पैराक्वाट के बाद कार्बोसल्फान कीटनाशक पर सरकार का शिकंजा, इस्तेमाल पर लगा सकती है रोक
केंद्र सरकार धान, कपास और बागवानी फसलों में इस्तेमाल होने वाले कार्बोसल्फान पर रोक लगाने पर विचार कर रही है. इससे पहले सरकार ने पैराक्वाट पर प्रतिबंध का प्रस्ताव दिया था. फिलहाल FMC India ‘Marshal’ ब्रांड के तहत कार्बोसल्फान बेचती है. वहीं, FMC ने भारत का अपना फसल सुरक्षा कारोबार करीब 2,200 करोड़ रुपये में Crystal Crop Protection को बेचने का समझौता किया है.
केंद्र सरकार धान, कपास और बागवानी फसलों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक कार्बोसल्फान (Carbosulfan) के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी कर रही है. इस पर अंतिम फैसला इस महीने के अंत तक आने की उम्मीद है. इससे पहले जुलाई में सरकार ने खरपतवारनाशक पैराक्वाट (Paraquat) के इस्तेमाल पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा था. सरकार के इन कदमों का मकसद खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाना और खेती में सुरक्षित तरीकों को बढ़ावा देना है.
फिलहाल FMC India ‘Marshal’ ब्रांड नाम से कार्बोसल्फान बेचती है. इसमें 25 फीसदी कार्बोसल्फान (इमल्सीफायबल कॉन्सन्ट्रेट) होता है. कंपनी के मुताबिक, यह एक व्यापक प्रभाव वाला कीटनाशक है, जो कई फसलों में चूसक और पत्ती-कुतरने वाले कीटों को नियंत्रित करने में मदद करता है. यह कीटों पर संपर्क और उनके शरीर में जाने, दोनों तरीकों से असर करता है.
कीटों को नियंत्रित करने में मदद करता है
एफएमसी इंडिया के मुताबिक, मार्शल कीटनाशक किसानों के बीच लंबे समय से इस्तेमाल किया जाने वाला ब्रांड है. कंपनी के अनुसार, यह कपास, धान और सब्जियों में चूसक और पत्तियां खाने वाले कई तरह के कीटों को नियंत्रित करने में मदद करता है. अलग तरीके से असर करने के कारण इसे खासकर सब्जियों में कीटनाशकों की अदला-बदली के दौरान इस्तेमाल किया जाता है. इस बीच, एफएमसी कॉर्पोरेशन ने मई में भारत में अपने कमर्शियल कारोबार को क्रिस्टल फसल संरक्षण को बेचने के लिए समझौता किया था. यह सौदाकरीब 2,200 करोड़ रुपये का है. इसके तहत क्रिस्टल फसल संरक्षण को भारत में FMC के फसल सुरक्षा कारोबार के साथ उसके ब्रांड्स के लाइसेंस भी मिलेंगे.
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Crystal को FMC के उत्पादों की सप्लाई में मिलेगी प्राथमिकता
समझौते के तहत क्रिस्टल को FMC के कुछ सक्रिय रसायनों और तैयार उत्पादों की सप्लाई के लिए प्राथमिकता भी मिलेगी. इसके अलावा, भारत में FMC के नए फसल सुरक्षा उत्पादों की पाइपलाइन तक भी क्रिस्टल की प्राथमिक पहुंच होगी. कृषि मंत्रालय ने कार्बोसल्फान को ‘अत्यधिक जहरीले’ कीटनाशकों की श्रेणी में रखा है. कहा जा रहा है कि इसे प्रतिबंधित श्रेणी में शामिल करने की प्रक्रिया केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति (CIB&RC) की सिफारिश के बाद शुरू की गई है.
विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद केंद्र को भेजी गई सिफारिशें
CIB&RC की पंजीकरण समिति ने 29 जून को हुई बैठक में पैराक्वाट डाइक्लोराइड और कार्बोसल्फान पर विशेषज्ञ समीक्षा समिति की रिपोर्ट पर चर्चा की. बैठक में कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27(2) के तहत दोनों कीटनाशकों से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से विचार किया गया. बैठक के बाद समिति ने अपनी सिफारिशें केंद्र सरकार को भेजने का फैसला किया. अब सरकार इन सिफारिशों पर विचार करने के बाद अंतिम फैसला लेगी. समिति ने कहा है कि सरकार के अंतिम निर्णय को उसके बाद लागू किया जाएगा.
सरकार ने 14 जुलाई को पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर पूरी तरह रोक लगाने का ड्राफ्ट जारी किया था. सरकार ने इंसानों और जानवरों के लिए इसकी गंभीर विषाक्तता को प्रतिबंध का आधार बताया है. प्रस्ताव के तहत पैराक्वाट के उत्पादन, आयात, बिक्री और वितरण पर रोक लगाने की बात कही गई है. इस पर हितधारकों से 12 अगस्त तक सुझाव मांगे गए हैं.
इस्तेमाल पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जा सकती हैं
वहीं, कार्बोसल्फान को प्रतिबंधित श्रेणी में रखने के बाद किसानों के इस्तेमाल पर कई तरह की पाबंदियां लगाई जा सकती हैं. फिलहाल किसान इसे आसानी से खरीदकर इस्तेमाल करते हैं. इसका पेटेंट खत्म हो चुका है, लेकिन भारत में इसका उत्पादन FMC या उसकी लाइसेंसधारी कंपनी करती है. वहीं, उद्योग का कहना है कि पैराक्वाट की तुलना में कार्बोसल्फान की विषाक्तता या स्वास्थ्य जोखिम को लेकर उतनी चिंता नहीं है. हालांकि, इसे रॉटरडैम कन्वेंशन में शामिल किए जाने के बाद मामला विशेषज्ञों के पास भेजा गया. इस समझौते के तहत सदस्य देशों को किसी सूचीबद्ध रसायन का फॉर्मुलेशन आयात करने से पहले इसकी सूचना देनी होती है.
EU के सख्त MRL से कृषि निर्यात पर पड़ सकता है असर
वहीं, जीरा जैसी फसलों पर काम करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कार्बोसल्फान का असर भारत के कृषि निर्यात पर पड़ सकता है. यूरोपीय संघ में कार्बोसल्फान के लिए अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) सिर्फ 0.01 mg/kg है. दूसरी ओर, भारत के खाद्य नियामक FSSAI ने अलग-अलग फसलों के लिए अलग MRL तय किया है. चावल में यह 0.2 mg/kg, मिर्च में 2 mg/kg और सूखी मिर्च में 20 mg/kg है. अन्य कई फसलों के लिए FSSAI ने कोई सीमा तय नहीं की है.