नगली और धान छोड़ अब स्ट्रॉबेरी उगा रहे किसान, आदिवासी जिले में प्रति हेक्टेयर 8 लाख तक हो रहा मुनाफा

पहले डांग की स्ट्रॉबेरी सिर्फ स्थानीय बाजारों जैसे सापुतारा और अहवा तक सीमित थी. लेकिन अब बेहतर सड़क और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के कारण यहां की स्ट्रॉबेरी अहमदाबाद, सूरत और भरूच जैसे बड़े शहरों तक पहुंच रही है. इससे किसानों को अच्छे दाम मिलने लगे हैं. साथ ही पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज की जानकारी बढ़ने से फसल खराब होने का नुकसान भी कम हुआ है.

नई दिल्ली | Updated On: 21 May, 2026 | 07:38 AM

Gujarat strawberry farming: गुजरात का आदिवासी बहुल डांग जिला अब अपनी पारंपरिक खेती के साथ-साथ स्ट्रॉबेरी उत्पादन के लिए भी तेजी से पहचान बना रहा है. कभी यहां के किसान नगली, धान, उड़द और वरई जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहते थे, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. पिछले तीन वर्षों में डांग में स्ट्रॉबेरी की खेती और उत्पादन में करीब 65 प्रतिशत की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

राज्य सरकार की योजनाओं, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, बेहतर बाजार व्यवस्था और आधुनिक तकनीकों की वजह से अब किसान स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसलों की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. इससे किसानों की आमदनी में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है.

छोटे प्रयोग से शुरू हुई बड़ी सफलता

कुछ साल पहले तक डांग जिले में स्ट्रॉबेरी की खेती केवल सीमित इलाकों और कुछ किसानों तक ही सीमित थी. शुरुआत में इसे एक प्रयोग के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब यह खेती पूरे जिले में संगठित तरीके से फैलने लगी है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2023 में जिले में करीब 20 हेक्टेयर क्षेत्र में स्ट्रॉबेरी की खेती होती थी. अब वित्त वर्ष 2026 तक यह बढ़कर लगभग 33 हेक्टेयर तक पहुंच गई है.

उत्पादन की बात करें तो 2023 में करीब 140 मीट्रिक टन स्ट्रॉबेरी का उत्पादन हुआ था, जो अब बढ़कर लगभग 233 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है. यह बढ़ोतरी किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है.

पारंपरिक खेती छोड़ स्ट्रॉबेरी की ओर बढ़े किसान

डांग जिले के किसान लंबे समय से बारिश पर आधारित खेती करते रहे हैं. कई बार पानी की कमी, अनियमित बारिश और कम दाम मिलने की वजह से किसानों की आय स्थिर नहीं रह पाती थी. ऐसे में किसानों ने धीरे-धीरे स्ट्रॉबेरी जैसी हाई वैल्यू फसलों की ओर रुख करना शुरू किया. अधिकारियों के मुताबिक अब स्ट्रॉबेरी उगाने वाले किसान प्रति हेक्टेयर सालाना 7 से 8 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं. यही वजह है कि छोटे और सीमांत किसान भी अब इस खेती को अपनाने लगे हैं.

कई गांव बने स्ट्रॉबेरी उत्पादन के बड़े केंद्र

डांग जिले में अब स्ट्रॉबेरी खेती क्लस्टर मॉडल के रूप में विकसित हो रही है. अहवा तालुका के भुरापानी, बोरिगावथा, गालकुंड, कोटामदार, मालेगांव, डभास, सोनुनिया और वनार जैसे गांव प्रमुख उत्पादन केंद्र बन चुके हैं. वहीं वाघई तालुका के कंचनपाड़ा, घोड़वाहल और मुरांबी जैसे गांवों में भी बड़े स्तर पर खेती की जा रही है.

क्लस्टर मॉडल से किसानों को कई फायदे हुए हैं. इससे बीज, खाद और दूसरी जरूरी चीजों की खरीद आसान हुई है. किसान आपस में खेती की जानकारी भी साझा कर रहे हैं और बाजार तक फसल पहुंचाने में भी आसानी हो रही है.

अब बड़े शहरों तक पहुंच रही डांग की स्ट्रॉबेरी

पहले डांग की स्ट्रॉबेरी सिर्फ स्थानीय बाजारों जैसे सापुतारा और अहवा तक सीमित थी. लेकिन अब बेहतर सड़क और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के कारण यहां की स्ट्रॉबेरी अहमदाबाद, सूरत और भरूच जैसे बड़े शहरों तक पहुंच रही है. इससे किसानों को अच्छे दाम मिलने लगे हैं. साथ ही पैकेजिंग और कोल्ड स्टोरेज की जानकारी बढ़ने से फसल खराब होने का नुकसान भी कम हुआ है.

मौसम और मिट्टी ने दिया बड़ा फायदा

विशेषज्ञों का मानना है कि डांग का मौसम और मिट्टी स्ट्रॉबेरी खेती के लिए बेहद अनुकूल है. यहां की रेतीली दोमट मिट्टी, जैविक तत्वों की अच्छी मात्रा और 5.5 से 7.0 के बीच पीएच स्तर स्ट्रॉबेरी के लिए उपयुक्त माना जाता है.

स्ट्रॉबेरी की फसल 22 से 25 डिग्री सेल्सियस के तापमान में बेहतर बढ़ती है, जबकि रात का ठंडा मौसम फल की गुणवत्ता को और बेहतर बनाता है. डांग का वातावरण इन सभी जरूरतों को पूरा करता है.

कई विदेशी किस्मों की हो रही खेती

डांग के किसान अब अलग-अलग किस्मों की स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं. इनमें विंटर डॉन, अर्ली विंटर, कैमारोजा, स्वीट चार्ली, नभिला, नबाडी, सेल्वा, बेलरूबी और पजेरो जैसी किस्में शामिल हैं. इनमें ‘विंटर डॉन’ सबसे ज्यादा लोकप्रिय मानी जा रही है, क्योंकि इसकी फसल दिसंबर से मार्च तक लंबे समय तक मिलती रहती है. इससे किसानों को बाजार में लगातार सप्लाई करने और बेहतर दाम पाने का मौका मिलता है.

गांवों में बढ़ा रोजगार

स्ट्रॉबेरी खेती का असर सिर्फ किसानों की कमाई तक सीमित नहीं है. इससे गांवों में रोजगार भी बढ़ा है. कटाई, पैकिंग और परिवहन जैसे कामों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिल रहा है. इससे कई परिवारों का पलायन भी कम हुआ है और गांवों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं.

प्राकृतिक खेती को भी मिला बढ़ावा

डांग में कई किसान प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाकर स्ट्रॉबेरी उगा रहे हैं. इससे उत्पादन लागत कम हो रही है और फलों की गुणवत्ता भी बेहतर हो रही है. सरकार की बागवानी योजनाएं और तकनीकी मदद भी किसानों को इस खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.

बदल रही है डांग की पहचान

कभी पिछड़े और सीमित खेती वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना जाने वाला डांग अब स्ट्रॉबेरी उत्पादन की वजह से नई पहचान बना रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह किसानों को बाजार, तकनीक और सरकारी मदद मिलती रही तो आने वाले वर्षों में डांग देश के बड़े स्ट्रॉबेरी उत्पादक क्षेत्रों में शामिल हो सकता है.

Published: 21 May, 2026 | 07:37 AM

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