ईरान-इजरायल जंग से आम निर्यात पर लगा ब्रेक, किसानों की कमाई होगी प्रभावित.. गिर सकती हैं कीमतें
ईरान-इजरायल तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से आंध्र प्रदेश के चित्तूर आम पल्प निर्यात पर संकट गहरा गया है. करीब 1,000 करोड़ रुपये का पल्प शिपमेंट के लिए तैयार है, लेकिन समुद्री मार्ग बाधित हैं. इससे तोतोपुरी आम किसानों, सप्लाई चेन और विदेशी निर्यात समझौतों पर असर पड़ने का खतरा है.
Mango Export: ईरान-इजरायल के बीच जारी जंग के चलते न केवल चावल और अंडा निर्यात प्रभावित हुआ है, बल्कि अब फलों के कारोबार पर भी असर पड़ रहा है. दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के चलते भारत के आम उद्योग पर खतरा मंडराने लगा है. खास कर आंध्र प्रदेश के आम उत्पादक ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं. क्योंकि बढ़ते तनाव के चलते चित्तूर के आम पल्प निर्यातक मुश्किल में आ गए हैं. निर्यातकों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने के कारण नए सौदे और शिपमेंट फिलहाल अनिश्चित समय के लिए रोक दिए गए हैं. इस जलमार्ग के बंद होने से हिंद महासागर और अरब सागर के बीच समुद्री आवाजाही प्रभावित हो गई है. वहीं, एक्सपर्ट का कहना है कि निर्यात प्रभावित होने से घरेरू मार्केट में आम का स्टॉक ज्यादा हो जाएगा. ऐसे में कीमतों में गिरावट आ सकती है.
आंध्र प्रदेश का चित्तूर जिला भारत के सबसे बड़े आम प्रोसेसिंग क्लस्टर में से एक है. यहां से दुनिया के कई देशों में फूड और बेवरेज कंपनियों को आम का पल्प भेजा जाता है. उद्योग से जुड़े लोगों ने कहा कि बंदरगाहों पर फंसे माल के अलावा चित्तूर क्लस्टर की प्रोसेसिंग यूनिटों में करीब 1,000 करोड़ रुपये का आम पल्प भी निर्यात के लिए तैयार रखा है. निर्यातकों को डर है कि अगर शिपमेंट में ज्यादा देरी हुई, तो पल्प की गुणवत्ता खराब हो सकती है और विदेशी खरीदारों के साथ किए गए व्यापारिक समझौते भी प्रभावित हो सकते हैं.
पैकेजिंग सामग्रियों का आयात भी बाधित हो गया
इस संकट का असर सप्लाई चेन पर भी पड़ा है. आम पल्प उद्योग पल्प को सुरक्षित रखने और भेजने के लिए यूरोप से आयात किए जाने वाले लीक-प्रूफ एसेप्टिक बैरल और पैकेजिंग बैग पर निर्भर करता है. लेकिन खाड़ी क्षेत्र के समुद्री मार्ग प्रभावित होने और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण इन पैकेजिंग सामग्रियों का आयात भी बाधित हो गया है.
पल्प की गुणवत्ता खराब हो सकती है
All India Food Processors’ Association के साउथ जोन चेयरमैन के. गोवर्धन बॉबी ने द हिन्दू से कहा कि फरवरी से अप्रैल का समय आम पल्प के निर्यात के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. अगर इस दौरान देरी होती है, तो पल्प की गुणवत्ता खराब हो सकती है या वह खराब भी हो सकता है, जिससे प्रोसेसिंग यूनिटों के निर्यात पर गंभीर असर पड़ेगा. के. गोवर्धन बॉबी ने कहा कि अगर यह संकट लंबे समय तक चलता है, तो इसका असर मई से अगस्त के आम खरीद सीजन पर भी पड़ सकता है. इससे हजारों किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, क्योंकि वे अपनी टोटापुरी किस्म के आम को पल्प फैक्ट्रियों को बेचने पर निर्भर रहते हैं.
रोज लगभग 1,000 कंटेनर आम पल्प भेजे जाते हैं
चित्तूर, तिरुपति और अन्नमय्या जिलों में फैली पल्प इंडस्ट्री हर साल दो बड़े निर्यात सीजन में काम करती है. फरवरी से अप्रैल और अक्टूबर से दिसंबर. मई से सितंबर के बीच का समय ताजा आम, खासकर टोटापुरी किस्म की खरीद और उसे प्रोसेस करके पल्प बनाने के लिए रखा जाता है, जिसे बाद में विदेशों में भेजा जाता है. उद्योग के सूत्रों के अनुसार, निर्यात के चरम समय में इस क्षेत्र से रोज लगभग 1,000 कंटेनर आम पल्प भेजे जाते हैं. ये कंटेनर मुख्य रूप से चेन्नई बंदरगाह और कामराजार बंदरगाह के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाए जाते हैं.
देरी से कारोबार पर बड़ा असर पड़ सकता है
निर्यातकों के अनुसार, इन बंदरगाहों से आम पल्प का माल पहले खाड़ी क्षेत्र के ट्रांजिट हब तक भेजा जाता है. इसके बाद यह सामान लाल सागर और भूमध्यसागर के समुद्री रास्ते से होते हुए यूरोप के बाजारों तक पहुंचता है. निर्यातकों का कहना है कि इसी अवधि में पल्प प्रोसेसिंग यूनिटों और उनके विदेशी एजेंटों के बीच वित्तीय लेन-देन और भुगतान भी सबसे ज्यादा होते हैं, इसलिए किसी भी तरह की देरी से कारोबार पर बड़ा असर पड़ सकता है.