उत्तर प्रदेश रबी फसल गाइड 2025-26: गेहूं से सरसों तक बदलते मौसम में कौन-सी फसल होगी सुरक्षित और फायदेमंद?

Uttar Pradesh rabi guide: पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश ने रबी फसलों की किस्मों के विकास के क्षेत्र में जो बढ़त दर्ज की है, वह ऐतिहासिक है. ICAR के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश के लिए रबी फसलों की कुल 697 किस्में अधिसूचित की गई हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 10 Jan, 2026 | 08:25 AM

Uttar Pradesh rabi guide: बदलते मौसम, अनियमित बारिश, बढ़ती खेती लागत और बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच उत्तर प्रदेश में रबी की खेती अब केवल परंपरागत अनुभव पर नहीं छोड़ी जा सकती. आज रबी सीजन वही किसान सुरक्षित निकाल पाता है, जो समय पर योजना बनाता है, सही फसल और किस्म चुनता है और पानी, खाद व संसाधनों का संतुलित उपयोग करता है.

देश का सबसे बड़ा कृषि राज्य होने के नाते उत्तर प्रदेश की खेती सिर्फ यहां के किसानों की आजीविका का सवाल नहीं है. यहां उगने वाला गेहूं, चना, मसूर, सरसों, मक्का और चारा पूरे देश की खाद्य सुरक्षा, बाजार कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा प्रभावित करता है. यही वजह है कि रबी सीजन उत्तर प्रदेश के लिए हर साल बेहद निर्णायक माना जाता है.

इस बदलते दौर में Indian Council of Agricultural Research (ICAR) और कृषि विश्वविद्यालयों की वैज्ञानिक सलाह किसानों के लिए भरोसेमंद मार्गदर्शक की तरह काम कर रही है. अगर किसान इन सलाहों को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाए, तो रबी खेती जोखिम नहीं, बल्कि स्थिर आमदनी का मजबूत आधार बन सकती है.

उत्तर प्रदेश में रबी खेती की बुनियादी समझ

उत्तर प्रदेश का कृषि परिदृश्य बेहद विविध है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नहरों और ट्यूबवेल के कारण सिंचाई की सुविधा बेहतर है, जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में खेती आज भी काफी हद तक वर्षा पर निर्भर रहती है. मध्य यूपी में मिश्रित खेती का चलन ज्यादा है, जहां गेहूं के साथ दालें, तिलहन और चारा भी उगाया जाता है.

इसी विविधता के कारण रबी खेती का कोई एक फार्मूला पूरे राज्य पर लागू नहीं होता. आमतौर पर रबी सीजन अक्टूबर–नवंबर में बुआई से शुरू होकर मार्च–अप्रैल में कटाई तक चलता है. खरीफ फसल की कटाई के बाद खेत में बची नमी ही रबी फसलों की नींव बनती है. अगर इसी नमी को समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो सिंचाई का खर्च भी घटता है और उत्पादन भी सुरक्षित रहता है.

2014 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश के लिए रबी फसलों की कुल 697 किस्में अधिसूचित की गई हैं, pc-pexels

रबी फसलों की किस्मों का सबसे बड़ा केंद्र कैसे बना?

पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश ने रबी फसलों की किस्मों के विकास के क्षेत्र में जो बढ़त दर्ज की है, वह ऐतिहासिक है. ICAR के आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2025 के बीच उत्तर प्रदेश के लिए रबी फसलों की कुल 697 किस्में अधिसूचित की गई हैं. यह संख्या अपने आप में बताती है कि देश का कोई भी दूसरा राज्य रबी फसलों के मामले में इतनी बड़ी और विविध किस्मों की टोकरी नहीं बन पाया है. इन 697 किस्मों में गेहूं, चना, मसूर, मटर, मक्का, सरसों, जौ और जई जैसी प्रमुख फसलें शामिल हैं. केवल गेहूं की ही 85 किस्में अधिसूचित होना यह दिखाता है कि राज्य की सबसे अहम फसल पर कितना गहरा शोध, समय और संसाधन लगाए गए हैं.

मक्का की 102 किस्में यह संकेत देती हैं कि रबी मक्का को अब सिर्फ वैकल्पिक फसल नहीं, बल्कि मुख्य आय-स्रोत के रूप में देखा जाने लगा है. यही सोच उत्तर प्रदेश को धीरे-धीरे गेहूं-धान के सीमित चक्र से बाहर निकाल रही है.

