खेती की बढ़ती जरूरतों ने बढ़ाया यूरिया का दबाव, घरेलू उत्पादन घटा तो आयात पर फिर बढ़ी निर्भरता

सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है, जिससे 45 किलो का एक बैग सिर्फ 267 रुपये में मिल जाता है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह किसी राहत से कम नहीं है. इसके मुकाबले डीएपी और अन्य उर्वरक काफी महंगे हैं, इसलिए किसान मजबूरी में भी यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.

नई दिल्ली | Updated On: 29 Jan, 2026 | 06:54 AM

Urea import: देश के खेतों में इस समय फसलें लहलहा रही हैं, लेकिन इन्हें हरा-भरा रखने के लिए जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है, वह है यूरिया. अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच किसानों ने पहले से ज्यादा यूरिया खरीदा, लेकिन इसी दौरान देश में इसका उत्पादन कम हो गया. नतीजा यह हुआ कि भारत को बड़ी मात्रा में यूरिया विदेशों से मंगाना पड़ा.

फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में यूरिया की बिक्री बढ़ी है, लेकिन घरेलू उत्पादन साथ नहीं दे पाया. यही वजह है कि आयात में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखने को मिली.

यूरिया की मांग क्यों बढ़ी

अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच देश में यूरिया की बिक्री करीब 4 प्रतिशत बढ़कर 3 करोड़ 11 लाख टन तक पहुंच गई. पिछले साल इसी अवधि में यह बिक्री करीब 3 करोड़ टन थी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यूरिया किसानों के लिए सबसे सस्ता और आसानी से मिलने वाला उर्वरक है.

सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है, जिससे 45 किलो का एक बैग सिर्फ 267 रुपये में मिल जाता है. छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह किसी राहत से कम नहीं है. इसके मुकाबले डीएपी और अन्य उर्वरक काफी महंगे हैं, इसलिए किसान मजबूरी में भी यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं.

घरेलू उत्पादन ने क्यों छोड़ा साथ

जहां मांग बढ़ी, वहीं देश में यूरिया का उत्पादन करीब 3 प्रतिशत घटकर 2 करोड़ 24 लाख टन रह गया. उत्पादन में आई इस गिरावट ने चिंता बढ़ा दी. जब देश में जरूरत के हिसाब से यूरिया नहीं बन पाया, तो आयात ही एकमात्र रास्ता बचा.

आयात में जबरदस्त उछाल

घरेलू उत्पादन घटने का सीधा असर आयात पर पड़ा. अप्रैल से दिसंबर 2025 के बीच भारत ने करीब 80 लाख टन यूरिया आयात किया, जो पिछले साल की तुलना में 85 प्रतिशत से ज्यादा है. यह साफ दिखाता है कि देश अभी भी यूरिया के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है.

डीएपी और अन्य उर्वरकों की स्थिति

सिर्फ यूरिया ही नहीं, डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट के मामले में भी देश को चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इस वित्त वर्ष की पहली तीन तिमाहियों में डीएपी का घरेलू उत्पादन करीब 4 प्रतिशत घटकर 30 लाख टन के आसपास रहा. इसके बावजूद आयात बढ़ाकर करीब 60 लाख टन करना पड़ा.

डीएपी की बिक्री भी थोड़ी कम हुई है, क्योंकि इसकी कीमत ज्यादा है. 50 किलो का एक बैग लगभग 1,350 रुपये में मिलता है, जबकि पोटाश और अन्य मिश्रित उर्वरकों की कीमत 1,500 रुपये से ऊपर है. ऐसे में किसान सस्ता होने की वजह से यूरिया की ओर ज्यादा झुकते हैं.

मिट्टी की सेहत और संतुलन की चिंता

FAI के अधिकारियों का कहना है कि ये आंकड़े सिर्फ मांग और आपूर्ति की कहानी नहीं बताते, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि अब धीरे-धीरे संतुलित उर्वरक इस्तेमाल की जरूरत समझी जा रही है. ज्यादा यूरिया डालने से मिट्टी की सेहत बिगड़ सकती है, इसलिए नाइट्रोजन के साथ-साथ फॉस्फोरस और पोटाश का भी सही इस्तेमाल जरूरी है.

रबी सीजन अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और आने वाले महीनों में उर्वरकों की मांग और बढ़ सकती है. ऐसे में जरूरी है कि घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाए, आयात को संतुलित रखा जाए और किसानों को सही जानकारी दी जाए कि कौन-सा उर्वरक कब और कितना इस्तेमाल करना है.

Published: 29 Jan, 2026 | 07:30 AM

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