5 साल में लाखों हेक्टेयर बढ़ गया धान का रकबा, दूसरी फसलों से किसान क्यों बना रहे दूरी?

हरियाणा में 2020 से 2025 के बीच धान का रकबा बढ़ा है, जबकि कपास की खेती में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है. बेहतर आय और सरकारी खरीद के कारण किसान धान की ओर आकर्षित हो रहे हैं. वहीं, कपास में कीटों के बढ़ते प्रकोप और नुकसान से किसान परेशान हैं. सरकार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के प्रयास कर रही है.

नोएडा | Published: 26 May, 2026 | 02:36 PM

Haryana Paddy Farming: साल 2020 से 2025 के बीच हरियाणा की फसल व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है. इस दौरान धान की खेती का रकबा 15.26 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 18.68 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि कपास का क्षेत्र 7.20 लाख हेक्टेयर से घटकर केवल 4.01 लाख हेक्टेयर रह गया. यह बदलाव किसानों की धान की ओर बढ़ती रुचि को दर्शाता है, क्योंकि धान की सरकारी खरीद सुनिश्चित होती है और किसानों को अपेक्षाकृत स्थिर आय मिलती है. वहीं, कपास की खेती पर कीटों के बढ़ते हमले, बीटी कपास की घटती प्रभावशीलता और लगातार बढ़ रहे उत्पादन नुकसान के कारण किसान इससे दूरी बना रहे हैं.

किसानों के अनुसार, धान की खेती को प्राथमिकता देने की सबसे बड़ी वजह इसकी बेहतर आमदनी है. किसान संगठन पगड़ी संभाल जट्टा किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष मनदीप नाथवान ने ‘द ट्रिब्यून’ से कहा कि धान की एक एकड़ खेती से करीब 80 हजार रुपये की आय हो जाती है. खेती की लागत निकालने के बाद भी किसानों को लगभग 50 हजार रुपये का मुनाफा मिल जाता है.

धान की खेती में है ज्यादा कमाई

वहीं, कुरुक्षेत्र के किसान नेता राकेश बैंस का कहना है कि अन्य फसलों से किसानों को प्रति एकड़ लगभग 50 हजार रुपये की ही आय होती है, जबकि धान से करीब 80 हजार रुपये तक कमाई हो जाती है. यही कारण है कि अधिकतर किसान धान की खेती  को ज्यादा लाभदायक और सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं. पूर्व भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिक वीरेन्द्र लाठर के अनुसार, हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों के दौरान किसानों ने कपास, मक्का, ज्वार, दलहन और तिलहन जैसी फसलों से हटकर धान की खेती को अपनाया है. इनमें सबसे ज्यादा गिरावट कपास की खेती में देखने को मिली है.

प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये तक का नुकसान

उन्होंने कहा कि बीटी कपास पहले गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) जैसे कीटों से सुरक्षा  देती थी, लेकिन समय के साथ कीटों ने इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है. इसके कारण किसानों को कीटनाशकों पर अधिक खर्च करना पड़ता है, फिर भी उत्पादन काफी कम हो रहा है. जहां लाभ के लिए प्रति एकड़ करीब 8 क्विंटल उपज जरूरी है, वहीं कई किसानों को केवल 2 क्विंटल तक ही उत्पादन मिल रहा है. इससे किसानों को प्रति एकड़ लगभग 15 हजार रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

किसानों को मिलती है प्रोत्साहन राशि

धान की बढ़ती खेती और भूजल पर पड़ रहे दबाव को देखते हुए हरियाणा सरकार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है. ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ योजना के तहत किसानों को दलहन, कपास और मक्का जैसी कम पानी वाली फसलें उगाने पर 8,000 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि दी जाती है. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हाल ही में बताया कि इस योजना के तहत 2.20 लाख एकड़ क्षेत्र के लिए 157 करोड़ रुपये वितरित किए जा चुके हैं. इसके अलावा, माइक्रो इरिगेशन तकनीक, वर्षा जल संचयन और तालाब निर्माण के लिए 85 प्रतिशत तक की सब्सिडी भी दी जा रही है.

DSR तकनीक को बढ़ावा

धान की खेती में पानी की बचत को बढ़ावा देने के लिए सरकार डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक अपनाने वाले किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ की सहायता देती है. हालांकि, कृषि विशेषज्ञ वीरेन्द्र लाठर का मानना है कि यह राशि किसानों के व्यवहार में बड़ा बदलाव लाने के लिए पर्याप्त नहीं है. उनका कहना है कि हरियाणा में गिरते भूजल स्तर को बचाने के लिए पारंपरिक धान की खेती पर सख्त नियंत्रण की जरूरत है. वहीं, किसानों का कहना है कि यदि सरकार वैकल्पिक फसलों के लिए बेहतर बाजार और सुनिश्चित खरीद व्यवस्था उपलब्ध कराए, तभी फसल विविधीकरण वास्तव में सफल हो सकेगा.

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