Budget 2026-27: हर साल आने वाला आम बजट सिर्फ पैसों का हिसाब नहीं होता, बल्कि यह बताता है कि सरकार किन लोगों और क्षेत्रों को कितनी प्राथमिकता दे रही है. बजट 2026-27 में सरकार ने खाद्य, उर्वरक और ईंधन (LPG) सब्सिडी को लेकर एक अहम फैसला लिया है. इन तीनों मदों पर खर्च को करीब 5 प्रतिशत घटाकर 4.3 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव रखा गया है. यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य लगातार बढ़ रहा है और सरकार पर खर्च का दबाव भी बढ़ता जा रहा है.
सरकार की आर्थिक सेहत पर फोकस
सरकार की वित्तीय स्थिति काफी हद तक उसकी सामाजिक योजनाओं पर निर्भर करती है. खेती से जुड़ी सब्सिडी, ग्रामीण रोजगार योजनाएं और किसानों को दी जाने वाली सीधी मदद, ये सभी खर्च का बड़ा हिस्सा हैं. इसके बावजूद सरकार अब धीरे-धीरे खर्च को संतुलित करने की कोशिश कर रही है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा है कि 2026-27 में वित्तीय घाटा जीडीपी का करीब 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है. सरकार का दावा है कि उसने पहले किए गए वादे के मुताबिक घाटे को नियंत्रित करने की दिशा में लगातार काम किया है.
खाद्य सब्सिडी में क्या बदला
हर साल गेहूं और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ने से सरकार की खरीद लागत भी बढ़ती है. इसके बावजूद खाद्य सब्सिडी में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की गई है. सरकार का मानना है कि बेहतर प्रबंधन और वितरण व्यवस्था से कम खर्च में भी खाद्य सुरक्षा बनाए रखी जा सकती है. इसका मकसद यह है कि जरूरतमंद लोगों तक सस्ता अनाज पहुंचे, लेकिन सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ न बढ़े.
LPG सिलेंडर पर सब्सिडी में बड़ी कटौती
इस बजट में सबसे ज्यादा चर्चा LPG गैस सिलेंडर की सब्सिडी को लेकर हो रही है. सरकार ने इसमें करीब 27 प्रतिशत की कटौती की है. दरअसल, पिछले साल तेल विपणन कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने 30,000 करोड़ रुपये देने का फैसला किया था. यह रकम 12 किश्तों में दी जानी है. जून 2025 तक LPG पर कंपनियों का घाटा करीब 49,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था. सरकार का मानना है कि एक बार कंपनियों को मदद देने के बाद आगे सब्सिडी का बोझ कम किया जा सकता है.
उर्वरक सब्सिडी पर संतुलन
उर्वरक सब्सिडी को लेकर सरकार ने बीच का रास्ता अपनाया है. फॉस्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों के लिए भारत अभी भी काफी हद तक आयात पर निर्भर है. पिछले साल इन पर सब्सिडी बढ़ानी पड़ी थी, लेकिन इस बार इसे थोड़ा कम किया गया है. वहीं, देश में बनने वाले यूरिया पर सरकार ने मजबूत समर्थन जारी रखा है. इसका मकसद यह है कि किसानों को सस्ती खाद मिलती रहे और देश की उर्वरक आपूर्ति सुरक्षित बनी रहे.
उद्योग और विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं
उर्वरक क्षेत्र में सरकार ने संतुलन बनाने की कोशिश की है. फॉस्फेट और पोटाश जैसे उर्वरकों में भारत की आयात पर निर्भरता 90 प्रतिशत से ज्यादा है. चालू वित्त वर्ष में इन उर्वरकों पर सब्सिडी को बढ़ाकर 60,000 करोड़ रुपये किया गया था, जबकि अगले साल के लिए इसे घटाकर 54,000 करोड़ रुपये रखा गया है. वहीं, स्वदेशी यूरिया को लेकर सरकार ने मजबूत समर्थन जारी रखा है. घरेलू यूरिया के लिए 91,000 करोड़ रुपये और आयातित यूरिया के लिए 32,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.
उर्वरक उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किसानों को सस्ते दाम पर खाद मिलती रहेगी और आपूर्ति भी बनी रहेगी. घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर सरकार आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है.
उद्योग की प्रतिक्रिया और चुनौतियां
उर्वरक उद्योग के प्रतिनिधियों का मानना है कि सब्सिडी में यह बदलाव वैश्विक अस्थिरता के दौर में उद्योग को मजबूत बनाए रखने की कोशिश है. घरेलू और आयातित उर्वरकों के लिए अलग-अलग प्रावधान से आपूर्ति सुरक्षा सुनिश्चित होगी. हालांकि, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जटिल उर्वरकों के मामले में 15 से 20 प्रतिशत तक की कमी देखने को मिल सकती है, क्योंकि कच्चे माल और आयातित उर्वरकों की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं. ऐसे में संभावना है कि सरकार जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त मदद दे सकती है, जैसा कि पहले भी होता रहा है.
आम लोगों और किसानों पर असर
सब्सिडी में कटौती का सीधा असर आम लोगों और किसानों पर पड़ने की आशंका रहती है, लेकिन सरकार का कहना है कि यह कटौती बहुत सीमित है. खाद्य सुरक्षा और किसानों को मिलने वाली मदद को खत्म नहीं किया गया है. कोशिश यह है कि कम खर्च में ज्यादा असरदार नीतियां लागू की जाएं.
क्या संकेत देता है यह बजट
बजट 2026-27 साफ संकेत देता है कि सरकार अब धीरे-धीरे वित्तीय अनुशासन की ओर बढ़ रही है. खाद्य, उर्वरक और ईंधन जैसी जरूरी सब्सिडी में संतुलन बनाकर सरकार लंबे समय की आर्थिक स्थिरता चाहती है. आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस फैसले का असर किसानों, उद्योग और आम जनता पर कैसे पड़ता है.