ईरान- इजराइल युद्ध से आलू कारोबार प्रभावित, निर्यात हुआ महंगा.. व्यापारी के साथ किसानों को भी नुकसान
व्यापारियों का कहना है कि आलू के बाजार भाव में तेज गिरावट आ गई है. कई मंडियों में 20 किलो की एक बोरी की कीमत 100 रुपये से भी नीचे चली गई है. जो किसान पहले स्थिर कमाई की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें अब मजबूरी में लगभग 8 रुपये प्रति किलो के भाव से आलू बेचना पड़ रहा है, जबकि सीजन की शुरुआत में कीमत करीब 12 रुपये प्रति किलो थी.
Potato Price Fall: ईरान- इजराइल युद्ध का असर अब गुजरात आलू किसानों की कमाई पर पड़ रहा है. बनासकांठा में आलू की कीमतें तेजी से गिर गई हैं, क्योंकि खाड़ी देशों को होने वाला निर्यात अचानक धीमा पड़ गया है. इससे किसानों और व्यापारियों दोनों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. बनासकांठा हर साल बहुत बड़ी मात्रा में आलू पैदा करता है और इसका बड़ा हिस्सा प्रोसेस्ड प्रोडक्ट के रूप में खाड़ी देशों में भेजा जाता है. लेकिन युद्ध के कारण व्यापारिक रास्ते और कंटेनर मूवमेंट प्रभावित हो गए हैं, जिससे निर्यात लगभग रुक गया है. निर्यात कम होने से स्थानीय बाजार में मांग घट गई है और आलू की कीमतें बहुत नीचे आ गई हैं.
यह संकट किसानों के लिए ऐसे समय में आया है जब इस साल बनासकांठा में आलू का उत्पादन बहुत ज्यादा हुआ था. किसानों को उम्मीद थी कि ज्यादा उत्पादन के कारण निर्यात बढ़ेगा और उन्हें अच्छा दाम मिलेगा. लेकिन निर्यात रुकने से बाजार में आलू की सप्लाई बहुत बढ़ गई और किसानों को मजबूरी में बहुत कम कीमत पर अपनी फसल बेचनी पड़ रही है.
बेमौसम बारिश से फसल और भंडारण को नुकसान
किसानों की परेशानी इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि इस सीजन में उन्हें पहले ही कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था. बेमौसम बारिश से फसल और भंडारण दोनों को नुकसान हुआ था. किसान उम्मीद कर रहे थे कि निर्यात से उन्हें कुछ राहत मिलेगी, लेकिन ईरान- इजराइल युद्ध के कारण वैश्विक व्यापार प्रभावित हो गया और उनकी उम्मीदें टूट गईं. इसके चलते आलू की कीमतें अब रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई हैं.
100 रुपये से कम में बिक रही 20 किलो की बोरी
व्यापारियों का कहना है कि आलू के बाजार भाव में तेज गिरावट आ गई है. कई मंडियों में 20 किलो की एक बोरी की कीमत 100 रुपये से भी नीचे चली गई है. जो किसान पहले स्थिर कमाई की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें अब मजबूरी में लगभग 8 रुपये प्रति किलो के भाव से आलू बेचना पड़ रहा है, जबकि सीजन की शुरुआत में कीमत करीब 12 रुपये प्रति किलो थी. मौजूदा दाम इतने कम हैं कि कई किसानों के लिए उत्पादन और ढुलाई की लागत भी मुश्किल से निकल पा रही है.
इस अचानक आई गिरावट का असर सिर्फ किसानों पर ही नहीं पड़ रहा है, बल्कि बनासकांठा के व्यापारी और कोल्ड स्टोरेज संचालक भी भारी नुकसान की आशंका से जूझ रहे हैं. जिले में कोल्ड स्टोरेज का बड़ा नेटवर्क है, जहां व्यापारी किसानों से आलू खरीदकर महीनों तक स्टोर करते हैं और बाद में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात करके मुनाफा कमाते हैं. लेकिन अब विदेशी शिपमेंट रुकने और वैश्विक लॉजिस्टिक्स बाधित होने से यह पूरा व्यापार चक्र गंभीर संकट में पड़ गया है.
कंटेनर समय पर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं
डीसा कोल्ड स्टोरेज एसोसिएशन के अध्यक्ष फुलचंद कच्छवा ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि अगर युद्ध लंबा चलता है तो संकट और गहरा सकता है. उनका कहना है कि लॉजिस्टिक बाधाओं की वजह से निर्यात व्यवस्था पहले ही बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है. उन्होंने कहा कि अगर युद्ध लंबा चला और जल्द निर्यात शुरू नहीं हुआ, तो इस सीजन में व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा. कच्छवा ने कहा कि इस संघर्ष के कारण शिपिंग कंटेनरों की आवाजाही प्रभावित हुई है और कंटेनर का किराया भी काफी बढ़ गया है. ईरान- इजराइल युद्ध के कारण भारत से निर्यात होने वाले आलू पर बुरा असर पड़ा है. कंटेनर समय पर उपलब्ध नहीं हो रहे हैं और उनका किराया भी काफी महंगा हो गया है.
आलू के दाम और भी ज्यादा गिर गए
कच्छवा ने कहा कि इस समय आलू के बड़े व्यापार पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है. उन्होंने कहा कि हर साल लगभग 25 लाख सैक प्रोसेस्ड आलू करीब 8,000 कंटेनरों के जरिए निर्यात किए जाते हैं. कुल मिलाकर हर साल करीब 35 से 40 लाख सैक आलू विदेशों में भेजे जाते हैं. लेकिन इस साल अब तक इसका केवल लगभग 50 प्रतिशत ही निर्यात हो पाया है. उन्होंने यह भी कहा कि इस साल आलू का उत्पादन काफी बढ़ गया है, जिससे कीमतों पर और दबाव पड़ गया है. कच्छवा के अनुसार, पिछले साल देश में लगभग 7.50 करोड़ सैक आलू का उत्पादन हुआ था. इस साल इसमें करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और उत्पादन लगभग 8 करोड़ सैक तक पहुंच गया है. ज्यादा उत्पादन की वजह से कीमतें पहले से ही दबाव में थीं. ऊपर से युद्ध के कारण निर्यात रुक गया, जिससे आलू के दाम और भी ज्यादा गिर गए.