वियतनाम की बंपर फसल का असर, भारत में रोबस्टा कॉफी के दाम लुढ़के, किसानों की मुश्किलें बढ़ीं

किसानों का आरोप है कि वैश्विक बाजार में जब कीमतें थोड़ी बढ़ती हैं, तो स्थानीय व्यापारी उसी अनुपात में दाम नहीं बढ़ाते. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें 5–10 सेंट गिरती हैं, तो घरेलू बाजार में तुरंत तेज कटौती कर दी जाती है. बढ़ती उत्पादन लागत के बीच किसानों को कीमतों का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 8 Jan, 2026 | 11:12 AM

देश में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली कॉफी किस्म रोबस्टा इन दिनों दबाव में है. वजह साफ है दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक देशों में शामिल वियतनाम से आपूर्ति बेहतर हुई है, जिससे वैश्विक बाजार में उपलब्धता बढ़ गई है. इसका सीधा असर भारत के कॉफी किसानों पर पड़ा है. फसल कटाई के मौसम की शुरुआत में ही दाम गिरने लगे हैं और ऊपर से मजदूरी लागत में तेज उछाल ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.

साल भर में 17 प्रतिशत फीसदी तक फिसले दाम

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, कॉफी बोर्ड के ताजा आंकड़े बताते हैं कि रोबस्टा पार्चमेंट के भाव, जो पिछले साल जनवरी की शुरुआत में 50 किलो की बोरी पर 18,800 से 19,400 रुपये के दायरे में थे, अब घटकर 15,500 से 16,000 रुपये पर आ गए हैं. यानी करीब 17 प्रतिशत की गिरावट. इसी तरह, सबसे ज्यादा उत्पादित होने वाली रोबस्टा चेरी के दाम भी कमजोर पड़े हैं. पिछले साल जहां ये 10,900 से 11,200 रुपये के आसपास थे, वहीं अब 9,500 से 10,250 रुपये तक फिसल गए हैं.

अच्छी फसल, लेकिन बाजार में दबाव

कर्नाटक ग्रोअर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शिवन्ना हलसे का कहना है कि वियतनाम में इस साल फसल अच्छी रही है, इसी वजह से रोबस्टा की कीमतों पर दबाव बना है. उनका कहना है कि यह थोड़ा हैरान करने वाला भी है कि दोनों प्रमुख किस्मों रोबस्टा और अरेबिका की कीमतें एक-दूसरे से उलट दिशा में चल रही हैं. जहां रोबस्टा कमजोर है, वहीं अरेबिका में मजबूती दिख रही है.

अरेबिका में मजबूती, लेकिन रोबस्टा से उम्मीद कम

जनवरी की शुरुआत में अरेबिका पार्चमेंट के भाव 50 किलो की बोरी पर 25,800 से 26,300 रुपये के आसपास बने हुए हैं, जबकि एक साल पहले ये 22,600 से 23,000 रुपये थे. अरेबिका चेरी के दाम भी बढ़कर 13,400 से 15,000 रुपये के स्तर पर पहुंच गए हैं. इसके उलट, रोबस्टा उत्पादकों को राहत नहीं मिल पा रही है.

मांग सुस्त, खरीदारों की आहट कम

किसानों की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती. शिवन्ना हलसे बताते हैं कि इस साल बाजार में मांग सुस्त है. पहले स्थानीय व्यापारी और एग्रीगेटर किसानों के दरवाजे तक खरीद के लिए पहुंच जाते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो रहा. अब किसानों को बड़े खरीदारों के आने का इंतजार करना पड़ रहा है. ऊपर से पिछले साल का कुछ रोबस्टा पार्चमेंट स्टॉक भी किसानों के पास बचा हुआ है, जिससे दबाव और बढ़ गया है.

मजदूरी लागत ने बढ़ाई चिंता

कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन के चेयरमैन एम सलमान बसीर के मुताबिक, रोबस्टा की कीमतें अपने पिछले साल के शिखर स्तर से करीब 22 प्रतिशत तक गिर चुकी हैं. वे कहते हैं कि फसल की स्थिति अभी पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन एक बात तय है तोड़ाई की लागत ने किसानों की कमर तोड़ दी है. पिछले साल जहां रोबस्टा की तुड़ाई पर 3–4 रुपये प्रति किलो खर्च आता था, वहीं इस साल यह लागत बढ़कर 8 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है. मजदूरों की कमी ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है.

मौसम ने भी बिगाड़ा गणित

सलमान बसीर बताते हैं कि नवंबर और दिसंबर में हुई बारिश के कारण मिट्टी में नमी ज्यादा बनी हुई है. इसका असर यह हुआ कि रोबस्टा की पकने की प्रक्रिया एकसार नहीं रही. गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किसानों को चुनिंदा तुड़ाई करनी पड़ रही है, जिससे लागत और बढ़ रही है.

कीमतों का खेल और किसानों की नाराजगी

किसानों का आरोप है कि वैश्विक बाजार में जब कीमतें थोड़ी बढ़ती हैं, तो स्थानीय व्यापारी उसी अनुपात में दाम नहीं बढ़ाते. लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें 5–10 सेंट गिरती हैं, तो घरेलू बाजार में तुरंत तेज कटौती कर दी जाती है. बढ़ती उत्पादन लागत के बीच किसानों को कीमतों का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा.

रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान, लेकिन चिंता बरकरार

कॉफी बोर्ड ने 2025–26 के लिए शुरुआती अनुमान में देश का कॉफी उत्पादन रिकॉर्ड 4.03 लाख टन रहने की बात कही है. इसमें 2.84 लाख टन रोबस्टा और 1.18 लाख टन अरेबिका शामिल है. इससे पहले 2024–25 में कुल उत्पादन 3.63 लाख टन था. उत्पादन बढ़ना अच्छी खबर है, लेकिन मौजूदा बाजार हालात में किसानों के लिए यह राहत से ज्यादा चुनौती बनता दिख रहा है.

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