बनना है अमीर तो करें ‘लाल सोना’ की खेती, 600 रुपये प्रति ग्राम रेट.. पूरी दुनिया में है मांग
कश्मीरी केसर दुनिया का सबसे महंगा और सुगंधित मसाला है, जिसे ‘लाल सोना’ कहा जाता है. इसकी खेती जम्मू-कश्मीर के पंपोर सहित कई क्षेत्रों में होती है और यह पूरी तरह पारंपरिक व मेहनत वाली प्रक्रिया है. कश्मीरी केसर की खेती बीज से नहीं, बल्कि कंद (Bulbs) से की जाती है.
Saffron Cultivation: जम्मू-कश्मीर के नाम आते ही लोगों के जेहन में सबसे पहले सेब का नाम उभरकर सामने आता है. लोगों को लगता है कि जम्मू-कश्मीर में केवल सेब की ही खेती होती है, लेकिन ऐसी बात नहीं है. यहां पर किसान बड़े स्तर पर केसर भी उगाते हैं. यहां पर उगाए गए केसर की सप्लाई केवल देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में होती है. कश्मीरी केसर दुनिया का सबसे अच्छा और सबसे महंगा मसाला माना जाता है. यह अपनी खास खुशबू, गहरे लाल रंग और सेहत के लिए फायदेमंद गुणों की वजह से पूरी दुनिया में मशहूर है. यह केसर कश्मीर के पंपोर इलाके में उगाया जाता है और इसे प्राकृतिक रूप से जैविक फसल माना जाता है.
कश्मीरी केसर सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है. इसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो त्वचा की चमक बढ़ाने, सर्दी-जुकाम में राहत देने, पाचन सुधारने और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने में मदद करते हैं. ऐसे कश्मीरी केसर में क्रोसिन नामक तत्व की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जिससे इसे गहरा लाल रंग और शहद जैसी खास खुशबू मिलती है. इसकी थोड़ी सी मात्रा भी दूध या खाने में अच्छा रंग और स्वाद जोड़ देती है. यह केसर कश्मीर में पारंपरिक तरीकों से उगाया जाता है. इसमें रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया जाता, इसलिए इसे प्राकृतिक रूप से जैविक (ऑर्गेनिक) माना जाता है.
खेती के लिए रेतीली-दोमट मिट्टी ज्यादा उपयुक्त
कश्मीरी केसर दुनिया का सबसे अच्छा और सबसे महंगा मसाला माना जाता है, जिसे ‘लाल सोना’ भी कहा जाता है. इसकी खेती मुख्य रूप से जम्मू-कश्मीर के पंपोर, श्रीनगर, बडगाम और पुलवामा जैसे क्षेत्रों में होती है. गुणवत्ता और खुशबू के मामले में इसे दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता है. यह केसर खास तरह की करेवा मिट्टी में उगाया जाता है, जो उपजाऊ और रेतीली-दोमट होती है तथा इसमें आयरन और अन्य खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. इसे उगाने के लिए ठंडा मौसम सबसे अच्छा माना जाता है, जिसमें तापमान लगभग 5 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है. खास बात यह है कि कश्मीर के केसर बहुत महंगा बिकता है. केवल 1 ग्राम का वजन 300 से 600 रुपये के बीच होती है.
कंद से होती है कश्मीरी केसर की खेती
कश्मीरी केसर की खेती बीज से नहीं, बल्कि कंद (Bulbs) से की जाती है. इन कंदों को अगस्त और सितंबर के महीने में खेतों में लगाया जाता है. इसके बाद अक्टूबर-नवंबर में पौधों पर सुंदर बैंगनी रंग के फूल खिलते हैं. इन फूलों की खास बात यह है कि केसर इन्हीं के अंदर होता है. सुबह सूरज निकलने से पहले फूलों को तोड़ा जाता है और फिर हाथों से सावधानीपूर्वक उनके अंदर से लाल रंग के बारीक रेशे (केसर के धागे) निकाले जाते हैं. ऐसे केसर की खेती बहुत मेहनत वाला काम है. लगभग 1.5 लाख फूलों से सिर्फ 1 किलो सूखा केसर मिलता है, इसलिए यह बहुत महंगा होता है. कश्मीर में करीब 3200 से 3700 हेक्टेयर जमीन पर केसर की खेती की जाती है. उत्पादन में कमी और मौसम की समस्याओं को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय सैफरन मिशन शुरू किया है, ताकि केसर की खेती को बढ़ावा दिया जा सके और किसानों की मदद हो सके.
कैसे करें असली केसर की पहचान
कश्मीरी केसर के धागे आगे से मोटे और पीछे से पतले होते हैं, यानी ये शंकु (cone) जैसी आकृति में होते हैं. असली कश्मीरी केसर की पहचान यह है कि जब इसे गर्म पानी या दूध में डाला जाता है, तो यह धीरे-धीरे अपना रंग छोड़ता है और खुद भी लाल बना रहता है. वहीं मिलावटी केसर जल्दी रंग छोड़ देता है. अब कश्मीर के अलावा देश के अन्य ठंडे इलाकों जैसे हिमाचल प्रदेश और बिहार में भी नियंत्रित वातावरण में केसर की खेती के सफल प्रयोग किए जा रहे हैं. केसर के फूलों से रेशे निकालने और उनकी तुड़ाई की यह पारंपरिक प्रक्रिया देखने लायक होती है.
केसर उत्पादन और निर्यात
2024-25 में कश्मीर में लगभग 19.58 मीट्रिक टन केसर का उत्पादन हुआ है. इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कश्मीरी केसर का निर्यात भी तेजी से बढ़ा है, जिससे किसानों की आय में सुधार हुआ है. यह केसर अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व के कई देशों में भेजा जाता है. रिपोर्ट के अनुसार, इसके निर्यात से लगभग 486 करोड़ रुपये की कमाई हुई है. कश्मीरी केसर को साल 2020 में जीआई टैग (GI Tag) मिला है, जो इसकी असली पहचान और शुद्धता की पुष्टि करता है.
केसर की खेती में कई चुनौतियां
कश्मीरी केसर की खेती कई चुनौतियों से जुड़ी हुई है. यह पूरी तरह मौसम पर निर्भर होती है, इसलिए पानी और सिंचाई की समस्या अक्सर रहती है. हाल ही में किसानों ने पुराने खराब स्प्रिंकलर सिस्टम की जगह सोलर पंप लगाने की मांग की है, ताकि सिंचाई बेहतर हो सके और पैदावार बढ़े. इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और खेती की बढ़ती लागत भी बड़ी समस्या है. इन कारणों की वजह से केसर का उत्पादन स्थिर रखना किसानों के लिए मुश्किल हो रहा है.