगर खरपतवार ज्यादा फैल गए हों तो जरूरत पड़ने पर दोबारा छिड़काव करें. गेहूं में घास जैसे खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए आईसोप्रोटूरान का इस्तेमाल करें, जिसकी मात्रा 1250 ग्राम प्रति हैक्टेयर होती है. यह दवा बाजार में अलग-अलग नामों से उपलब्ध है. इसे पैकेज पर दिए गए निर्देश और सही मात्रा के अनुसार ही इस्तेमाल करना चाहिए, जैसे एरीलॉन, मासलान या हिम एग्रीलान (75 फीसदी) की मात्रा 1700 ग्राम प्रति हैक्टेयर होती है.

गेहूं की खेती के लिए मिट्टी का पीएच कितना होना चाहिए

गेहूं के लिए मिट्टी का पीएच 6.0 से 7.5 के बीच सबसे उपयुक्त माना जाता है. जबकि, मिट्टी में पर्याप्त नमी होना बहुत जरूरी है, खासकर बुवाई और शुरुआती वृद्धि के समय. बुवाई के समय मिट्टी हल्की नम होनी चाहिए, ताकि बीज आसानी से अंकुरित हो सकें. अगर मिट्टी बहुत सूखी होगी तो बीज नहीं अंकुरते और बहुत गीली होने पर सड़न का खतरा बढ़ जाता है. सरल भाषा में बोलें तो गेहूं के खेत की मिट्टी को हाथ से दबाने पर हल्की नमी महसूस होनी चाहिए और मिट्टी हाथ से चिपकनी नहीं चाहिए. यही गेहूं के लिए सबसे सही नमी की स्थिति है.

कितनी गहराई और दूरी पर करें गेहूं बुवाई

अगर आप गेहूं की बुवाई सीड ड्रिल मशीन से करते हैं, तो एक एकड़ खेत से 19 से 22 क्विंटल तक गेहूं का उत्पादन हो सकता है और इससे अच्छी आमदनी भी हो सकती है. वहीं, जीरो टिलेज तकनीक से गेहूं बोने पर पैदावार परंपरागत बोआई की तुलना में अधिक होती है. इस तकनीक से बुवाई 10-15 दिन पहले की जा सकती है, जिससे देर से बोआई के कारण होने वाले उत्पादन नुकसान की भरपाई हो जाती है. वहीं, गेहूं की फसल में पंक्ति दर पंक्ति 22 सेंटीमीटर की दूरी रखकर बुवाई करनी चाहिए और बीज को 5 सेंटीमीटर से ज्यादा गहराई में नहीं बोना चाहिए.

प्रति एकड़ बीज की खपत और पैदावार

एक एकड़ खेत में गेहूं की खेती के लिए सामान्य तौर पर 120- 125 किलो बीज पर्याप्त होता है. अगर सीड ड्रिल मशीन से बुवाई की जाए तो बीज की मात्रा थोड़ी कम, यानी 100-110 किलो ही काफी होती है. जबकि हाथ से छिट्टा बुवाई में 120- 130 किलो बीज की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इस विधि में बीज ज्यादा लगता है और कुछ हिस्सा खराब भी हो जाता है. अगर मौसम अनुकूल हो, बीज अच्छी क्वालिटी का हो और उर्वरक सही मात्रा में इस्तेमाल किया जाए, तो एक एकड़ खेत से औसतन 18- 22 क्विंटल गेहूं उपज मिल सकती है. अच्छे प्रबंधन वाले खेत, जहां सिंचाई की सुविधा हो और उन्नत किस्म के बीज का इस्तेमाल किया गया हो, वहां उपज 22-25 क्विंटल प्रति एकड़ तक पहुंच सकती है.

कितने दिनों में तैयार हो जाती है गेहूं की फसल

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में गेहूं की फसल आमतौर पर 120 से 140 दिनों में तैयार हो जाती है. पहले बोई जाने वाली अगेती किस्में लगभग 120- 130 दिन में पकती हैं, जबकि देर से बोई जाने वाली पछेती किस्में लगभग 110-120 दिन में तैयार हो जाती हैं. मौसम, सिंचाई और उर्वरक के प्रबंधन के हिसाब से यह समय थोड़ी बहुत बदल सकता है. ऐसे देश में HD 2967 किस्म सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. यह रोग-प्रतिरोधी है और एक एकड़ से लगभग 22- 24 क्विंटल गेहूं का उत्पादन देती है. इसके दाने सुनहरे, मोटे और मजबूत होते हैं. खासियत के रूप में यह रस्ट रोग से बचाव करती है और सूखा सहनशील है. इसकी बुवाई का खर्च लगभग 3,500 रुपये प्रति एकड़ आता है और इससे 45,000- 50,000 रुपये तक की आमदनी हो सकती है. बता दें कि गेहूं उत्पादक राज्यों में MSP पर गेहूं की खरीद होती है. सरकार ने फसल सीजन 2026-27 के लिए गेहूं का एमएसपी 2585 रुपये क्विंटल तय किया है.

8 जनवरी को गेहूं का मंडी रेट

वहीं, देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं अभी अच्छा कारोबार कर रहा है. बबेरू मंडी में 8 जनवरी को गेहूं का मंडी भाव  2,500 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जहां न्यूनतम, अधिकतम और मॉडल रेट समान रहे. इसी तरह मुस्केरा मंडी में गेहूं 2,550 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिका, जो इन तीनों श्रेणियों में बराबर रहा. वहीं जालौन मंडी में गेहूं का न्यूनतम भाव 2,521 रुपये, अधिकतम 2,525 रुपये और मॉडल रेट 2,521 रुपये प्रति क्विंटल रहा. तीनों मंडियों में कुल आवक सामान्य रही. 

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Published: 9 Jan, 2026 | 06:25 PM

कीवी उत्पादन के मामले में देश का सबसे प्रमुख राज्य कौन सा है