Pearl Farming : खेतों में अनाज और सब्जियां उगाना तो हम सब जानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि किसान अब अपने तालाबों में कीमती मोती भी उगा सकते हैं? जी हां, अब यह हकीकत है. उत्तर प्रदेश राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने मोती पालन को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसी पहल की शुरुआत की है जो पारंपरिक खेती से ऊब चुके किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आई है. अब किसान मिट्टी के साथ-साथ पानी से भी रत्न निकाल सकेंगे.
मोती पालन (Pearl Farming) न केवल आय का एक नया जरिया है, बल्कि यह किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है. आइए जानते हैं कैसे सीप की खेती आपकी किस्मत बदल सकती है.
राज्यपाल ने खुद देखी सीप की सर्जरी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में राजभवन में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने खुद सीप की सर्जरी (Mussel Surgery) की बारीकियों को देखा. विशेषज्ञों ने उन्हें दिखाया कि कैसे सीप के भीतर एक छोटा सा बीज डालकर प्राकृतिक रूप से मोती तैयार किया जाता है. राज्यपाल ने इस तकनीक को किसानों की आय दोगुनी करने का क्रांतिकारी माध्यम बताया. उन्होंने जोर दिया कि जब हमारा किसान समृद्ध होगा और खेती में ऐसे नए प्रयोग अपनाएगा, तभी देश सही मायने में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेगा.
डेढ़ साल में लगभग 8.5 लाख का मुनाफा
मोती पालन की गणित बहुत ही आकर्षक है. जानकारों के मुताबिक, अगर आप 2,000 वर्ग फुट के एक छोटे से तालाब में 10,000 सीप पालते हैं, तो करीब 18 महीने (डेढ़ साल) की मेहनत के बाद आप 8.5 लाख रुपये तक की शुद्ध आय हासिल कर सकते हैं. सीप के अंदर एक छोटा सा बीड (बीज) डाला जाता है, जिसे सीप धीरे-धीरे अपने प्राकृतिक लेप से ढकता है और वह एक कीमती मोती बन जाता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन मोतियों की भारी डिमांड है.
सरकार देगी 50 फीसदी सब्सिडी
पैसे की तंगी अब किसानों के आड़े नहीं आएगी. इस परियोजना के साथ ही यह जानकारी भी साझा की गई कि प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मोती पालन पर 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी मिल सकती है. यानी अगर आप इस काम में निवेश करना चाहते हैं, तो आधी मदद सरकार की तरफ से मिल जाएगी. राजभवन अब एक प्राइवेट एग्री-बिजनेस कंपनी के साथ करार (MoU) भी करने जा रहा है, ताकि किसानों को तकनीकी ट्रेनिंग और मार्केटिंग की पूरी मदद मिल सके.
घर बैठे ट्रेनिंग और बिक्री का पक्का इंतजाम
सीप फार्मिंग की सबसे बड़ी चिंता मार्केट की होती है. राज्यपाल के निर्देश पर अब ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है जहां किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए ट्रेनिंग, देखरेख और मार्केटिंग की सुविधा मिले. इसका मतलब यह है कि किसान को बस मेहनत करनी है, उसके मोतियों को सही दाम पर बेचने की जिम्मेदारी विशेषज्ञ कंपनियां उठाएंगी. यह न केवल रिस्क कम करेगा बल्कि युवाओं को अपनी मिट्टी से जुड़कर व्हाइट गोल्ड (मोती) पैदा करने का हौसला भी देगा.