क्या है कसावा, पंजाब के विधायक ने शुरू की इसकी खेती.. 1500 रुपये क्विंटल है MSP
यह फसल रेतीली, दोमट और जलोढ़ मिट्टी में अच्छी होती है, खासकर रेतीली मिट्टी में बेहतर परिणाम मिलते हैं. इसमें बड़े कीट या रोग की समस्या नहीं होती और खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट जैसे हर्बिसाइड का उपयोग किया जा सकता है. शाहकोट से कांग्रेस विधायक हरदेव सिंह लड्डी शेरोवालिया के खेत में कसावा की खेती की गई है.
Cassava Farming: लोगों को लगता है कि पंजाब में किसान केवल गेहूं और धान की ही खेती करते हैं, लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां पर किसान फल और कसावा जैसी पारंपरिक फसल भी उगा रहे हैं. खास बात यह है कि यहां के नेता भी खेती में दिलचस्पी ले रहे हैं. ऐसे ही एक नेता हैं शाहकोट से कांग्रेस विधायक हरदेव सिंह लड्डी शेरोवालिया, जिनके खेत में कसावा की खेती की गई है और उसकी कटाई भी शुरू हो गई है.
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, जालंधर जिले के मलसियां गांव में विधायक के खेत में कसावा की खेती की गई है. हालांकि, ऐसे कसावा फसल पंजाब में बहुत कम उगाई जाती है, लेकिन राज्य में फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है. ऐसे में पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक राणा गुरजीत सिंह और उनके बेटे की पहल पर मलसियां गांव में प्रयोग के तौर पर शाहकोट विधायक हरदेव सिंह लड्डी शेरोवालिया के खेत में कसावा उगाया गया.
पंजाब की जलवायु कसावा के लिए अनुकूल
कसावा एक ग्लूटेन-फ्री और जलवायु सहनशील कंद फसल है, जो केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है. मूल रूप से यह दक्षिण अमेरिका की फसल है और बाद में अफ्रीका व भारत के दक्षिणी हिस्सों में फैली. आईसीएआर- सेंट्रल ट्यूबर क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट, भुवनेश्वर के क्षेत्रीय केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. एम. नेदुचेझियन का कहना है कि उत्तर भारत में कसावा लाने की कोशिश वे 15 साल से कर रहे थे. उन्होंने कहा कि अगर इसे मार्च के पहले हफ्ते में, करीब 28 डिग्री तापमान पर बोया जाए तो पंजाब की जलवायु इसके लिए अनुकूल है. यहां यह लगभग 10 महीने की फसल बन जाती है और दिसंबर से फरवरी के बीच कटाई संभव है.
बहुत कम होती है पानी की जरूरत
डॉ. नेदुचेझियन ने कहा कि कसावा को धान की तुलना में लगभग दस गुना कम पानी की जरूरत होती है, इसलिए पंजाब के जल संकट के बीच यह एक अच्छा विकल्प बन सकता है. शुरुआती दो महीने सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन बाद में फसल को सिर्फ मिट्टी की नमी ही काफी होती है. यह फसल सूखे हालात भी सहन कर सकती है. पकने के बाद भी इसके कंद मिट्टी में बिना सड़े सुरक्षित रहते हैं, जिससे किसान बाजार के अच्छे दाम मिलने तक कटाई टाल सकते हैं.
उन्होंने कहा कि कसावा की खेती बीज से नहीं, बल्कि 20 सेंटीमीटर लंबे तने के कटिंग से की जाती है. इसे मेड़ और नाली (रिज-फरो) पद्धति से बोया जाता है. पंक्ति और पौधों के बीच करीब 3 फीट की दूरी रखी जाती है, जिससे एक एकड़ में लगभग 5,000 पौधे लगाए जा सकते हैं. तने को करीब 5 सेंटीमीटर गहराई तक मिट्टी में लगाया जाता है और 15 सेंटीमीटर हिस्सा ऊपर रहता है. पहले, दूसरे और तीसरे महीने में दोबारा मेड़ चढ़ाई जाती है. तीन महीने बाद पौधे पूरी तरह फैल जाते हैं और खेत में जाना मुश्किल हो जाता है.
इस तरह की मिट्टी में होती है कसावा की खेती
यह फसल रेतीली, दोमट और जलोढ़ मिट्टी में अच्छी होती है, खासकर रेतीली मिट्टी में बेहतर परिणाम मिलते हैं. इसमें बड़े कीट या रोग की समस्या नहीं होती और खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट जैसे हर्बिसाइड का उपयोग किया जा सकता है. इस प्रयोग में प्रति एकड़ दो बोरी डीएपी और ढाई बोरी यूरिया डाली गई. डॉ. नेदुचेझियन ने कहा कि दुनिया में अभी सिर्फ चार बड़ी जलवायु-सहनशील फसलें मानी जाती हैं, जिनमें कसावा सबसे ऊपर है. इसके अलावा मक्का, अमरनाथ और याम (जिमीकंद) शामिल हैं. तीन एकड़ के इस प्रयोग में हरे वजन के हिसाब से करीब 250 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन हुआ, जो सूखने के बाद लगभग 175 क्विंटल प्रति एकड़ रहा. इसकी लागत करीब 20 से 25 हजार रुपये प्रति एकड़ बताई गई है.
1,500 रुपये प्रति क्विंटल है MSP
राणा गुरजीत सिंह ने किसानों से इस फसल को अपनाने की अपील की और 1,500 रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम सुनिश्चित खरीद मूल्य देने की घोषणा की. उन्होंने कहा कि कटाई के 12 घंटे के भीतर प्रोसेसिंग की व्यवस्था की जाएगी, क्योंकि कटाई के बाद कसावा लगभग 48 घंटे तक ही सुरक्षित रहता है और जल्दी प्रोसेस न करने पर उसमें खमीर उठ सकता है. उनके अनुसार, इन गणनाओं के आधार पर किसान प्रति एकड़ 2.5 से 2.6 लाख रुपये तक कमा सकते हैं, जो गेहूं और धान की संयुक्त कमाई (करीब 90 हजार रुपये प्रति एकड़) से कहीं ज्यादा है.