Holi 2026: कैसे बनी गुजिया होली की पहचान, जानिए इस मिठाई का दिलचस्प इतिहास

16वीं और 17वीं सदी के दौरान मुगल काल में खानपान में काफी बदलाव आए. इसी दौर में गुजिया के अंदर खोया, चीनी और ड्राई फ्रूट्स भरने की परंपरा शुरू हुई. घी में डीप फ्राई करने का तरीका भी इसी समय लोकप्रिय हुआ. इससे गुजिया का स्वाद और समृद्ध हो गया.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 24 Feb, 2026 | 08:04 AM

Holi 2026: जैसे ही फाल्गुन का महीना आता है और होली की आहट सुनाई देने लगती है, घरों में एक खास तरह की खुशबू फैलने लगती है. किचन में मावा, सूजी, नारियल और मेवों की महक के साथ गुजिया बनने की तैयारी शुरू हो जाती है. होली बिना रंग के अधूरी मानी जाती है, लेकिन कई घरों में यह त्योहार गुजिया के बिना भी अधूरा लगता है. यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि परंपरा, अपनापन और खुशियों का प्रतीक है.

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि होली पर गुजिया बनाने की परंपरा आखिर शुरू कहां से हुई? इसका इतिहास कितना पुराना है? आइए जानते हैं.

प्राचीन काल से जुड़ी मिठाई की जड़ें

इतिहासकारों का मानना है कि गुजिया जैसी मिठाइयों का उल्लेख लगभग 13वीं सदी के आसपास मिलता है. उस समय इसे आज की तरह घी में तलकर नहीं बनाया जाता था. गेहूं के आटे की छोटी लोइयों में गुड़, शहद या सूखे मेवे भरकर उन्हें धूप में सुखाया जाता था. यह एक साधारण लेकिन पौष्टिक मिठाई थी, जो खासतौर पर बसंत ऋतु और फसल कटाई के समय बनाई जाती थी. धीरे-धीरे यह मिठाई त्योहारों से जुड़ने लगी और खासकर होली के साथ इसका गहरा रिश्ता बन गया.

देसी परंपरा या विदेशी असर?

कुछ विद्वानों का मानना है कि गुजिया पूरी तरह भारतीय मिठाई है. प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में “करणिका” नाम की एक मिठाई का उल्लेख मिलता है, जिसमें आटे की परत के अंदर शहद और मेवे भरे जाते थे. कई लोग इसे आधुनिक गुजिया का प्रारंभिक रूप मानते हैं.

वहीं कुछ खाद्य इतिहासकार यह भी कहते हैं कि गुजिया पर मध्य-पूर्व की मिठाइयों का असर हो सकता है. जैसे बकलावा या मीठा समोसा, जिनमें परतों के अंदर सूखे मेवे और मीठा भरावन भरा जाता है. पुराने व्यापार मार्गों के जरिए यह विचार भारत आया हो सकता है. हालांकि, समय के साथ गुजिया ने अपना अलग भारतीय रूप ले लिया.

मुगल काल में आया स्वाद का बदलाव

16वीं और 17वीं सदी के दौरान मुगल काल में खानपान में काफी बदलाव आए. इसी दौर में गुजिया के अंदर खोया, चीनी और ड्राई फ्रूट्स भरने की परंपरा शुरू हुई. घी में डीप फ्राई करने का तरीका भी इसी समय लोकप्रिय हुआ. इससे गुजिया का स्वाद और समृद्ध हो गया. धीरे-धीरे यह मिठाई राजघरानों से निकलकर आम लोगों के घरों तक पहुंची और खास अवसरों पर बनने लगी.

होली से कैसे जुड़ी गुजिया?

उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश के ब्रज और बुंदेलखंड क्षेत्र में गुजिया को होली की खास मिठाई माना जाता है. वृंदावन और मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण को होली के अवसर पर गुजिया का भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है.

चूंकि होली का त्योहार राधा-कृष्ण के प्रेम और उल्लास से जुड़ा है, इसलिए गुजिया भी इस उत्सव का हिस्सा बन गई. रंग खेलने के बाद मेहमानों को गुजिया खिलाने की परंपरा ने इसे सामाजिक मेलजोल का माध्यम बना दिया.

आज की गुजिया: स्वाद और परंपरा का संगम

समय के साथ गुजिया में कई तरह के बदलाव आए. कहीं इसे सूजी से बनाया जाता है, तो कहीं खोया और नारियल का मिश्रण डाला जाता है. कुछ लोग इसे बेक करके बनाते हैं तो कुछ चाशनी में डुबोकर.

फिर भी एक बात नहीं बदली होली पर घर में गुजिया बनाना आज भी खुशियों और अपनापन बांटने का जरिया है. यह मिठाई सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास भी बढ़ाती है.

परंपरा जो पीढ़ियों से चल रही है

होली पर गुजिया बनाने का रिवाज कोई एक दिन में शुरू नहीं हुआ. यह सदियों की परंपरा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और समय के साथ हुए बदलावों का नतीजा है.

आज भी जब घर में गुजिया बनती है, तो सिर्फ एक मिठाई तैयार नहीं होती, बल्कि यादें, परंपराएं और त्योहार की खुशी भी साथ में पकती है. यही वजह है कि होली 2026 हो या आने वाले सालों की होली, गुजिया का स्वाद हमेशा इस त्योहार की पहचान बना रहेगा.

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