US डील के बाद DDGS आयात बढ़ा तो हिल सकता है सोयाबीन बाजार, किसानों की बढ़ी चिंता
DDGS के आयात से सिर्फ सोयाबीन ही नहीं, बल्कि मक्का, सोयामील और सरसों खल (रेपसीड मील) की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है. अभी DDGS के आयात पर 15 प्रतिशत शुल्क लगता है, लेकिन इसके बावजूद अगर बड़ी मात्रा में आयात होता है, तो घरेलू बाजार में मांग घट सकती है.
India US trade deal: भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद कृषि बाजार में एक नई चर्चा शुरू हो गई है. इस समझौते के तहत अमेरिका से DDGS यानी ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स के आयात की अनुमति दिए जाने की बात सामने आई है. जैसे ही यह खबर आई, मक्का, सोयाबीन और इससे जुड़े उत्पादों की कीमतों को लेकर किसान और व्यापारी दोनों सतर्क हो गए. बाजार जानकारों का मानना है कि अगर DDGS का आयात ज्यादा मात्रा में हुआ, तो इसका सीधा असर सोयाबीन और सोयामील की कीमतों पर पड़ सकता है.
क्या है DDGS और क्यों है यह अहम?
DDGS दरअसल अनाज से एथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में निकलने वाला एक उप-उत्पाद (By-product)है. इसे मक्का और चावल जैसे फसलों से तैयार किया जाता है. DDGS को पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होने वाले सोयाबीन मील का लगभग विकल्प माना जाता है. इसी वजह से जब DDGS बाजार में सस्ता और आसानी से उपलब्ध होता है, तो पोल्ट्री फीड बनाने वाली कंपनियां सोयाबीन मील की जगह इसका इस्तेमाल करने लगती हैं. यही कारण है कि DDGS के आयात को सोयाबीन बाजार के लिए एक संभावित खतरे के रूप में देखा जा रहा है.
आयात बढ़ा तो किन फसलों पर पड़ेगा असर?
बिजनेस लाइन के मुताबिक, DDGS के आयात से सिर्फ सोयाबीन ही नहीं, बल्कि मक्का, सोयामील और सरसों खल (रेपसीड मील) की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है. अभी DDGS के आयात पर 15 प्रतिशत शुल्क लगता है, लेकिन इसके बावजूद अगर बड़ी मात्रा में आयात होता है, तो घरेलू बाजार में मांग घट सकती है.
पोल्ट्री फीड में सोयामील का क्या महत्व?
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (CLFMA) के चेयरमैन दिव्य कुमार गुलाटी का कहना है कि सोयामील को पूरी तरह से किसी भी दूसरे विकल्प से बदला नहीं जा सकता. उनके मुताबिक, पोल्ट्री सेक्टर में खासकर ब्रॉयलर और लेयर मुर्गियों के लिए सोयामील का पोषण प्रोफाइल सबसे बेहतर होता है. इसलिए मक्का पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन सोयाबीन की कीमतों पर हल्का दबाव जरूर आ सकता है.
पहले से भरपूर है घरेलू DDGS सप्लाई
इग्रेन इंडिया से जुड़े राहुल चौहान का कहना है कि भारतीय बाजार में पहले से ही मक्का आधारित DDGS की आपूर्ति पर्याप्त है. अब चावल से बनने वाला DDGS भी आने लगा है. ऐसे में अगर विदेश से ज्यादा मात्रा में DDGS आयात किया गया, तो यह घरेलू फसलों के दामों को नुकसान पहुंचा सकता है. उनके अनुसार, DDGS का आयात सीमित मात्रा में, यानी 1 से 2 लाख टन तक ही होना चाहिए.
दामों में दिखने लगा असर
डील की घोषणा के बाद ही बाजार में हलचल देखने को मिली है. सोयाबीन के दाम देवास और लातूर जैसे बड़े मंडियों में गिरकर 5,560 से 5,600 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गए हैं, जबकि कुछ दिन पहले यही कीमत 5,750 से 5,900 रुपये के आसपास थी. सरकारी आंकड़ों के अनुसार भी अखिल भारतीय थोक सोयाबीन कीमतें जनवरी के अंत में 5,559 रुपये प्रति क्विंटल थीं, जो अब घटकर करीब 5,488 रुपये पर आ गई हैं.
इसी तरह सरसों के दाम भी नरम हुए हैं. फरवरी की शुरुआत में जो कीमत 6,960 रुपये प्रति क्विंटल थी, वह अब घटकर 6,820 रुपये के आसपास आ गई है. मक्का के दाम भी दिल्ली बाजार में 2,100 रुपये से गिरकर 1,980 रुपये प्रति क्विंटल तक आ गए हैं.
क्या वाकई बड़ा खतरा है?
कुछ व्यापारियों का मानना है कि इतना बड़ा खतरा नहीं है, जितना दिखाया जा रहा है. अप्रैल-मई के लिए अमेरिका से DDGS की कीमत करीब 250 डॉलर प्रति टन बताई जा रही है. शिपिंग और अन्य खर्च जोड़ने के बाद इसकी लैंडिंग कीमत करीब 27,500 रुपये प्रति टन बैठती है. ऐसे में भारतीय सोयामील या घरेलू DDGS पर ज्यादा दबाव पड़ने की संभावना कम बताई जा रही है.
डेयरी सेक्टर पर असर नहीं
गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के प्रबंध निदेशक जयन मेहता का कहना है कि DDGS का इस्तेमाल भारतीय डेयरी फीड में बहुत सीमित है. कीमत या उपलब्धता चाहे जैसी हो, डेयरी सेक्टर में इसका खास रोल नहीं है.