ICO रिपोर्ट: पश्चिम एशिया के तनाव का असर कॉफी पर, महंगी खाद से उत्पादन पर पड़ सकता है बड़ा असर
दुनियाभर में कॉफी निर्यात की स्थिति थोड़ी कमजोर रही है. फरवरी 2026 में कुल कॉफी निर्यात 5.7 फीसदी घटकर 11.46 मिलियन बैग रह गया. रोबस्टा कॉफी का निर्यात भी 3.7 फीसदी घटकर 4.05 मिलियन बैग रहा. दक्षिण अमेरिका से निर्यात में 21.8 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि कोलंबिया में उत्पादन कम होने के कारण निर्यात तेजी से घटा.
Global coffee production: दुनियाभर में कॉफी की कीमतें और उत्पादन आने वाले समय में प्रभावित हो सकते हैं. इसकी बड़ी वजह है उर्वरक (फर्टिलाइजर) की बढ़ती कीमतें. इंटरनेशनल कॉफी ऑर्गेनाइजेशन (ICO) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण उर्वरकों की कीमतों में तेजी आई है, जिससे कॉफी उगाने वाले किसानों की लागत बढ़ सकती है और इसका असर आने वाले फसल चक्र पर पड़ सकता है.
रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल 2025-26 की कॉफी फसल पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि इस फसल के लिए ज्यादातर किसानों ने पहले ही खाद का इस्तेमाल कर लिया है. लेकिन अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो 2026-27 की फसल पर इसका असर साफ दिखाई दे सकता है.
पश्चिम एशिया तनाव और खाद की कीमतों का कनेक्शन
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, ICO ने बताया कि दुनिया में होने वाले कुल उर्वरक व्यापार का लगभग एक-चौथाई से एक-तिहाई हिस्सा स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज (Hormuz Strait) से होकर गुजरता है. खासकर नाइट्रोजन आधारित खाद (यूरिया) का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से ट्रांसपोर्ट होता है. इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र खुद भी उर्वरक उत्पादन का बड़ा केंद्र है.
ऐसे में जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो शिपिंग रूट प्रभावित होते हैं, जिससे सप्लाई चेन में बाधा आती है और कीमतें बढ़ जाती हैं. इसका सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है.
मार्च में फिर बढ़ीं कॉफी की कीमतें
ICO की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च 2026 में वैश्विक कॉफी कीमतों में फिर से तेजी देखने को मिली. तीन महीने की गिरावट के बाद कीमतों में सुधार हुआ है.
ICO का कंपोजिट इंडिकेटर प्राइस मार्च में 2.3 फीसदी बढ़कर 273.70 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड पहुंच गया. इसकी वजह सिर्फ उत्पादन नहीं बल्कि शिपिंग खर्च और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता भी रही. गौरतलब है कि दुनिया के करीब 25 फीसदी समुद्री तेल व्यापार और लगभग 20 फीसदी एलएनजी (गैस) निर्यात भी इसी हॉरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है.
अलग-अलग किस्मों में अलग ट्रेंड
कॉफी की अलग-अलग किस्मों की कीमतों में भी अलग-अलग रुझान देखने को मिला. मार्च 2026 में कोलंबियन माइल्ड्स में 2 फीसदी और अन्य माइल्ड्स कॉफी में 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई. इनकी औसत कीमत 337.45 और 334.34 अमेरिकी सेंट प्रति पाउंड रही.
ब्राजीलियन नैचुरल्स की कीमत भी 3.9 फीसदी बढ़कर 320.51 सेंट प्रति पाउंड पहुंच गई. हालांकि, रोबस्टा कॉफी की कीमतों में 1.6 फीसदी की गिरावट आई और यह 176.77 सेंट प्रति पाउंड पर आ गई.
लंदन ICE मार्केट में कीमतें 2.5 फीसदी गिरकर 161.91 सेंट प्रति पाउंड रहीं, जबकि न्यूयॉर्क ICE मार्केट में 0.5 फीसदी की हल्की बढ़त दर्ज की गई.
भारत को मिला फायदा
वैश्विक स्तर पर जहां सप्लाई प्रभावित हुई, वहीं भारत को इसका फायदा मिला है. खासकर वियतनाम जैसे देशों में निर्यात में गिरावट के कारण भारत के निर्यात में तेजी आई है.
फरवरी 2026 में भारत का कॉफी निर्यात करीब 38.5 फीसदी बढ़कर 0.79 मिलियन बैग पहुंच गया, जो पिछले साल इसी समय 0.57 मिलियन बैग था. इससे भारत को वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का मौका मिला.
वियतनाम, जो दुनिया का सबसे बड़ा रोबस्टा निर्यातक है, वहां टेट (Tết) त्योहार के कारण निर्यात में कमी आई. इसका सीधा फायदा भारत, ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों को मिला.
वैश्विक निर्यात में गिरावट
दुनियाभर में कॉफी निर्यात की स्थिति थोड़ी कमजोर रही है. फरवरी 2026 में कुल कॉफी निर्यात 5.7 फीसदी घटकर 11.46 मिलियन बैग रह गया. रोबस्टा कॉफी का निर्यात भी 3.7 फीसदी घटकर 4.05 मिलियन बैग रहा. दक्षिण अमेरिका से निर्यात में 21.8 फीसदी की बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि कोलंबिया में उत्पादन कम होने के कारण निर्यात तेजी से घटा.
भारत का रिकॉर्ड प्रदर्शन
इन सबके बीच भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया है. वित्त वर्ष मार्च 2026 तक भारत का कॉफी निर्यात 2.136 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो अब तक का रिकॉर्ड है. इसमें कीमतों में बढ़ोतरी और निर्यात मात्रा में हल्की वृद्धि दोनों का योगदान रहा. भारत ने 4.07 लाख टन से ज्यादा कॉफी निर्यात की, जो देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.
फिलहाल कॉफी बाजार में उतार-चढ़ाव जारी है. एक तरफ कीमतें बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ उत्पादन को लेकर चिंता बनी हुई है. सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर उर्वरकों की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो आने वाले वर्षों में कॉफी उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ेगा. इससे कीमतें और बढ़ सकती हैं.