न सोना, न हीरा… फिर भी बेशकीमती! जानिए रेत से सीप कैसे बनाती है चमकता हुआ मोती?

प्राकृतिक मोती का बनना पूरी तरह किस्मत पर निर्भर करता है. हर सीप के अंदर बाहरी कण जाए, यह जरूरी नहीं. और अगर कण जाए भी, तो जरूरी नहीं कि नेकर की परतें सही तरीके से जमें. यही वजह है कि प्राकृतिक मोती बहुत कम संख्या में बनते हैं और बेहद महंगे होते हैं. आज के समय में बाजार में मिलने वाले ज्यादातर मोती कल्चर्ड मोती होते हैं.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 2 Feb, 2026 | 10:05 AM

Pearl formation: जब भी मोती का नाम आता है, तो हमारे मन में चमक, सुंदरता और शाही आभा की तस्वीर उभर आती है. मोती सिर्फ गहनों की शोभा नहीं बढ़ाता, बल्कि यह प्रकृति की एक अनोखी और रहस्यमयी रचना भी है. हैरानी की बात यह है कि मोती न तो जमीन के नीचे से खोदे जाते हैं और न ही किसी चट्टान को तोड़कर निकाले जाते हैं. इनका जन्म समुद्र या मीठे पानी के भीतर, जीवित प्राणियों के शरीर में होता है. यही वजह है कि मोती को बाकी रत्नों से बिल्कुल अलग और खास माना जाता है. तो चलिओ जानते हैं कि समुद्र के अंदर मोती कैसे बनते हैं, इसमें कितना समय लगता है और आखिर मोती इतने दुर्लभ और कीमती क्यों होते हैं.

सीप के भीतर शुरू होती है कहानी

मोती बनने की प्रक्रिया की शुरुआत होती है सीप या मसल्स जैसे जलीय जीवों के अंदर. ये जीव पानी में रहते हुए लगातार सांस लेते हैं और भोजन ग्रहण करते हैं. इसी दौरान कई बार रेत का बहुत बारीक कण, किसी छोटे कीड़े का अंश या कोई बाहरी कण गलती से सीप के अंदर उसके मुलायम हिस्से में फंस जाता है. यह कण सीप के लिए बेहद तकलीफदेह होता है, क्योंकि उसका शरीर बहुत संवेदनशील होता है. सीप के पास उस बाहरी कण को बाहर निकालने का कोई आसान तरीका नहीं होता. यही से मोती बनने की प्राकृतिक प्रक्रिया शुरू होती है.

जब सक्रिय होता है प्रकृति का सुरक्षा कवच

बाहरी कण से होने वाली जलन और चोट से खुद को बचाने के लिए सीप का शरीर एक खास तरह की प्रतिक्रिया करता है. वह उस कण को बाहर फेंकने के बजाय उसे ढकने लगता है. इसके लिए सीप एक चमकदार और चिकना पदार्थ निकालता है, जिसे नेकर कहा जाता है. यही नेकर आगे चलकर मोती की पहचान बनता है.

नेकर मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट और एक प्राकृतिक प्रोटीन से मिलकर बना होता है. यह पदार्थ बिल्कुल उसी तरह परतें बनाता है, जैसे पेड़ के तने में साल-दर-साल छल्ले बनते जाते हैं.

समय के साथ आकार लेता मोती

नेकर की परतें धीरे-धीरे उस बाहरी कण के चारों ओर जमती जाती हैं. यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है. हर नई परत मोती को थोड़ा और बड़ा, चिकना और चमकदार बनाती है. कई महीनों तक या फिर कई सालों तक यह परतें बनती रहती हैं. जितनी ज्यादा समान और साफ परतें बनती हैं, उतना ही सुंदर और कीमती मोती तैयार होता है.

यही कारण है कि कुछ मोती बिल्कुल गोल और चमकदार होते हैं, जबकि कुछ टेढ़े-मेढ़े या कम चमक वाले भी मिलते हैं. मोती का रंग भी पानी की प्रकृति और सीप की प्रजाति पर निर्भर करता है. सफेद, क्रीम, गुलाबी और हल्के सुनहरे रंग के मोती सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं.

प्राकृतिक मोती क्यों होते हैं इतने दुर्लभ?

प्राकृतिक मोती का बनना पूरी तरह किस्मत पर निर्भर करता है. हर सीप के अंदर बाहरी कण जाए, यह जरूरी नहीं. और अगर कण जाए भी, तो जरूरी नहीं कि नेकर की परतें सही तरीके से जमें. यही वजह है कि प्राकृतिक मोती बहुत कम संख्या में बनते हैं और बेहद महंगे होते हैं.

आज के समय में बाजार में मिलने वाले ज्यादातर मोती कल्चर्ड मोती होते हैं. इनमें इंसान जानबूझकर सीप के अंदर एक छोटा सा नाभिक डाल देता है, ताकि मोती बनने की प्रक्रिया शुरू हो सके. हालांकि प्रक्रिया वही प्राकृतिक होती है, लेकिन शुरुआत इंसानी हस्तक्षेप से होती है.

प्रकृति की अद्भुत देन है मोती

मोती सिर्फ एक रत्न नहीं, बल्कि प्रकृति के धैर्य और संतुलन का प्रतीक है. एक छोटी सी परेशानी से जन्म लेकर, सालों की मेहनत और समय के बाद वह एक खूबसूरत रत्न का रूप ले लेता है. यही कारण है कि मोती को शांति, धैर्य और सुंदरता का प्रतीक माना जाता है. समुद्र की गहराइयों में जन्म लेने वाला यह रत्न आज भी इंसान के लिए उतना ही रहस्यमयी और आकर्षक है, जितना सदियों पहले था.

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