किसान गन्ना-मक्का से बना रहे दूरी, सोयाबीन का रकबा बढ़ने की उम्मीद, क्या सस्ता होगा खाने वाला तेल?

भारत में सोयाबीन की बुवाई इस साल बढ़ने की संभावना है, क्योंकि ऊंचे दाम और कमजोर मॉनसून का अनुमान है. इससे किसान गन्ना-मक्का की जगह सोयाबीन चुन रहे हैं. उत्पादन बढ़ने पर खाद्य तेल आयात कम हो सकता है और कीमतें स्थिर होंगी. विशेषज्ञों के अनुसार रकबा 10 फीसदी तक बढ़ सकता है और आयात घट सकता है.

Kisan India
नोएडा | Updated On: 16 Jun, 2026 | 03:39 PM

Soybean Farming: देश में इस साल सोयाबीन की बुवाई बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है. इसका मुख्य कारण चार साल में सोयाबीन के ऊंचे दाम और अल नीनो के चलते सामान्य से कम मॉनसून बारिश का अनुमान है. इन हालातों में किसान गन्ना और मक्का जैसी अधिक पानी वाली फसलों की जगह सोयाबीन जैसी तेलहन फसलों की ओर रुख कर रहे हैं.  यानी अगर सोयाबीन के रकबे में बढ़ोतरी होती है, तो खाद्य तेल की कीमतों में गिरावट आ सकती  है.

सोयाबीन भारत की एक प्रमुख खरीफ तेलहन फसल है. अगर इसका उत्पादन बढ़ता है तो देश की खाद्य तेलों के लिए आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, क्योंकि भारत पहले से ही दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक है. इससे पाम ऑयल, सोया ऑयल और सूरजमुखी तेल  के आयात में कमी आने की संभावना है. खास बात यह है कि उत्पादन बढ़ने से घरेलू बाजार में सोयाबीन और सोया मील की कीमतों में स्थिरता भी आ सकती है. इसका सीधा फायदा देश के पोल्ट्री उद्योग को मिलेगा, जो सोया मील का सबसे बड़ा उपभोक्ता है.

किसानों ने सोयाबीन की जगह मक्का की खेती की

महाराष्ट्र ऑयल एक्सट्रैक्शंस के प्रबंध निदेशक मनोज अग्रवाल ने द इकॉनोमिक टाइम्स से कहा कि पिछले साल किसानों ने सोयाबीन की जगह मक्का की खेती की थी. लेकिन इस बार सोयाबीन से बेहतर मुनाफा मिलने के कारण कई किसान फिर से सोयाबीन की खेती की ओर लौट सकते हैं. उनका कहना है कि बेहतर कीमतें किसानों को इस तेलहन फसल की ओर आकर्षित कर रही हैं.

MSP से ज्यादा सोयाबीन का रेट

पिछले महीने सोयाबीन की कीमत बढ़कर 7,587 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई, जो पिछले चार सालों में सबसे ऊंचा स्तर है. यह कीमत सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 5,328 रुपये से काफी अधिक है. वहीं, मक्का की कीमतें 2,400 रुपये प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य से नीचे बनी हुई हैं. भारत में 2025 में किसानों ने करीब 12 मिलियन हेक्टेयर में सोयाबीन की बुवाई की थी, और उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि बेहतर कीमतों के कारण इस साल इसका रकबा (खेती क्षेत्र) 10 फीसदी तक बढ़ सकता है.

11 सालों में सबसे कमजोर मॉनसून रहने की आशंका

किसान आमतौर पर जून महीने में मॉनसून की बारिश शुरू होने के साथ सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई करते हैं. लेकिन इस साल अल नीनो मौसम पैटर्न के कारण मॉनसून पिछले 11 सालों में सबसे कमजोर रहने की आशंका जताई जा रही है. कम बारिश की आशंका के चलते किसानों में सोयाबीन की ओर रुझान बढ़ रहा है, क्योंकि इसे मक्का और गन्ने जैसी फसलों की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है. देश के कई हिस्सों में किसान अब गन्ने जैसी पानी-प्रधान फसलों की जगह सोयाबीन की खेती की योजना बना रहे हैं.

सोयाबीन की खेती का रकबा बढ़ सकता है

सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के कार्यकारी निदेशक डीएन पाठक ने कहा कि इस साल सोयाबीन की खेती का रकबा बढ़ सकता है, लेकिन उत्पादन पूरी तरह मॉनसून की बारिश पर निर्भर करेगा. वहीं, पिछले साल कम उत्पादन के कारण भारत में सोयाबीन आयात बढ़कर रिकॉर्ड 9 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है. सोया ऑयल के आयात में हाल के वर्षों में लगातार बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अगर देश में उत्पादन बढ़ता है तो आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है. ऐसे भारत मुख्य रूप से पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से खरीदता है, जबकि सोया ऑयल और सूरजमुखी तेल का आयात अर्जेंटीना, ब्राजील, रूस और यूक्रेन जैसे देशों से किया जाता है.

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Published: 16 Jun, 2026 | 03:36 PM

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