रबी योजना में वैज्ञानिक सलाह क्यों जरूरी है

रबी फसलों के लिए जारी की जाने वाली कृषि सलाहें सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं होतीं. ये सलाहें वर्षों के शोध, खेतों में किए गए प्रयोग और किसानों के अनुभवों पर आधारित होती हैं. वैज्ञानिकों का उद्देश्य केवल पैदावार बढ़ाना नहीं, बल्कि खेती की लागत को काबू में रखना, जोखिम कम करना और मिट्टी की सेहत को लंबे समय तक बनाए रखना होता है.

जब किसान वैज्ञानिक सलाह को अपनी मिट्टी, पानी और मौसम की स्थिति के अनुसार अपनाता है, तो खेती ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी बन जाती है. यही वजह है कि आज रबी खेती में “अनुभव और विज्ञान” का मेल सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है.

गेहूं: उत्तर प्रदेश की रबी खेती की रीढ़

उत्तर प्रदेश में रबी की बात हो और गेहूं का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं. गेहूं राज्य की सबसे अहम फसल है और लाखों किसानों की आमदनी का मुख्य आधार भी.

समय पर बोया गया गेहूं हमेशा बेहतर उत्पादन देता है. सिंचित क्षेत्रों में नवंबर के पहले पखवाड़े में बुआई सबसे उपयुक्त मानी जाती है. अगर किसी कारण से देरी हो जाए, तो दिसंबर के पहले दस दिनों तक बुआई की जा सकती है, लेकिन इसके लिए देर से बुआई के अनुकूल किस्मों का चयन जरूरी है.

उन्नत गेहूं किस्में जैसे HD 2967, HD 3086, DBW 187, PBW 723 और K 1006 किसानों के बीच भरोसेमंद मानी जाती हैं. देर से बुआई के लिए DBW 222 जैसी किस्में बेहतर विकल्प हैं. गेहूं की फसल में कल्ले निकलने, फूल आने और दाना भरने की अवस्था पर सिंचाई बेहद अहम होती है. सीमित पानी में भी अगर इन्हीं चरणों पर सिंचाई कर दी जाए, तो उपज संतोषजनक रहती है.

खाद प्रबंधन में संतुलन सबसे जरूरी है. नाइट्रोजन को एक साथ देने के बजाय दो या तीन हिस्सों में देना चाहिए, ताकि पौधे की बढ़वार संतुलित रहे और दाने अच्छे से भरें.

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चना की बुआई अक्टूबर के मध्य से नवंबर के पहले सप्ताह तक करना सबसे बेहतर माना जाता है, pc-pexels

चना: कम लागत में भरोसेमंद रबी दाल

चना उत्तर प्रदेश की सबसे भरोसेमंद रबी दालों में से एक है. यह फसल कम पानी में भी अच्छा उत्पादन देती है और मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती है.

चना की बुआई अक्टूबर के मध्य से नवंबर के पहले सप्ताह तक करना सबसे बेहतर माना जाता है. हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी चने के लिए उपयुक्त रहती है. Pusa 372, JG 14, KPG 59 और Pusa 547 जैसी किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं.

बीज उपचार चने की खेती में बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे जड़ सड़न और शुरुआती रोगों से बचाव होता है. फूल और फली बनने के समय अगर हल्की सिंचाई उपलब्ध हो जाए, तो पैदावार में साफ बढ़ोतरी देखी जाती है.

मसूर और मटर

मसूर और मटर जैसी दालें अब उत्तर प्रदेश में तेजी से लोकप्रिय हो रही हैं. मसूर कम पानी में तैयार हो जाती है और ठंडे मौसम को अच्छी तरह सहन करती है. PL 406 और IPL 316 जैसी किस्में बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं.

मटर जल्दी तैयार होने वाली फसल है, जिससे किसानों को जल्दी नकदी मिलती है. सब्जी और दाल—दोनों रूपों में इसका उपयोग किया जा सकता है. सही समय पर बुआई और संतुलित खाद से मटर की खेती अच्छा मुनाफा दे सकती है.

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ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई से मक्का की पैदावार और भी बेहतर होती है, pc-pexels

रबी मक्का

रबी मक्का अब सिर्फ चारे की फसल नहीं रही. यह मानव आहार, पोल्ट्री फीड और उद्योग तीनों के लिए अहम बनती जा रही है. HQPM 1, DHM 117 और Vivek Hybrid 9 जैसी किस्में रबी मक्का के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं.

