जामुन की ज्यादा फ्रूटिंग सूखा पड़ने का संकेत, कितनी सच है ये बात.. जानिए वैज्ञानिकों ने क्या कहा

Trees fruiting signal for weather conditions claims : हिमाचल प्रदेश की औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति राजेश्वर चंदेल ने किसान इंडिया को बताया कि जामुन के साथ ही इसकी प्रजाति के अन्य पेड़ों की टैप रूट यानी मुख्य जड़ काफी लंबी होती है और जमीन के काफी नीचे तक जाती है. इन पेड़ों को भूजल स्तर और निचली धरती की परतों में होने वाले बदलाव का पता सबसे पहले चलता है और फिर ये पेड़ उसी के अनुरूप फलन को गति देते हैं.

रिजवान नूर खान
नैनीताल | Updated On: 24 Jun, 2026 | 02:12 PM

देशभर में इस बार जामुन की फ्रूटिंग यानी फल खूब आए हैं. दावा है कि जामुन के फलन का 40 साल पुराना रिकॉर्ड टूट जाएगा और इसे सूखा पड़ने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है. लोक मान्यता है कि ज्यादा जामुन के फल आने से उस सीजन सूखा पड़ता है. इसके लिए तरह तरह के संकेतों का हवाला दिया जा रहा है. हालांकि, कृषि और बागवानी वैज्ञानिकों ने इस मान्यता पर अलग प्रतिक्रिया दी है.

सदियों से मौसम परिस्थितियों के लिए प्राकृतिक संकेतों का सहारा

आज जब आधुनिक तकनीक और उपकरण हैं तो मौसम की सटीक जानकारी मिल जाती है. लेकिन, सदियों पहले जब विज्ञान का प्रसार नहीं हुआ तब भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में किसान मौसम का अनुमान लगाने के लिए प्राकृतिक संकेतों का सहारा लेते रहे हैं. पक्षियों के व्यवहार, चींटियों की गतिविधियों, हवा की दिशा, बादलों के स्वरूप और वृक्षों के पुष्पन के साथ ही फलन को मौसम से जोड़कर देखा जाता रहा है.

इसी क्रम में यह मान्यता भी विकसित हुई कि यदि जामुन, महुआ, बेर या कुछ अन्य वृक्षों पर अत्यधिक फलन हो तो भविष्य में बारिश कम हो सकती है या सूखे जैसी स्थिति बन सकती है. कई बुजुर्गों का मानना है कि प्रकृति पहले से कठिन परिस्थितियों का आभास कर लेती है और वृक्ष अधिक बीज उत्पन्न करके अपनी प्रजाति को सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं. यह विचार रोचक अवश्य है, लेकिन वैज्ञानिक परीक्षण की कसौटी पर इसकी जांच जरूरी है.

जामुन के पेड़ से सूखे की भविष्यवाणी पर डॉ. एसके सिंह का पक्ष

बिहार के समस्तीपुर स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह ने किसान इंडिया को बताया कि आधुनिक कृषि मौसम विज्ञान (Agrometeorology), पादप शरीर क्रिया विज्ञान (Plant Physiology) और जलवायु विज्ञान (Climate Science) के अनुसार अब तक ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है जो यह साबित कर सके कि जामुन का वृक्ष भविष्य में पड़ने वाले सूखे की सटीक भविष्यवाणी कर सकता है.

पेड़ भविष्य की घटनाओं को नहीं जानते, बल्कि वे वर्तमान तथा पिछले वर्षों की पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया करते हैं. इसलिए किसी वर्ष अधिक फल लगना भविष्य के मौसम का संकेत नहीं, बल्कि पिछले मौसमीय कारकों का परिणाम होता है. दूसरे शब्दों में कहें तो जामुन का भरपूर फलन भविष्य का पूर्वानुमान नहीं बल्कि अतीत की परिस्थितियों का प्रतिबिंब है.

ज्यादा फलन से सूखा पड़ना केवल लोक मान्यता, वैज्ञानिक प्रमाण नहीं- कुलपति राजेश्वर चंदेल

हिमाचल प्रदेश के सोलन में स्थित डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के कुलपति राजेश्वर चंदेल ने किसान इंडिया को बताया कि जामुन के साथ ही इसकी प्रजाति के अन्य पेड़ों की टैप रूट यानी मुख्य जड़ काफी लंबी होती है और जमीन के काफी नीचे तक जाती है. इन पेड़ों को भूजल स्तर और निचली धरती की परतों में होने वाले बदलाव का पता सबसे पहले चलता है और फिर ये पेड़ उसी के अनुरूप फलन को गति देते हैं. फलन चक्र में प्राकृतिक रूप से एक-दो साल का गैप लेते हैं.

कुलपति राजेश्वर चंदेल ने बताया कि अधिक फलन से सूखा पड़ने का संकेत लोक मान्यता पर आधारित है. लोक मान्यताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. उन्होंने कहा कि बीते 20 से 40 साल में ऐसी कोई रिपोर्ट या शोध नहीं आया है, जिसमें इसको स्वीकारा गया हो. इसलिए यह केवल लोगों की मान्यता भर है.

Trees fruiting alert for weather conditions claims and truth

कुलपति डॉ. राजेश्वर चंदेल (पहली तस्वीर). प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह (दूसरी तस्वीर).

फिर जामुन में अधिक फल लगने की वजह क्या है

प्रोफेसर (डॉ.) एसके सिंह ने बताया कि जामुन के वृक्षों में अधिक फल लगना अनेक जैविक एवं पर्यावरणीय कारणों से होता है. इसमें अनुकूल तापमान और मौसम बड़ी भूमिका निभाता है. इसके साथ ही पिछले साल की पर्याप्त बारिश भी वजह बनती है. वृक्ष का स्वास्थ्य और परागण की सफलता भी बड़ी वजह होती है. जबकि, वनस्पति विज्ञान में मास्ट फ्रूटिंग एक प्रसिद्ध घटना है, जिसमें कुछ वृक्ष एक या दो वर्षों के अंतराल पर असाधारण मात्रा में फल और बीज उत्पन्न करते हैं. यह एक प्राकृतिक जैविक रणनीति है जिससे अधिक संख्या में बीज जीवित रह सकें.

फिर यह धारणा बनी कैसे?

डॉ. एसके सिंह बताते हैं कि इस सवाल का जवाब मानव मनोविज्ञान में छिपा है. मान लीजिए किसी वर्ष जामुन की भरपूर पैदावार हुई और अगले वर्ष बारिश कम हो गई. ऐसी घटनाएं लोगों की स्मृति में लंबे समय तक बनी रहती हैं. लेकिन जिन वर्षों में जामुन अधिक फला और उसके बाद सामान्य या अच्छी वर्षा हुई, वे घटनाएं धीरे-धीरे भुला दी जाती हैं. मनोविज्ञान में इसे Confirmation Bias कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति उन्हीं घटनाओं को याद रखता है जो उसकी पहले से बनी मान्यता का समर्थन करती हैं.

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Published: 24 Jun, 2026 | 01:46 PM

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