Basant Panchami: राजस्थान का अनोखा सरस्वती मंदिर, जहां प्रसाद नहीं बल्कि भोग में चढ़ती हैं पेन-कॉपी

मंदिर से जुड़ी एक पुरानी मान्यता यह भी है कि जिन बच्चों को बोलने में दिक्कत होती है, हकलाहट या तुतलाने की समस्या रहती है, उन्हें यहां दर्शन से लाभ मिलता है. ऐसी मान्यता है कि गंभीर समस्या होने पर भक्त चांदी की बनी जीभ चढ़ाते हैं. कई परिवारों का दावा है कि माता की कृपा से बच्चों की वाणी में सुधार आया और आत्मविश्वास बढ़ा.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 22 Jan, 2026 | 08:38 AM

Basant Panchami: राजस्थान की धरती सिर्फ किले, महल और वीरगाथाओं के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए भी जानी जाती है. ऐसी ही एक खास और प्रेरणादायक परंपरा सिरोही जिले के एक छोटे से गांव में देखने को मिलती है. यहां मां सरस्वती के एक प्राचीन मंदिर में भक्त मिठाई या फल नहीं, बल्कि पेन, कॉपी और किताबें चढ़ाते हैं. यह मंदिर शिक्षा, वाणी और बुद्धि से जुड़ी आस्था का ऐसा केंद्र है, जहां देशभर से लोग अपने बच्चों के भविष्य की कामना लेकर पहुंचते हैं.

शिक्षा की देवी से जुड़ी गहरी आस्था

बसंत पंचमी का दिन मां सरस्वती की पूजा के लिए विशेष माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन विद्या की देवी की आराधना करने से ज्ञान, विवेक और सृजनात्मकता का विकास होता है. वैसे तो देशभर में मां सरस्वती के कई मंदिर हैं, लेकिन सिरोही जिले के आजारी गांव स्थित मार्कंडेश्वर धाम का सरस्वती मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के कारण अलग पहचान रखता है. यहां आने वाले भक्त मानते हैं कि देवी की कृपा से बच्चों की पढ़ाई में आ रही रुकावटें दूर होती हैं और बोलने-सुनने से जुड़ी परेशानियों में भी सुधार आता है.

कलम-कॉपी का प्रसाद

इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां प्रसाद के रूप में पेन, कॉपी, किताबें और पेंसिल चढ़ाई जाती हैं. माता को अर्पित की गई ये वस्तुएं प्रतीक हैं ज्ञान और शिक्षा के प्रति समर्पण की. पूजा के बाद यही पेन और कॉपियां बच्चों को दी जाती हैं, ताकि वे पूरे मन से पढ़ाई करें और आगे बढ़ें. स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन बच्चों को पढ़ाई में मन नहीं लगता या जो बार-बार असफल हो रहे होते हैं, उनके माता-पिता यहां विशेष रूप से मन्नत मांगने आते हैं.

वाणी विकार और पढ़ाई से जुड़ी मान्यताएं

मंदिर से जुड़ी एक पुरानी मान्यता यह भी है कि जिन बच्चों को बोलने में दिक्कत होती है, हकलाहट या तुतलाने की समस्या रहती है, उन्हें यहां दर्शन से लाभ मिलता है. ऐसी मान्यता है कि गंभीर समस्या होने पर भक्त चांदी की बनी जीभ चढ़ाते हैं. कई परिवारों का दावा है कि माता की कृपा से बच्चों की वाणी में सुधार आया और आत्मविश्वास बढ़ा. यही वजह है कि यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उम्मीद और विश्वास का केंद्र बन गया है.

साधना और विद्या का प्राचीन केंद्र

कहा जाता है कि यह स्थान प्राचीन काल से ही साधना और अध्ययन का केंद्र रहा है. लोककथाओं के अनुसार, यहां कई विद्वानों और साधकों ने तपस्या की थी. समय के साथ यह जगह विद्या साधना की परंपरा से जुड़ गई. आज भी मंदिर की देखरेख रावल ब्राह्मण परिवार करता है, जो पीढ़ियों से यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी निभा रहा है.

बसंत पंचमी पर उमड़ती है भीड़

बसंत पंचमी के दिन इस मंदिर का दृश्य सबसे खास होता है. दूर-दूर से आए श्रद्धालु, पीले वस्त्रों में सजे बच्चे, हाथों में पेन-कॉपी लिए माता के दर्शन के लिए कतार में खड़े नजर आते हैं. इस दिन मंदिर परिसर में मेले जैसा माहौल बन जाता है. मां सरस्वती का विशेष श्रृंगार किया जाता है और वातावरण मंत्रोच्चार व भक्ति संगीत से गूंज उठता है.

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