बासमती चावल पर गहराया संकट, बंदरगाहों पर फंसा माल… AIREA ने बताई वजह
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भालोटिया ने किसान इंडिया को बताया कि जो चावल पहले आसानी से खाड़ी देशों तक पहुंच जाता था, अब वह बंदरगाहों पर अटक गया है. इससे न सिर्फ ऑर्डर समय पर पूरे नहीं हो पा रहे, बल्कि भुगतान भी अटक गया है.
देश में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय हालात का असर सीधे किसानों और कृषि व्यापार पर देखने को मिल रहा है. पश्चिम एशिया में चल रहे संकट ने मध्य प्रदेश के बासमती चावल निर्यात को बुरी तरह प्रभावित किया है. ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के महासचिव अजय भालोटिया ने किसान इंडिया को बताया कि हालात ऐसे बन गए हैं कि चावल के कंटेनर बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं और समय पर माल नहीं पहुंच पा रहा है. इसका सीधा असर कीमतों, किसानों की आय और व्यापारियों के कारोबार पर पड़ रहा है.
खाड़ी देशों पर निर्भर है बासमती का बड़ा बाजार
मध्य प्रदेश से बासमती चावल का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में निर्यात होता है. ईरान, इराक, जॉर्डन, यूएई और सऊदी अरब जैसे देश इस चावल के प्रमुख खरीदार हैं. इन देशों में बासमती चावल की काफी मांग रहती है, जिससे राज्य के किसानों और व्यापारियों को अच्छा मुनाफा मिलता है. अजय भालोटिया के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध जैसी स्थिति के कारण इन देशों तक माल पहुंचाना मुश्किल हो गया है. कई जहाज रास्ते में फंस गए हैं या बंदरगाहों पर ही रुके हुए हैं, जिससे सप्लाई चेन पूरी तरह प्रभावित हो गई है.
बंदरगाहों पर फंसा माल, बढ़ा आर्थिक दबाव
अजय भालोटिया ने किसान इंडिया को बताया कि जो चावल पहले आसानी से खाड़ी देशों तक पहुंच जाता था, अब वह बंदरगाहों पर अटक गया है. इससे न सिर्फ ऑर्डर समय पर पूरे नहीं हो पा रहे, बल्कि भुगतान भी अटक गया है. इससे उद्योगों की कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) पर दबाव बढ़ गया है. व्यापारियों को पैसा नहीं मिल रहा, लेकिन खर्च लगातार जारी है. इसके साथ ही वही कहते हैं कि हालात इरान- इजराइल युद्ध अगर बंद नहीं होता तो इससे चावल व्यापार को भारी नुकसान हो सकता है.
कंटेनर की कमी और बढ़ी ढुलाई लागत
इस संकट ने एक और बड़ी समस्या खड़ी कर दी है, वह है कंटेनरों की कमी. माल भेजने के लिए पर्याप्त कंटेनर उपलब्ध नहीं हैं, जिससे निर्यात और धीमा हो गया है. इसके अलावा समुद्री ढुलाई (फ्रेट) की लागत भी बढ़ गई है. यानी जो माल पहले कम खर्च में विदेश पहुंचता था, अब उसे भेजने में ज्यादा पैसा लग रहा है. इससे निर्यातकों का मुनाफा घट रहा है.
गिर गई बासमती चावल की कीमत
इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा असर कीमतों पर पड़ा है. पुसा बासमती चावल की कीमत में 300 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक की गिरावट आई है. कीमत कम होने से किसानों को उनकी फसल का सही दाम नहीं मिल पा रहा है. कीमत गिरने के कारण मंडियों में धान की आवक भी कम हो गई है. किसान अपनी उपज बेचने में हिचक रहे हैं, जिससे बाजार में अस्थिरता बढ़ रही है.
किसानों पर बढ़ा दबाव
इस संकट का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है. जब निर्यात रुकता है और कीमत गिरती है, तो किसान की आय सीधे प्रभावित होती है. खासकर छोटे और मध्यम किसान, जो पहले ही सीमित संसाधनों के साथ खेती करते हैं, उन्हें ज्यादा नुकसान झेलना पड़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो खेती से जुड़ी पूरी सप्लाई चेन कमजोर हो सकती है.
किन इलाकों में होती है ज्यादा पैदावार
मध्य प्रदेश के नर्मदा घाटी क्षेत्र में बासमती चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है. रायसेन, सीहोर, विदिशा और नरमदापुरम जैसे जिले इसके प्रमुख केंद्र हैं. यहां उगने वाला पुसा बासमती चावल गुणवत्ता के लिए जाना जाता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी अच्छी मांग है.
इसके अलावा बालाघाट जिले में उबला हुआ नॉन-बासमती चावल भी बड़ी मात्रा में तैयार होता है, जो पश्चिम एशिया और अफ्रीका के देशों में निर्यात किया जाता है. पहले यहां से रोजाना करीब 500 टन चावल का निर्यात होता था, लेकिन अब यह प्रभावित हो गया है.
वहीं मौजूदा हालात यह दिखाते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संकट का असर सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर किसानों की आय और देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ता है. अगर पश्चिम एशिया में स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो बासमती चावल का निर्यात और प्रभावित हो सकता है. इससे कीमतों में और गिरावट आ सकती है और किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.