नीलगिरी में चाय की खेती पर सूखे की मार! 60 फीसदी तक घटा उत्पादन, किसानों की बढ़ी चिंता
Nilgiri Tea: तमिलनाडु के नीलगिरी में बारिश की कमी और अल-नीनो के असर से चाय की खेती बुरी तरह प्रभावित हुई है. नई कोपलें मुरझाने से फैक्ट्रियों में हरी पत्तियों की आवक घट गई है और उत्पादन में 20-25 फीसदी तक गिरावट आई है. कुछ बागानों में प्रति एकड़ उत्पादन 60 फीसदी तक कम हुआ है.
Nilgiri Tea Production: तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में इस साल चाय की खेती मुश्किल दौर से गुजर रही है. अल-नीनो के असर और बारिश की कमी ने चाय के पौधों को बुरी तरह प्रभावित किया है. लंबे समय से सूखा रहने के कारण पौधों पर निकलने वाली नई हरी कोपलें मुरझा रही हैं. इसका सीधा असर चाय फैक्ट्रियों तक पहुंचने वाली हरी पत्तियों पर पड़ा है. पत्तियों की सप्लाई कम होने से चाय का उत्पादन घट रहा है और हजारों किसानों व मजदूरों की कमाई पर भी असर पड़ने की चिंता बढ़ गई है.
नीलगिरी में चाय की खेती क्यों है इतनी अहम?
नीलगिरी देश के प्रमुख चाय उत्पादक इलाकों में शामिल है. जिले में 65 हजार से ज्यादा छोटे और सीमांत किसान चाय की खेती से जुड़े हुए हैं. यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था में चाय का बड़ा योगदान है. किसान से लेकर फैक्ट्री में काम करने वाले मजदूरों तक बड़ी संख्या में लोगों की रोजी-रोटी इसी उद्योग पर टिकी है. इस समय चाय का दूसरा सीजन चल रहा है. इस दौरान पौधों पर नई पत्तियां और कोपलें निकलती हैं, जिससे उत्पादन बढ़ने की उम्मीद रहती है. लेकिन इस बार मौसम ने किसानों की मुश्किल बढ़ा दी है.
फैक्ट्रियों में हरी पत्तियों की आवक घटी
ऊटी, कूनूर, कोटागिरी और मंजूर जैसे चाय उत्पादक इलाकों में फैक्ट्रियों को पहले के मुकाबले काफी कम हरी पत्तियां मिल रही हैं. कुछ फैक्ट्रियों में जहां रोज करीब 4,000 किलो हरी पत्तियां आती थीं, वहां अब सिर्फ 600 से 800 किलो तक ही सप्लाई पहुंच रही है. पत्तियों की कमी का सीधा असर चाय पाउडर के उत्पादन पर पड़ा है. कई फैक्ट्रियों में इस साल उत्पादन 20 से 25 फीसदी तक कम हुआ है. अगर बारिश की स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो नुकसान और बढ़ने की आशंका है.
पांच साल में बारिश 31 फीसदी तक घटी
UPASI चाय अनुसंधान संस्थान की स्टडी के अनुसार, नीलगिरी में पिछले पांच साल में बारिश करीब 31 फीसदी कम हुई है. 2021 में यहां औसतन 173.3 सेंटीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, जो 2025 में घटकर 119.4 सेंटीमीटर रह गई. बारिश की कमी का असर चाय की पैदावार पर भी साफ दिखाई दिया है. 2023 में प्रति हेक्टेयर करीब 2,315 किलो चाय का उत्पादन हुआ था, जो 2025 में घटकर 2,042 किलो रह गया. यानी दो साल में करीब 11.8 फीसदी की गिरावट आई. इस साल हालात और गंभीर हैं. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान सामान्य तौर पर करीब 874 मिलीमीटर बारिश होती है, लेकिन अब तक केवल 283 मिलीमीटर बारिश हुई है. इससे बारिश में करीब 55 फीसदी की कमी बताई जा रही है.
एक एकड़ से उत्पादन 500 से घटकर 200 किलो
सूखे का असर खेतों में भी साफ नजर आ रहा है. जिन बागानों से पहले एक एकड़ में हर महीने करीब 500 किलो हरी चाय की पत्तियां मिलती थीं, वहां अब उत्पादन लगभग 200 किलो रह गया है. यानी करीब 60 फीसदी की गिरावट. फिलहाल कुल चाय उत्पादन में 10 से 20 फीसदी की कमी आई है. अगर सूखा आगे भी जारी रहा तो उत्पादन में 50 फीसदी तक की गिरावट का खतरा पैदा हो सकता है.
पानी खरीदकर खेती कर रहे किसान
बारिश नहीं होने के कारण कई किसानों को चाय के पौधों और दूसरी फसलों के लिए पानी तक खरीदना पड़ रहा है. चाय के अलावा गाजर और प्याज जैसी फसलें उगाने वाले किसान भी परेशान हैं. चाय फैक्ट्री से जुड़े अधिकारी किशोर ने तमिलनाडु सरकार से छोटे चाय उत्पादकों को मदद देने की मांग की है. उनका कहना है कि जिन किसानों की आमदनी पूरी तरह चाय पर निर्भर है, उन्हें इस मुश्किल समय में सरकारी सहायता की जरूरत है.
चाय की कीमत और निर्यात पर भी पड़ सकता है असर
हरी पत्तियों की सप्लाई कम होने से आने वाले समय में चाय पाउडर का उत्पादन और बाजार की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं. इसका असर भारत के चाय निर्यात पर भी पड़ने की आशंका है. विशेषज्ञों का कहना है कि परेशानी सिर्फ कम बारिश की नहीं है. बारिश के बीच लंबे अंतराल से भी चाय के पौधों को नुकसान पहुंच रहा है. कम समय में तेज बारिश और फिर लंबे सूखे के कारण नई कोपलें ठीक से विकसित नहीं हो पातीं. इसके साथ ही नीलगिरी में तापमान करीब 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की बात भी सामने आई है. ऐसे में मौसम में बदलाव चाय की खेती के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.