डॉलर मजबूत होते ही क्यों डगमगाया भारतीय काजू उद्योग? अब शादी सीजन से उम्मीद

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कच्चे माल की लागत तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन बाजार में काजू के बिकने वाले दाम लगभग स्थिर बने हुए हैं. इस असंतुलन की वजह से कई प्रोसेसर और व्यापारी घाटे में काम कर रहे हैं. नकदी बनाए रखने और स्टॉक निकालने के लिए उन्हें लागत से कम कीमत पर भी माल बेचना पड़ रहा है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 9 Jan, 2026 | 08:15 AM

Weak rupee impact: भारत का काजू उद्योग इन दिनों एक अजीब दोराहे पर खड़ा है. एक तरफ कमजोर होता रुपया निर्यातकों के लिए राहत लेकर आया है, तो दूसरी तरफ यही गिरावट काजू प्रोसेसिंग से जुड़े कारोबारियों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है. कच्चे काजू के आयात पर बढ़ती लागत, घरेलू बाजार में ठहरी कीमतें और अवैध आयात ने मिलकर पूरे सेक्टर को दबाव में डाल दिया है. हालात ऐसे बन गए हैं कि कई प्रोसेसर लागत से भी कम दाम पर काजू बेचने को मजबूर हो रहे हैं.

आयात पर निर्भरता बनी सबसे बड़ी कमजोरी

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में काजू प्रोसेसिंग की क्षमता घरेलू कच्चे काजू के उत्पादन से कहीं ज्यादा है. यही वजह है कि प्रोसेसरों को पश्चिमी अफ्रीकी देशों से बड़े पैमाने पर कच्चा काजू आयात करना पड़ता है. जैसे-जैसे डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हुआ, आयात की लागत तेजी से बढ़ गई. शुरुआती 2026 में डॉलर के मुकाबले रुपया 90 से 92 के स्तर तक पहुंच गया, जिससे कच्चे माल की कीमतें रुपये के हिसाब से 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ गईं.

बीटा ग्रुप के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर जे. राजमोहन पिल्लई का कहना है कि बाहर से देखने पर कमजोर रुपया निर्यात के लिए फायदेमंद लगता है, लेकिन असल में इसने प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के लिए गहरी संकट की स्थिति पैदा कर दी है. आयात महंगा हो गया है, जबकि घरेलू बाजार में काजू की कीमतों में वैसी बढ़ोतरी नहीं हो पाई है.

लागत बढ़ी, लेकिन दाम नहीं बढ़े

सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कच्चे माल की लागत तो तेजी से बढ़ी है, लेकिन बाजार में काजू के बिकने वाले दाम लगभग स्थिर बने हुए हैं. इस असंतुलन की वजह से कई प्रोसेसर और व्यापारी घाटे में काम कर रहे हैं. नकदी बनाए रखने और स्टॉक निकालने के लिए उन्हें लागत से कम कीमत पर भी माल बेचना पड़ रहा है.

जैसे ही प्रोसेसर बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए खुदरा कीमतें बढ़ाने की कोशिश करते हैं, घरेलू मांग कमजोर पड़ने लगती है. आम उपभोक्ता महंगे काजू से दूरी बनाने लगता है, जिससे बिक्री पर और असर पड़ता है.

अवैध आयात ने बढ़ाई परेशानी

काजू उद्योग की मुश्किलें यहीं खत्म नहीं होतीं. अफ्रीका और वियतनाम से तैयार काजू गिरी का अवैध आयात भी घरेलू बाजार को नुकसान पहुंचा रहा है. कई खेपों को मवेशियों के चारे या भूसी के नाम पर गलत तरीके से घोषित किया जाता है, ताकि 25 से 30 प्रतिशत आयात शुल्क से बचा जा सके. ये सस्ते और कम गुणवत्ता वाले काजू भारतीय बाजार में पहुंचकर स्थानीय प्रोसेसरों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं.

गोवा काजू मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रोहित जांट्ये के मुताबिक वियतनाम से आने वाले ऐसे मामलों में हाल के महीनों में तेजी आई है. इससे घरेलू उद्योग पर सीधा असर पड़ रहा है और सरकार से इस पर सख्त कार्रवाई की मांग की जा रही है.

निर्यात बढ़ा, लेकिन फायदा सीमित

कमजोर रुपये का एक फायदा यह जरूर हुआ है कि निर्यात आधारित इकाइयों ने रिकॉर्ड शिपमेंट दर्ज किए हैं. हाल के महीनों में काजू निर्यात का मूल्य 100 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा है. लेकिन यह फायदा पूरे उद्योग तक नहीं पहुंच पा रहा है, क्योंकि निर्यात कुल कारोबार का एक छोटा हिस्सा ही है. ज्यादातर प्रोसेसर घरेलू बाजार और आयातित कच्चे माल पर निर्भर हैं, जहां हालात लगातार बिगड़ रहे हैं.

बढ़ी प्रोसेसिंग क्षमता, लेकिन टिकाऊ लाभ पर सवाल

मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल से भारत में काजू प्रोसेसिंग क्षमता में काफी इजाफा हुआ है. गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और विशाखापत्तनम जैसे इलाकों में नई प्रोसेसिंग यूनिट्स शुरू हुई हैं. इससे घरेलू सप्लाई तो बढ़ी है, लेकिन बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि कितनी कंपनियां लंबे समय तक मुनाफे में रह पाएंगी.

विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय काजू बाजार में 8 से 10 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि की संभावना है, लेकिन फिलहाल दीवाली के बाद मांग सुस्त बनी हुई है.

शादी के सीजन से उम्मीदें

कोल्लम स्थित विजयलक्ष्मी काजू कंपनी के प्रबंध निदेशक प्रताप नायर का कहना है कि जनवरी के मध्य से शादी-विवाह का सीजन शुरू होते ही घरेलू मांग में सुधार आ सकता है. आमतौर पर यह सीजन दो से तीन महीने तक चलता है और इस दौरान काजू की खपत बढ़ जाती है. भारत में काजू गिरी की लगभग 70 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरी होती है, जबकि बाकी 30 प्रतिशत घरेलू उत्पादन से आती है.

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