दूध उत्पादन में भैंस को टक्कर दे रही ये बकरी, कम खर्च में किसानों की कमाई भी होगी जबरदस्त

बकरी पालन को गांव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है. इसका कारण साफ है बकरी कम चारा खाती है, बीमारियां अपेक्षाकृत कम लगती हैं और बाजार में दूध, मांस व खाद तीनों की मांग बनी रहती है. बकरी का दूध पचाने में आसान होता है और बच्चों व बुजुर्गों के लिए खास माना जाता है.

Kisan India
नई दिल्ली | Published: 2 Feb, 2026 | 07:25 AM

Goat farming: खेती की आमदनी जब मौसम और बाजार के भरोसे डगमगाती है, तब गांवों में लोग ऐसे काम की तलाश करते हैं जो रोज की कमाई दे, जोखिम कम हो और देखभाल भी आसान रहे. यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में पशुपालन, खासकर बकरी पालन, किसानों और युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ है. बकरी पालन न सिर्फ छोटे किसानों के लिए अनुकूल है, बल्कि सीमित जमीन और कम पूंजी में भी इसे शुरू किया जा सकता है. आज हम आपको एक ऐसी बकरी नस्ल के बारे में बता रहे हैं, जो दूध देने के मामले में भैंस को भी टक्कर देती है और कम निवेश में अच्छी कमाई का भरोसा देती है.

बकरी पालन क्यों बना पसंदीदा व्यवसाय

बकरी पालन को गांव की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है. इसका कारण साफ है बकरी कम चारा खाती है, बीमारियां अपेक्षाकृत कम लगती हैं और बाजार में दूध और मांस की मांग बनी रहती है. बकरी का दूध पचाने में आसान होता है और बच्चों व बुजुर्गों के लिए खास माना जाता है. यही वजह है कि शहरी इलाकों में भी बकरी के दूध की कीमत अच्छी मिल जाती है. सही नस्ल, संतुलित आहार और साफ-सफाई का ध्यान रखा जाए तो बकरी पालन से नियमित आय संभव है.

भैंस के बराबर दूध देने वाली खास नस्ल

जिस बकरी नस्ल की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, वह अपनी दूध देने की क्षमता के लिए जानी जाती है. आकार में भले ही यह बकरी भैंस से छोटी हो, लेकिन दूध के मामले में इसका प्रदर्शन चौंकाने वाला होता है. इस नस्ल की पहचान इसके लंबे कद, मजबूत शरीर और लटकते लंबे कानों से होती है. रंगत आमतौर पर भूरे या काले-सफेद मिश्रण में देखने को मिलती है, जिससे यह दूर से ही अलग नजर आती है.

यह बकरी रोजाना औसतन दो से तीन लीटर तक दूध दे सकती है. पूरे दुग्धकाल में भी इसका उत्पादन संतोषजनक रहता है, जिससे घर की जरूरत के साथ-साथ बिक्री के लिए भी दूध उपलब्ध हो जाता है. खास बात यह है कि यह बकरी खुले चरागाह में चरना पसंद करती है और सामान्य चारे में ही अच्छा उत्पादन देती है, जिससे चारे पर ज्यादा खर्च नहीं आता.

देखभाल आसान, परिणाम शानदार

इस नस्ल की एक और खासियत यह है कि इसे पालना आसान होता है. साफ और सूखा बाड़ा, नियमित टीकाकरण और समय पर पोषण दिया जाए तो यह बकरी लंबे समय तक स्वस्थ रहती है. यह जल्दी प्रजनन में भी आ जाती है और आमतौर पर 12 से 18 महीने की उम्र में पहली बार बच्चे दे देती है. इससे झुंड जल्दी बढ़ता है और कम समय में कारोबार फैलाने का मौका मिलता है.

दूध के साथ-साथ कई फायदे

बकरी पालन सिर्फ दूध तक सीमित नहीं है. बकरी के गोबर से अच्छी जैविक खाद बनती है, जो खेतों के लिए फायदेमंद होती है. वहीं, बच्चों के बड़े होने पर मांस के रूप में भी अच्छी कीमत मिल जाती है. इस तरह एक ही बकरी से कई स्तरों पर आमदनी के रास्ते खुल जाते हैं.

कम निवेश में तगड़ा मुनाफा

अगर लागत की बात करें तो इस नस्ल की बकरी आमतौर पर 4,000 से 6,000 रुपये के बीच मिल जाती है. शुरुआती खर्च में बाड़ा, टीकाकरण और चारा शामिल करें, तब भी कुल निवेश बहुत ज्यादा नहीं बढ़ता. सही देखभाल के साथ एक बकरी से दूध बेचकर महीने में लगभग 8,000 से 10,000 रुपये तक की कमाई संभव हो जाती है. जैसे-जैसे झुंड बढ़ता है, आमदनी भी उसी अनुपात में बढ़ती चली जाती है.

सरकार की मदद भी उपलब्ध

बकरी पालन को बढ़ावा देने के लिए सरकार समय-समय पर सब्सिडी और प्रशिक्षण की सुविधा भी देती है. कई राज्यों में पशुपालन विभाग के जरिए बकरी पालन पर अनुदान, बीमा और तकनीकी मार्गदर्शन मिलता है. इससे नए किसानों को शुरुआत में सहारा मिलता है और जोखिम भी कम होता है.

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