ट्रेड डील की खबर से कश्मीरी अखरोट के दाम लुढ़के, 150 रुपये प्रति किलो तक गिरावट, आखिर किसानों में क्यों बढ़ी चिंता?
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में इस मुद्दे को खुलकर उठाया. उन्होंने कहा कि एक तरफ राज्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी उत्पादों को कम या शून्य शुल्क पर आयात की अनुमति दी जा रही है. उनका सवाल था कि इससे स्थानीय किसानों का क्या होगा?
India US trade deal: जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में अखरोट सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का सहारा है. हर साल शरद ऋतु में जब पेड़ों से अखरोट गिरते हैं, तो गांवों में रौनक लौट आती है. लेकिन इस बार माहौल थोड़ा बदला हुआ है. भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार समझौते की खबर से किसानों और व्यापारियों के मन में चिंता घर कर गई है. उन्हें डर है कि अगर विदेशी अखरोट सस्ते दाम पर भारतीय बाजार में आए, तो कश्मीरी अखरोट की कीमत और मांग दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
उमर अब्दुल्ला ने जताई चिंता
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में इस मुद्दे को खुलकर उठाया. उन्होंने कहा कि एक तरफ राज्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर अमेरिकी उत्पादों को कम या शून्य शुल्क पर आयात की अनुमति दी जा रही है. उनका सवाल था कि इससे स्थानीय किसानों का क्या होगा? उन्होंने साफ कहा कि यह समझौता जम्मू-कश्मीर के अखरोट और बादाम उत्पादकों के हित में नहीं है.
क्या है समझौते में?
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों को टैरिफ रेट कोटा के तहत सीमित मात्रा में कम शुल्क पर आयात की अनुमति दी जा सकती है. इनमें अखरोट, बादाम, पिस्ता और दालें शामिल हैं. मार्च में अंतिम समझौता लागू होने की संभावना है. हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि शुल्क कितना घटेगा, लेकिन सिर्फ खबर से ही बाजार में हलचल मच गई है.
दामों में आई गिरावट
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीर ड्राई फ्रूट एसोसिएशन के अध्यक्ष हाजी बहादुर खान ने बताया कि समझौते की घोषणा के बाद कश्मीरी अखरोट के दाम 100 से 150 रुपये प्रति किलो तक गिर गए. पहले जो अखरोट 300 रुपये से लेकर 1400 रुपये प्रति किलो तक बिकते थे, अब उनके दाम नीचे आ गए हैं. छोटे व्यापारी, जिन्होंने किसानों से बड़ी मात्रा में माल खरीद रखा है, अब नुकसान की आशंका में हैं.
कश्मीरी अखरोट की खास पहचान
कश्मीर में तीन प्रमुख किस्म के अखरोट उगाए जाते हैं- वौंथ, बुर्जेल और कागजी. वौंथ सख्त और अपेक्षाकृत सस्ता होता है. बुर्जेल मध्यम श्रेणी का है, जबकि कागजी सबसे महंगा और आसानी से टूटने वाला होता है.
2017 में शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के एक अध्ययन में पाया गया था कि कश्मीरी अखरोट में अच्छे फैटी एसिड की मात्रा अधिक होती है और यह हृदय रोग के खतरे को कम करने में सहायक है. यही वजह है कि इसे प्रीमियम उत्पाद माना जाता है.
उत्पादन और आयात के आंकड़े
केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक, भारत में लगभग 86,000 हेक्टेयर भूमि पर अखरोट की खेती होती है और इसका अधिकांश हिस्सा जम्मू-कश्मीर से आता है. देश में कुल 307 मीट्रिक टन अखरोट का उत्पादन दर्ज किया गया, जबकि 2134 मीट्रिक टन से अधिक अखरोट का निर्यात भी हुआ.
दूसरी ओर, 2024 में भारत ने 3785 मीट्रिक टन से अधिक अखरोट आयात किए. इनमें अफगानिस्तान, चिली और ऑस्ट्रेलिया प्रमुख आपूर्तिकर्ता रहे. अमेरिका से आयात की मात्रा अभी केवल 25,402 किलोग्राम रही है, लेकिन अगर शुल्क घटता है तो यह बढ़ सकता है.
बाजार की हकीकत
श्रीनगर के निर्यातक नूर-उद-दीन आजाद बताते हैं कि भारतीय ग्राहक अक्सर चिली जैसे देशों के अखरोट पसंद करते हैं, क्योंकि उनकी गिरी ज्यादा सफेद और चमकदार दिखती है. हर साल करीब 2000 से 3000 कंटेनर, जिनमें हर एक में लगभग 10 टन अखरोट होता है, भारत में आयात होते हैं. इसके मुकाबले कश्मीर से केवल लगभग 700 ट्रक अखरोट बाजार में आते हैं, जो बढ़ती मांग के कारण 15 दिनों में ही खप जाते हैं.
विशेषज्ञों की राय
जम्मू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र प्रोफेसर दीपंकर सेन गुप्ता का मानना है कि कश्मीरी अखरोट एक “उच्च मूल्य, कम मात्रा” का कारोबार है. उनके अनुसार, कश्मीरी अखरोट की अपनी अलग पहचान और प्रीमियम बाजार है. इसलिए यह देखना होगा कि अंतिम टैरिफ दर क्या तय होती है और उसका वास्तविक असर कितना पड़ेगा.
जीआई टैग से उम्मीद
कश्मीरी केसर को 2020 में जीआई टैग मिलने के बाद उसकी पहचान और कीमत में सुधार हुआ था. अब सरकार कश्मीरी अखरोट को भी जीआई टैग दिलाने की दिशा में काम कर रही है. अगर यह सफल होता है, तो इससे कश्मीरी अखरोट की ब्रांड वैल्यू बढ़ेगी और बाजार में उसकी अलग पहचान बनेगी.
फिलहाल भारत-अमेरिका ट्रेड डील का असर कितना गहरा होगा, यह आने वाला समय बताएगा. लेकिन इतना तय है कि जम्मू-कश्मीर के अखरोट किसान अभी सतर्क और चिंतित दोनों हैं.