सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद घटा कपास का रकबा, 2 जून तक 70 हजार हेक्टेयर में बुवाई

पंजाब में कपास की बुवाई इस साल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है. 1.25 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले अब तक केवल 70 हजार हेक्टेयर में ही बुवाई हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार नुकसान के कारण किसान कपास से दूरी बना रहे हैं, जिससे धान का रकबा और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है.

नोएडा | Published: 6 Jun, 2026 | 12:22 PM

Cotton Cultivation: पंजाब सरकार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और धान जैसी अधिक पानी वाली फसलों पर किसानों की निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है. हालांकि, इस बार कपास की खेती को लेकर सरकार को बड़ा झटका लगा है. राज्य में कपास की बुवाई अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026-27 खरीफ सीजन के लिए 1.25 लाख हेक्टेयर में कपास की बुवाई का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 2 जून तक केवल 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ही कपास बोई जा सकी है. यह तय लक्ष्य का महज 56 प्रतिशत है.

जिलावार आंकड़ों में फाजिल्का कपास की खेती में सबसे आगे है, जहां करीब 40 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई  हुई है. इसके बाद बठिंडा, मानसा और मुक्तसर जिले हैं, जहां प्रत्येक जिले में लगभग 10 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती की गई है. वहीं, कपास की बुवाई में आई इस कमी को राज्य सरकार की फसल विविधीकरण योजना के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों का कपास की खेती से दूरी बनाना भविष्य में कृषि नीति के लिए चुनौती बन सकता है.

पंजीकरण की अंतिम तिथि 15 जून

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कपास की बुवाई का अंतिम आंकड़ा 15 जून के बाद ही साफ हो पाएगा. दरअसल, किसानों के लिए कपास के बीज पर 33 फीसदी सब्सिडी पाने के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 15 जून तय की गई है. हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि बुवाई क्षेत्र में बहुत अधिक बढ़ोतरी की संभावना नहीं है, क्योंकि पिछले कई वर्षों में लगातार नुकसान झेलने के बाद बड़ी संख्या में किसान कपास की खेती से दूरी बनाए हुए हैं.

जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा

पंजाब कृषि विभाग में कपास के उपनिदेशक चरणजीत सिंह ने ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ से कहा कि कपास की खेती  का क्षेत्र घटने से राज्य के जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा. उनका कहना है कि कपास की जगह अधिक किसान धान की खेती की ओर रुख करेंगे, जबकि धान की फसल को काफी ज्यादा पानी की जरूरत होती है. उन्होंने बताया कि यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब राज्य सरकार भूजल संरक्षण के लिए धान के रकबे को कम करने और किसानों को दूसरी फसलों की ओर प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है. ऐसे में कपास की खेती में कमी सरकार के प्रयासों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है.

कपास की खेती से दूरी

कृषि अधिकारियों के अनुसार, किसानों के कपास की खेती से दूर होने की सबसे बड़ी वजह पिछले पांच वर्षों से लगातार मिल रहा कम मुनाफा है. खराब मौसम और कीटों के हमलों के कारण किसानों को बार-बार नुकसान उठाना पड़ा, जिससे उनका भरोसा इस फसल से कम हो गया है. अधिकारियों ने बताया कि वर्ष 2025 में राज्य सरकार ने कीट प्रकोप को रोकने के लिए कई कदम उठाए थे. इसके तहत कपास की फसलों की निगरानी और कीट नियंत्रण रणनीति को बेहतर बनाने के लिए अंतरराज्यीय समन्वय समिति भी बनाई गई थी. इन प्रयासों के चलते पिछले साल कपास की फसल में कोई बड़ा कीट हमला नहीं हुआ था और अच्छी पैदावार की उम्मीद जताई जा रही थी.

बेमौसम बारिश ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरा

हालांकि, अक्टूबर में कपास की तुड़ाई के दौरान हुई बेमौसम बारिश  ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. बारिश से खेतों में खड़ी फसल को भारी नुकसान पहुंचा, जिससे किसानों को बड़ा आर्थिक झटका लगा. अधिकारियों का कहना है कि लगातार नुकसान और अनिश्चितता के कारण अब कई किसान दोबारा कपास की खेती में निवेश करने से बच रहे हैं. पंजाब में कपास की खेती लगातार संकट में है. वर्ष 2025 में राज्य में करीब 1.19 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की बुवाई हुई थी, लेकिन बेमौसम बारिश के कारण फसल को भारी नुकसान हुआ.. इससे उत्पादन घटा और किसानों की आय पर भी बड़ा असर पड़ा.

पंजाब का कपास क्षेत्र कई समस्याओं से जूझ रहा

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्ष 2021 से ही पंजाब का कपास क्षेत्र कई समस्याओं से जूझ रहा है. सफेद मक्खी (व्हाइटफ्लाई) और गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) के लगातार हमले, नहरों से पानी की अनियमित आपूर्ति और मौसम की मार ने किसानों को परेशान किया है. यही वजह है कि पिछले एक दशक में कपास की खेती का रकबा तेजी से घटा है. आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2016 से पहले राज्य में 3 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में कपास की खेती होती थी. वहीं, 2011-12 में कपास का रकबा 5.16 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया था, जो पिछले 15 वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर था. लेकिन इसके बाद लगातार चुनौतियों के चलते किसानों का रुझान इस फसल से कम होता गया. फाजिल्का, बठिंडा, मानसा और मुक्तसर जिले लंबे समय से पंजाब के कपास उत्पादन का मुख्य केंद्र रहे हैं. ये चारों जिले राज्य के कुल कपास उत्पादन में करीब 98 प्रतिशत योगदान देते हैं. हालांकि, खेती का क्षेत्र घटने से इन इलाकों की कपास आधारित अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है.

Topics: