बासमती चावल पर नया विवाद, APEDA से अलग बोर्ड बनाने की मांग तेज…निर्यातकों ने केंद्र सरकार से की अपील
पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन और ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि बासमती को एपीडा (APEDA) के दायरे से अलग किया जाए और इसके लिए समर्पित बोर्ड का गठन किया जाए.
Basmati rice board demand: भारत का बासमती चावल दुनिया भर में अपनी खुशबू और लंबे दाने के लिए मशहूर है. हर साल लाखों टन बासमती विदेशों में भेजा जाता है और इससे किसानों व निर्यातकों को बड़ी आमदनी होती है. अब दो प्रमुख निर्यातक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि बासमती चावल के लिए एक अलग वैधानिक बोर्ड बनाया जाए, ताकि इसकी गुणवत्ता, भौगोलिक संकेतक (GI) टैग और अंतरराष्ट्रीय पहचान की बेहतर सुरक्षा हो सके.
पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन और ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह व सहकारिता मंत्री को पत्र लिखकर कहा है कि बासमती को एपीडा (APEDA) के दायरे से अलग किया जाए और इसके लिए समर्पित बोर्ड का गठन किया जाए.
क्यों उठी अलग बोर्ड की मांग
बिजनेसलाइन की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में बासमती चावल के निर्यात और संबंधित गतिविधियों की निगरानी एपीडा करता है, जो कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने वाली एक व्यापक संस्था है. निर्यातक संगठनों का कहना है कि एपीडा का दायरा बहुत बड़ा है और वह सैकड़ों कृषि उत्पादों की देखरेख करता है.
उनका तर्क है कि बासमती जैसे संवेदनशील और जीआई टैग वाले उत्पाद के लिए अलग, विशेषज्ञ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली संस्था की जरूरत है. उनका मानना है कि एपीडा के पास न तो पर्याप्त तकनीकी ढांचा है और न ही खेत स्तर तक निगरानी की व्यवस्था, जिससे बासमती की विशिष्ट पहचान को सुरक्षित रखा जा सके.
जीआई टैग और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियां
बासमती चावल को भारत का भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त है, जो इसकी विशिष्ट पहचान और गुणवत्ता को दर्शाता है. लेकिन हाल के वर्षों में कुछ देशों ने भारतीय बासमती को जीआई मान्यता देने से इनकार किया है. ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और केन्या जैसे देशों ने इसे मंजूरी नहीं दी.
यूरोपीय संघ में भी भारत ने जुलाई 2018 में आवेदन किया था, लेकिन अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिली है. निर्यातक संगठनों का कहना है कि अगर अलग बासमती बोर्ड बनेगा, तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई सुरक्षा के लिए अधिक मजबूत तरीके से प्रयास कर सकेगा.
तकनीकी और वैज्ञानिक निगरानी की जरूरत
पंजाब राइस मिलर्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन का कहना है कि बासमती की असली पहचान बनाए रखने के लिए बीज प्रमाणन प्रणाली, आनुवंशिक शुद्धता की जांच और डीएनए प्रोफाइलिंग जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं. इसके अलावा उत्पादन क्षेत्रों के लिए बफर जोन तय करना और गुणवत्ता मानकों की सख्ती से निगरानी करना भी जरूरी है.
उनका कहना है कि ये सभी कार्य केवल निर्यात प्रोत्साहन से आगे बढ़कर तकनीकी और कानूनी ढांचे की मांग करते हैं, जिसके लिए अलग बोर्ड बेहतर विकल्प हो सकता है.
कृषि मंत्रालय के तहत लाने की मांग
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन ने सुझाव दिया है कि बासमती को कृषि मंत्रालय के अधीन लाया जाए, ताकि इसकी शुरुआत खेत स्तर से ही वैज्ञानिक तरीके से हो. उनका मानना है कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा विकसित तकनीकों और अनुसंधानों को सीधे किसानों तक पहुंचाने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर हो सकती हैं. इससे कम कीटनाशक उपयोग, सुरक्षित उत्पादन और जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा मिलेगा. साथ ही किसानों की आय स्थिर और मजबूत हो सकेगी.
बासमती का आर्थिक महत्व
भारत हर साल लगभग 60 लाख टन बासमती चावल का निर्यात करता है. इसकी कुल निर्यात कीमत करीब 55,000 करोड़ रुपये आंकी जाती है. यह चावल 100 से अधिक देशों में भेजा जाता है.
इतनी बड़ी निर्यात क्षमता होने के बावजूद अगर गुणवत्ता और पहचान से जुड़ी चुनौतियां बनी रहती हैं, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की छवि प्रभावित हो सकती है. निर्यातक संगठनों का कहना है कि एक समर्पित बासमती बोर्ड इस क्षेत्र में पारदर्शिता, समन्वय और दीर्घकालिक रणनीति सुनिश्चित कर सकता है.
निर्यातकों की इस मांग को लेकर अब सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार है. यदि अलग बासमती बोर्ड का गठन होता है, तो इससे बासमती उत्पादन, अनुसंधान और निर्यात को नई दिशा मिल सकती है.