मक्का की खास बात यह है कि सही प्रबंधन के साथ यह गेहूं की तुलना में कम समय में अच्छी आमदनी दे सकती है. ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई से मक्का की पैदावार और भी बेहतर होती है.

सरसों और अन्य तिलहन

सरसों उत्तर प्रदेश की प्रमुख तिलहन फसल है. यह कम समय में तैयार हो जाती है और बाजार में इसकी मांग बनी रहती है. Pusa Mustard 25, Varuna और Giriraj जैसी किस्में किसानों को अच्छा उत्पादन देती हैं.

सरसों की खेती से किसान को तेल के साथ-साथ खली भी मिलती है, जो पशु आहार के काम आती है. फूल आने के समय हल्की सिंचाई और रोग नियंत्रण से उपज में सुधार होता है.

रबी 2025–26 में उत्तर प्रदेश के किसानों को क्या करना चाहिए?

रबी सीजन में सबसे पहला और जरूरी कदम है बुआई से पहले सही योजना. किसान को यह तय करना चाहिए कि उसके खेत की मिट्टी कैसी है, पानी की उपलब्धता कितनी है और पिछले साल कौन-सी फसल ली गई थी. इन्हीं बातों के आधार पर फसल और किस्म का चुनाव करें, न कि सिर्फ पड़ोसी को देखकर.

बीज हमेशा प्रमाणित और नई किस्म का ही लें. बीज बोने से पहले बीज उपचार जरूर करें, क्योंकि यही शुरुआती रोग और कमजोर अंकुरण से फसल को बचाता है. यह छोटा-सा कदम बाद में होने वाले बड़े नुकसान से बचा सकता है.

समय पर बुआई सबसे बड़ा फायदा देती है. गेहूं, चना, मसूर या सरसों—जिस भी फसल की बुआई करें, उसकी अनुशंसित तारीख के आसपास ही बुआई करने की कोशिश करें. बहुत जल्दी या बहुत देर से बोई गई फसल मौसम की मार ज्यादा झेलती है.

खाद का संतुलित उपयोग करें. मिट्टी जांच कराकर उसी के अनुसार खाद डालें. नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश को एक साथ डालने की बजाय चरणों में देना बेहतर होता है. इससे फसल मजबूत रहती है और लागत भी काबू में रहती है.

पानी सोच-समझकर दें. हर फसल को हर समय पानी की जरूरत नहीं होती. गेहूं में कल्ले निकलते समय और दाना भरते समय पानी ज्यादा जरूरी होता है. दालों और तिलहनों में जरूरत से ज्यादा सिंचाई नुकसान कर सकती है.

खेत की नियमित निगरानी करें. हफ्ते में कम से कम एक बार फसल जरूर देखें. शुरुआती कीट या रोग समय पर पकड़ में आ जाएं, तो भारी दवा खर्च से बचा जा सकता है.

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बिना जानकारी नई किस्म या नई दवा न अपनाएं, pc-pexels

रबी 2025–26 में किसानों को क्या नहीं करना चाहिए?

अंधाधुंध खाद और कीटनाशक का प्रयोग न करें. ज्यादा दवा डालने से न तो पैदावार दोगुनी होती है और न ही रोग खत्म होते हैं. उल्टा इससे मिट्टी खराब होती है, लागत बढ़ती है और फसल कमजोर पड़ती है.

बिना जानकारी नई किस्म या नई दवा न अपनाएं. जो किस्म या दवा आपके क्षेत्र के लिए सिफारिश नहीं है, उसे केवल प्रचार या अफवाह के आधार पर न लें. पहले कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह जरूर लें.

एक ही फसल को बार-बार न बोएं. लगातार गेहूं या एक ही दाल बोने से मिट्टी थक जाती है और कीट-रोग स्थायी हो जाते हैं. फसल चक्र अपनाना लंबे समय में ज्यादा फायदेमंद होता है.

जरूरत से ज्यादा जुताई न करें. बार-बार और गहरी जुताई से मिट्टी की नमी उड़ जाती है और रबी फसल कमजोर हो जाती है. हल्की या सीमित जुताई बेहतर रहती है.

कटाई के बाद फसल अवशेष न जलाएं. पराली या अवशेष जलाने से मिट्टी की ताकत खत्म होती है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. इन्हें मिट्टी में मिलाना या मल्च के रूप में उपयोग करना ज्यादा फायदेमंद है.

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कीवी उत्पादन के मामले में देश का सबसे प्रमुख राज्य कौन सा है