कोको-काजू उत्पादन बढ़ाकर भारत बनेगा ग्लोबल प्लेयर, किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को होगा बड़ा फायदा

इस बजट में कोको और काजू जैसी नकदी फसलों को खास महत्व दिया गया है. सरकार का लक्ष्य अब केवल खेती बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन फसलों के जरिए भारत को आत्मनिर्भर बनाना और 2030 तक इन्हें वैश्विक बाजार में एक भरोसेमंद और प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करना है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 2 Feb, 2026 | 10:51 AM

Budget 2026: देश की खेती और किसानों की आमदनी को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार ने बजट 2026-27 में एक ऐसा फैसला लिया है, जो आने वाले सालों में बड़ा बदलाव ला सकता है. इस बजट में कोको और काजू जैसी नकदी फसलों को खास महत्व दिया गया है. सरकार का लक्ष्य अब केवल खेती बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इन फसलों के जरिए भारत को आत्मनिर्भर बनाना और 2030 तक इन्हें वैश्विक बाजार में एक भरोसेमंद और प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करना है. यह कदम किसानों के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि आधारित उद्योगों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है.

क्यों कोको और काजू पर फोकस जरूरी था

वर्तमान हालात पर नजर डालें तो भारत कोको की जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी हद तक विदेशों पर निर्भर है. देश में हर साल कोको की मांग करीब 1.5 लाख टन तक पहुंच चुकी है, लेकिन घरेलू उत्पादन अभी भी सिर्फ 25 से 30 हजार टन के बीच ही सिमटा हुआ है. इस बड़े अंतर के कारण भारत को भारी मात्रा में कोको आयात करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा बाहर जाती है. इतना ही नहीं, बढ़ती मांग के बावजूद देश के किसानों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता. सरकार ने इसी कमी को समझते हुए अब कोको उत्पादन को रणनीतिक रूप से बढ़ाने का फैसला लिया है.

खेती के नए अवसर खुलेंगे

सरकार की योजना है कि कोको और काजू की खेती को खास तौर पर तटीय और पहाड़ी इलाकों में बढ़ावा दिया जाए. इन क्षेत्रों की मिट्टी और जलवायु इन फसलों के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है. अगर किसानों को अच्छी गुणवत्ता की पौध, सही तकनीकी जानकारी और बाजार तक सीधी पहुंच मिले, तो वे पारंपरिक फसलों के साथ-साथ कोको और काजू जैसी महंगी और लाभदायक फसलें भी उगा सकते हैं. इससे किसानों की आमदनी के नए रास्ते खुलेंगे और खेती पर निर्भरता ज्यादा सुरक्षित बनेगी.

मल्टी-क्रॉपिंग से घटेगा जोखिम

कोको की खेती का एक बड़ा फायदा यह है कि इसे अकेले उगाने की जरूरत नहीं होती. इसे नारियल, सुपारी और अन्य पेड़ों के साथ मल्टी-क्रॉपिंग के रूप में लगाया जा सकता है. सरकार इसी मॉडल को आगे बढ़ाना चाहती है, ताकि किसान एक ही जमीन से कई फसलों की आमदनी ले सकें. इससे अगर किसी एक फसल में नुकसान भी हो जाए, तो किसान पूरी तरह से प्रभावित नहीं होगा और उसकी आय बनी रहेगी.

प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन से बढ़ेगा फायदा

अब तक भारत में कोको से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि कच्चा माल बाहर से आता है और उसकी प्रोसेसिंग भी ज्यादातर विदेशों में होती है. चॉकलेट और दूसरे तैयार उत्पाद वहीं बनते हैं, जिससे असली मुनाफा देश से बाहर चला जाता है. सरकार की नई नीति इस स्थिति को बदलने की दिशा में बड़ा कदम है. देश के भीतर प्रोसेसिंग यूनिट, फूड पार्क और छोटे उद्योगों को बढ़ावा देकर कोको और काजू से जुड़े उत्पाद भारत में ही तैयार किए जाएंगे. इससे रोजगार बढ़ेगा और ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूती मिलेगी.

गांवों और महिलाओं को मिलेगा सीधा फायदा

यह योजना सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे ग्रामीण विकास और रोजगार से भी जोड़ा गया है. कोको और काजू की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग से गांवों में नए काम पैदा होंगे. खास बात यह है कि इस पहल में महिलाओं की भूमिका को भी अहम माना गया है. स्वयं सहायता समूहों और महिला उद्यमियों को इससे जोड़कर उन्हें स्थायी आमदनी के अवसर दिए जा सकते हैं. इससे लखपति दीदी जैसे अभियानों को भी मजबूती मिलेगी.

2030 तक सरकार का साफ लक्ष्य

सरकार का विजन बिल्कुल स्पष्ट है. साल 2030 तक भारत को कोको और काजू के उत्पादन के साथ-साथ उनकी प्रोसेसिंग में भी पूरी तरह सक्षम बनाना है, ताकि आयात पर निर्भरता लगभग खत्म हो जाए. साथ ही, भारतीय कोको और काजू को अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुणवत्ता और भरोसे का प्रतीक बनाकर बेहतर दामों पर बेचा जा सके. अगर यह योजना सही तरीके से लागू होती है, तो यह न सिर्फ किसानों की जिंदगी बदलेगी, बल्कि भारत को एक मजबूत कृषि आधारित वैश्विक ब्रांड बनाने की दिशा में भी बड़ा कदम साबित होगी.

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